मांसाहारी भोजन से बचना जरूरी
मनुष्य का शरीर तथा प्रकृति ऐसी है कि हमारे लिए केवल शाकाहारी भोजन बना है। मांसाहारी भोजन मनुष्य के लिए बना ही नहीं, फिर भी वह इसे खाता है। रोगों का शिकार होने लगता है। अस्वस्थ रहने लगता है। जो व्यक्ति यह बात जान गया है, वह मांसाहारी से शाकाहारी बन जाता है। अत: इस पर गौर करना जरूरी है।
श्र पशुओं में मांस खाने वाले तथा वनस्पति खाने वाले दोनों प्रकार के पशु हैं। उन दोनों की अलग पहचान है-
श्र जो पशु पानी को लप-लप करके पीता है, वह मांसाहारी होता है। जो बिना इस आवाज के सीधे पानी पीता है, वह शाकाहारी है। बिल्ली, कुत्ता, शेर, बाघ सभी पानी को लपलप करके जीभ से पीते हैं। अत: ये मांसाहारी होते हैं। गाय, भैंस, बैल ये जीभ से लपलपा कर पानी नहीं पीते, अत: शाकाहारी होते हैं।
मनुष्य पानी सीधे पीता है। लपलपाकर कभी नहीं। हुआ न यह भी पूरी तरह शाकाहारी? जब प्रकृति ने इसे शाकाहारी बनाया तो मांस का सेवन क्यों?
मनुष्य का मांसाहारी होना…बीमारियों को बुलाना है।
हमें भोजन को इतना चबाना चाहिए कि यह पेय पदार्थों की तरह होकर गले से उतरे। शीघ्र पचेगा भी। मांस को दांतों से जितना भी काट, पीस, चबा लें, इसके रेशे बने रहते हैं, यह पेय पदार्थ जैसा नहीं होता। यदि ऐसा है तो यह हमारे स्वास्थ्य के लिए उत्तम नहीं। इसका सेवन न करना ही अच्छा।
श्र मांस सेवन के साथ वे रोगाणु भी शरीर में जा सकते हैं जो इस पशु के शरीर में होंगे। वह हमें भी रोगी कर देंगे। ऐसा अक्सर होता है। ऐसा किसी के साथ, कभी भी न हो, हमें मांस खाने से बचना चाहिए। वह हमारे शरीर के लिए उपयुक्त नहीं।
श्र पाठकों से कुछ छिपा नहीं कि हमारे सभी विद्वान, विचारक दार्शनिक, सन्त-महात्मा या कोई भी महान पुरुष सदैव शाकाहारी रहे। मांस सेवन से घृणा किया करते। वे दूध फल, छाछ, कन्दमूल, हरी सब्जियां ही सेवन कर जीवन व्यतीत करते रहे। कभी बीमार नहीं पड़े। हमें भी उनका अनुसरण कर मांस का त्याग करना है।


