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कश्मीर में शांति की आशा बढ़ी

पिछले सात साल के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंक संबंधी हिंसा में लगभग 90 प्रतिशत की कमी आई है। मसलन, जहां 2004 में 2565 आतंकी वारदातें हुई थीं वहीं 2011 में यह घटकर 340 हो गई। इसी दौरान नागरिकों की हत्याएं भी 707 (2004) की तुलना में 31 (2011) हुई। सुरक्षाकर्मियों की शहादतों में भी कमी आई है, अगर 2004 में 281 शहीद हुए थे तो 2011 में 33 को ही शहादत का जाम पीना पड़ा। इसी प्रकार आतंकवादी भी कम मारे गए, 976 (2004) की तुलना में 100 (2011) अब पाकिस्तान की तरफ से भी यह संकेत मिले हैं कि वह फिलहाल कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं करेगा और अलगाववादी संगठन हुर्रियत ने भी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बने के संकेत दिए हैं। इससे यह लगता है कि हिमालय में बर्फ पिघलने के साथ ही जम्मू-कश्मीर में गर्मियों का मौसम शांत रहेगा।
ऊपर जो आंकड़े दिए गए हैं उनसे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर में शांति धीरे-धीरे लौट रही है। इसकी एक वजह तो यह है कि सुरक्षाबल शांति स्थापना की अपनी रणनीति में सफल हो रहे है। दूसरा कारण यह भी है कि अब कश्मीर के अलगाववादी गुटों को एहसास होने लगा है कि वह इस प्रदेश में बुलेट से नहीं बैलेट से ही परिवर्तन ला सकते हैं।
गौरतलब है कि पिछले दो दशक से हुरियत कांप्रेंस चुनावों का विरोध करती आ रही है और मांग करती आ रही है कि उसे जनमत संग्रह का अधिकार मिलना चाहिए। इसलिए उसने इस अवधि के दौरान सभी चुनावों का बहिष्कार किया। लेकिन अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वह 2014 के चुनावों में हिस्सा ले सकती है।
हुर्रियत का बदलता रुख
1987 के बाद यह पहला अवसर है जब अलगाववादी गुटों की तरफ से इतने सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। ध्यान रहे कि उस साल जो विधानसभा चुनाव हुए थे उनमें गड़बड़ी के जबरदस्त आरोप लगे थे और सभी कट्टरपंथियों (अब अलगाववादियों) को हार का मुंह देखना पड़ा था। तब यूनाइटेड मुस्लिम फ्रंट के अधिकतर नेता जिनमें हिज्बुल मुजाहिदीन का सैय्यद सलाहुद्दीन भी शामिल था, सीमा पार करके पाकिस्तान चले गए थे और भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों में लिप्त हो गए थे।
लेकिन अब समय बदल रहा है। हुर्रियत, जिसके अधिकतर नेताओं ने अपने कैरियर चुने हुए प्रतिनिधियों के रूप में आरंभ किए थे, अब संकेत दे रही है कि वह 2014 के विधानसभा चुनावों में हिस्सा ले सकती है। इस बदली मानसिकता का एक कारण तो यह है कि हुर्रियत को अब पाकिस्तान अपनी बदहाल आतंरिक स्थिति के चलते पहले जैसा समर्थन नहीं दे रहा है। दूसरा कारण यह है कि जिस तरह से चुनाव आयोग निष्पक्ष व शांतिपूर्ण चुनावों का आयोजन विभिन्न राज्यों में करा रहा है उससे हुर्रियत नेतृत्व को विश्वास होने लगा है कि जम्मू-कश्मीर में भी बिना गड़बड़ी वाले चुनाव हो सकते हैं।
हुर्रियत के इस बदलते रूख का सबसे बड़ा संकेत हाल ही में श्रीनगर की जामा मस्जिद में उस समय मिला जब मीर वायज उमर फारूख ने अपने साप्ताहिक संबोधन में कहा ‘आगे आने वाले दिनों में हुर्रियत का फोकस शासन व्यवस्था पर रहेगा, विशेषकर राज्य के ऊर्जा प्रोजेक्टों को लेकर जिनका संचालन राष्ट्रीय हाइड्रो पावर कारपोरेशन कर रही है। और अगर सब कुछ ठीक चलता है संभावित शांति योजना के अनुसार तो हुर्रियत का चुनावों में हिस्सा लेना निश्चित है।’
दर असल, सबकुछ आने वला कुछ माह में स्पष्ट हो जायेगा। उस वक्त तक हुर्रियत के नेता पाकिस्तान से लौट चुके होंगे। ध्यान रहे कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर अपनी बदली रणनीति के चलते हुर्रियत के नेताओं को इस्लामाबाद आमंत्रित किया हुआ है और नयी दिल्ली को भी उनकी इस यात्रा पर कोई आपत्ति नहीं है। इस बीच हुर्रियत न सिर्फ केन्द्र से कम्युनिकेशन लिंक खोलना चाहती है बल्कि घाटी में ग्रामीणों से भी सम्पर्क बनाना चाहती है। हुर्रियत ने नयी दिल्ली में अपना दफ्तर फिर से खोलने का फैसला किया है और ग्रामीण क्षेत्रों में समर्थन लुटाने के लिए वह अपने बन्द पड़े जिला कार्यालयों को भी खोलने जा रही है।
सवाल यह है कि हुर्रियत की इस बदली रणनीति का असर कश्मीर के दो सबसे महत्वपूर्ण खानदानों अब्दुल्ला और मुफ्ती पर क्या पड़ता है।
आम जन की प्रतिक्रिया
बहरहाल, अगर हुर्रियत चुनावों में हिस्सा लेती है तो उससे सबसे बड़ा फायदा तो कश्मीर में शांति व्यवस्था स्थापित करने के संदर्भ में होगा और दूसरा यह स्पष्ट हो जायेगा कि हुर्रियत के पास कितना जनसमर्थन है और क्या वह वास्तव में प्रदेश की जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। शायद यही कारण है कि पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और नेशनल कांप्रेंस के वरिष्ठ नेता इरफान शाह ने इस बात का स्वागत किया है कि हुर्रियत अपना प्रतिनिधित्व चरित्र साबित करने के लिए चुनावों में हिस्सा लेना चाहती है। लेकिन इन दोनों ही पार्टियों को हुर्रियत से डर भी है। इसलिए इरफान शाह यह नहीं कहना भूलता कि जनता हुर्रियत को नयी भूमिका में पसन्द नहीं करेगी। कश्मीर में शांति की संभावनाएं इसलिए भी बढ़ गयी हैं कि आम जनता हिंसा से तंग आ चुकी है। वह ऐसी किसी भी पार्टी या व्यक्ति का समर्थन नहीं करना चाहती जो हिंसा के पक्ष में हो। इसलिए वह हुर्रियत व अन्य संगठन को मजबूर कर रही है कि कश्मीर समस्या के ‘समाधान’ की बजाए कश्मीर में शांति स्थापना के प्रयास किये जायें। बहरहाल, कश्मीर में जो आतंकी वारदातों में कमी आयी है उससे इस बात की संभावनाएं बढ़ी हैं कि नयी दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच इस मुद्दे पर फिर से वार्ता शुरू हो सकती है। गौरतलब है कि नयी दिल्ली में वार्ता की शर्त यह लगायी थी कि पहले कश्मीर में हिंसा रहित वातावरण स्थापित हो।
इसमें शक नहीं है कि पाकिस्तान की जो फिलहाल स्थिति है और कश्मीर में जो परिवर्तन की लहर दौड़ रही है उससे नयी दिल्ली के लिए एक अच्छा अवसर है कि वह जम्मू-कश्मीर में शांति प्रक्रिया की रफ्तार को तेज करे और राज्य की जनता में विश्वास पैदा करे कि हिंसा का विरोध करने पर ही वह सुख व समृध्दि में सांस ले सकेगी। दरअसल, कश्मीर के खेल में केवल आम जनता को ही नहीं बल्कि सभी खिलाड़ियों को ईमानदारी से काम लेना होगा तभी वहां शांति हो सकेगी।
(लेखिकी महिलाओं एवं बच्चों के मामलों की विशेषज्ञ है)

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