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Home » Health » 14 June 2012 »

स्वस्थ रहने के लिए करें योग-व्यायाम

आधुनिकता की अंधी दौड़ में खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार और जीवन पध्दति के विकृत हो जाने से आज सारा समाज अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त है। इन सबका समाधान योग-व्यायाम द्वारा हो सकता है। यह बिना मूल्य का ऐसा उपचार है जो रोगों का निदान तो करता ही है, साथ में शरीर से मल को भी निष्कासित करता है और शरीर को सुन्दर, सुडौल और मजबूत भी बनाता है। किसी खास बीमारी के लिए किसी खास व्यायाम का उचित समय और उचित तरीके से प्रयोग करें तो निश्चित ही आप निरोग बन सकते हैं। आइये, आपको कुछ आसनों का विधि-विधान बतायें।
1. उत्तान पादासन : जमीन पर पीठ के बल लेटें और सांस खींचते हुये दोनों पैर ऊपर इस प्रकार उठायें कि घुटने न मुड़ें। थकान सी लगे या सांस रोकने में समर्थ न हैं तो सांस बाहर निकालते हुए दोनों पैर धीरे-धीरे एक साथ नीचे लायें। इस प्रकार बार-बार करें।
लाभ : इससे अनियमित मासिक ठीक होता है। पेट का बढ़ना रूकता है। पाचन क्रिया ठीक होती है तथा पेट ठीक से साफ होता है। पेट के समस्त विकार दूर होते हैं।
2. पद्मासन : जमीन पर पालथी मारकर बैठ जायें। इसके पश्चात् दाहिना पांव बायी जंघा पर और बांया पांव दायीं जंघा पर रखें। हाथों को घुटनों पर रखें। हाथ, मेरूदण्ड, सिर, गला आदि तने हुये एक सीध में हों। स्वांस की गति समान रखें। यह विधि पांव बदल-बदल कर दो-तीन बार करें।
लाभ : इससे कब्जियत, अजीर्ण, यकृत रोग, हृदय रोग, रक्त विकार, चर्म रोग और आमवात जैसे रोगों का शमन होता है एवं मानसिक शांति मिलती है।
3. शुतुरमुर्गासन : सावधान खड़े हो जायें, फिर धीरे-धीरे जमीन की ओर ऐसे झुकें कि घुटने न मुड़ें। क्रमशः स्वांस छोड़ें। दोनों हाथ एक साथ जमीन पर लगायें।
लाभ : योनि मजबूत बनती है। कमरदर्द दूर होता है। गर्भाशय एवं पेट का शोधन होता है। मनोबल बढ़ता है।
4. सुप्त वज्रासन : जमीन पर घुटने को टेक कर जंघाओं को पिंडलियों पर रखें और पांवों की उंगलियों को जमीन पर रखकर एड़ियों पर बैठें तथा पीठ के पीछे जमीन पर लेट जायें। दोनों हाथ टांगों पर रखें। सांसों की गति नियमित रखें।
लाभ : इससे पेट की चर्बी दूर होती है। टांगें मजबूत बनती हैं। थकान दूर होती है। छाती का विकास होता है। आंखों की ज्योति बढ़ती है। योनि के विकार दूर होते हैं। गर्भवती स्त्रियां यह आसन न करें।
5. घनुरासन : जमीन पर चटाई या कम्बल बिछायें और उस पर पेट के बल लेट जायें। दोनों और मिलाकर पैरों को घुटनों से मोड़ें। दोनों हाथों को पीछे ले जाकर दोनों पैरों को टखनों से पकड़ें और स्वांस बाहर छोड़ते हुए पैरों को खींचें। साथ-साथ सिर को पीछे की ओर ले जाने की कोशिश करें। शरीर का सारा वजन (बोझ) नाभि पर पड़ने दें। सांस खींचते हुये पकड़ ढीली करें। यह क्रिया, कई बार करें। गर्भवती स्त्रियां यह आसन न करें।
लाभ : पेट की चर्बी घटती है। भूख बढ़ती है। छाती का दर्द ठीक होता है। गले की बीमारियां दूर होती हैं। आवाज मीठी-मधुर बनती है। स्वांसों का संतुलन बनता है। चेहरे की सुन्दरता बढ़ती है। हाथ-पैर का कम्पन रूकता है। जठराग्नि प्रबल होती है। वायुरोग मिटता है। रक्त का प्रवाह तेज होता है। मासिक-धर्म के विकार एवं गर्भाशय संबंधी रोग दूर होते हैं।
6. मयूरासन : इस आसन में मोर की आकृति बनती है। इसके लिए जमीन पर घुटने टेक कर बैठें। दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन पर इस प्रकार रखें कि सब अंगुलियां पैर की दिशा में हों। अब दोनों कुहनियों को पेट में नाभि के पास रखें। आगे झुकें और दोनों पैर पीछे लम्बा करें तथा जमीन से ऊपर उठायें। स्वांस बाहर निकालते हुए पूरा जमीन के समानान्तर रखें। जितने समय तक रह सकें, इस स्थिति में रहें। गर्भवती स्त्रियां यह आसन न करें।
लाभ : पेट के समस्त विकार दूर होते हैं। शरीर बलवान बनता है। भुजाएं शक्तिशाली बनती हैं। पेट के सभी अवयव सक्रिय होते हैं। पाचन-शक्ति बढ़ती है। मंदाग्नि दूर होती है। आत्म-विश्वास प्रबल होता है।
7. सर्वांगासन : जमीन पर पीठ के बल लेटें और श्वास को बाहर निकालते हुए दोनों पैर, कमर व शरीर का अन्य भाग ऊपर उठायें। दोनों हाथों से कमर को मजबूती से पकड़ लें। हाथ की ओर रखें। हाथ की कुहनियां जमीन पर रखें। गरदन और कंधे के बल पूरा शरीर ऊपर की ओर सीधा खड़ा कर दें। ठोड़ी को छाती से चिपकायें और दोनों पैर आकाश की ओर रखें। अब सास सामान्य गति से चलने दें।
लाभ : इससे जठराग्नि तीव्र होती है। शरीर की त्वचा सुन्दर बनी रहती है। उसमें अनावश्यक लटकाव या झुर्रियां नहीं पड़ती। बालों का झड़ना रूकता है। जीवनी शक्ति बढ़ती है। शरीर मजबूत बनता है। भय, आलस्य और हीन-वृत्ति दूर होती है। वात, पित्त और कफ, तीनों दोषों का शमन होता है। मुहांसे और अन्य दाग मिटते हैं, लिवर और प्लीहा के रोग दूर होते हैं। थाइराइड और अपेन्डीसाइटिस अपने शुरुआती दौर में दूर हो जाते हैं। स्त्रियों का मासिक विकार दूर होता है। यह आसन करें, आपको ज्यादा लाभ होगा। गर्भवती स्त्रियां यह आसन न करें।
8. हलासन : जमीन पर पीठ के बल लेटें। श्वास को पूरी तरह बाहर कर दोनों पैरों को एक साथ ऊंचा करें। आकाश की तरफ पूरे करके पीछे सिर की तरफ झुकायें। स्मरण रखें घुटने न मुडें। पैरों के ताने हुये पंजे जमीन पर लगायें। ठोड़ी छाती से लगायें।
लाभ : अजीर्ण, कफ, कब्ज, गले के रोग, रक्त विकार, गल दर्द, पेट की बीमारी वात, वीर्य-विकार, गर्भाशय की बीमारियां ठीक होती हैं। इसे गर्भवती स्त्रियां न करें। यह आसन मंसपेशियों को मजबूत बनाता है तथा बढ़ापा रोकता है। अण्डकोष की वृध्दि, पेन्क्रियास और अपेन्डिक्स को ठीक करती है।
उपरोक्त आसन योग्य प्रशिक्षक की उपस्थिति में करें। योग व्यायाम के नियमित प्रयोग से शारीरिक रोगों का निवारण होता है और मन को शांति मिलती है।

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