गजल के शहंशाह की विदाई
मेहदी हसन के निधन के साथ ही गजल गायकी का वह लोकधर्मी चरित्र हमसे जुदा हो गया जो भारत और पाकिस्तान के लोगों को संगीत कला के माध्यम से जोड़ता था। पिछली शताब्दी के साठ के दशक में जब दोनों देशों के रिश्तों में कटुता चरम पर थी तब मेहदी हसन की पुरकशिश आवाज भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक एकता को नयी परिभाषा, पहचान और दिशा देने में पूरी शिद्दत के साथ सक्रिय थी। उनकी रसपगी गजलों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कला की कोई सरहद नहीं होती, कोई धर्म या सम्प्रदाय नहीं होता और किसी देश के बंटवारे की त्रासदी से उत्पन्न नफरत उसकी लोकप्रियता की राह रोक नहीं सकती। इस अर्थ में मेहदी हसन ने लोकप्रियता का जो इतिहास रचा उसकी मिसाल अन्यत्र दुर्लभ है। गायन उनके लिए सिर्फ पेशा भर नहीं था बल्कि सम्पूर्ण जीवनदर्शन था। यही कारण था कि वह भीड़-भाड़ में कभी खोये नहीं और एक साथ दो और तीन पीढ़ियां उनकी गजलों की मुरीद बन गयी। मेहदी हसन वास्तव में परम्परा और आधुनिकता के तत्वपोषक कला साधक थे। उनकी प्रयोगधर्मिता न केवल उन्हें प्रेरणा और ताकत देती थी बल्कि उनके लिए सफलता की जमीन भी तैयार करती थी। किसी ने कभी कल्पना नहीं की थी कि गजल में आधुनिक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन उन्होंने इनका इस तरह प्रयोग किया कि वे गजल के हिस्सा बन गये। वस्तुत: उन्होंने शास्त्रीय और लोकशैली के मिश्रण से जो नयी शैली विकसित की वह नयी पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक बन गयी। बाद में जगजीत सिंह ने इस शैली को आगे बढ़ाकर खूब लोकप्रियता अर्जित की और गजल को लोकजीवन का अंग बना दिय। लेकिन मेहदी हसन अपने समकालीनों और बाद की पीढ़ी के कलाकारों से अलग इसलिए थे क्योंकि उनकी आवाज में नफासत और कोमलता के साथ-साथ गजब की भावाभिव्यक्ति क्षमता थी। इस क्षमता के दर्शन उनके समकालीनों में सिर्फ लता मंगेशकर में होते हैं। इस अर्थ में मेहदी हसन वास्तव में संत परम्परा के कालाकार थे और इसीलिए उनके कलाकर्म को किसी एक देश की सीमा में नहीं बांधा जा सकता है।


