बच्चों में जान लेवा हो सकता है डायरिया
बच्चों में डायरिया एक आम समस्या है। यदि कोई बच्चा दिन में तीन या इससे अधिक बार पतले दस्त करता है, तो यह डायरिया कहलाता है। चूंकि बच्चों के शरीर में जल की मात्रा वयस्कों की अपेक्षा कम होती है, इसलिए अत्यधिक दस्त के कारण जल और खनिज-लवणों की कमी से शिकार होकर आज भी देश में प्रतिवर्ष लाखों बच्चे मृत्यु की गोद में असमय ही समा जाते हैं। इस रोग से ग्रसित होने का डर बरसात और गर्मी में अत्यधिक रहता है, क्योंकि इन मौसमों में वातावरण वैक्टीरिया व वायरस के बढ़ने के अनुकूल होता है। छह माह की आयु तक गाय अथवा बोतल से दूध पीने वाले बच्चों में दस्त अर्थात् डायरिया का भय मां का दूध पीने वाले बच्चों की अपेक्षा ज्यादा होता है। खासकर छह माह से दो वर्ष की आयु तक के बच्चों में इस रोग के होने का आसार अधिक होते हैं।
कारण-डायरिया होने का प्रमुख कारण इ-कोलाई प्रजाति से संक्रमित होना है। यह वैक्टीरिया, वायरस, परजीवी कवक, शरीर में प्रदूषित दूध, खाद्य पदार्थ अथवा जल के माध्यम से आंतों में प्रवेश कर आंतों की श्लेष्मा झिल्ली को नुकसान पहुंचाती है तथा विष श्रावित कर डायरिया होने के लक्षण को प्रबल रूप प्रदान करती है। छह माह से दो वर्ष के बीच अक्सर बच्चें घुटनों के बल चलते-फिरते रहते हैं। इन्हीं हाथों से खाना खाने अथवा मुंह में उंगली डालने से संक्रमण की संभावना अधिक बनी रहती है।
लक्षण-डायरिया के कारण बच्चे जहां चिड़चिड़े हो जाते हैं, वहीं संक्रमण के कारण उनमें बुखार, सिरदर्द, उल्टी, पेट दर्द आदि समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। दस्त के कारण बच्चे के शरीर में जल और खनिज लवण की कमी हो जाने के कारण पेशाब भी कम मात्रा में आता है। इसके कारण बच्चों की त्वचा अपनी चमक खोने लगती है। उनकी आंखों धंस जाती हैं। चेहरा मुरझा जाता है। इस दौरान बच्चों को प्यास ज्यादा लगती है और वह बेचैनी महसूस करता हुआ निढाल हो जाता है। हाथ-पैर ठंडे हो जाते हैं किन्तु बदन गर्म रहता है। बच्चों की हृदय गति तीव्र हो जाती है तथा रक्तचाप कम हो जाता है। पेशाब की मात्रा में कमी से पानी की कमी को गंभीरता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इस कारण गुर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं।
रोकथाम-बच्चों में डायरिया के प्रकोप की रोकथाम के लिए उनके दूध, पेयजल एवं भोजन की स्वच्छता पर विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। छह माह तक के बच्चों को मां के दूध के अतिरिक्त किसी अन्य आहार की जरूरत नहीं होती। यदि बच्चे को बोतल से दूध पिलाते हैं, तो ध्यान रखं कि हर बार दूध पिलाने से पूर्व बोतल को निप्पल के साथ लगभग 10 मिनट तक गर्म पानी मं जरूर उबालें। बोतक के बचे दूध को दोबारा नहीं पिलाएं। अगर दूध पिलाना ही है, तो साफ हाथों से चम्मच के सहारे दूध पिलाएं और जल्दी से जल्दी उनमें गिलास से दूध पीने की आदत डालें।
बच्चों को हमेशा ताजा बना भोजन ही दें। बाजार के भोजन से परहेज रखें। कुछ माताएं दस्त होने पर बच्चों का भोजन ही बन्द कर देती हैं, जबकि इसका कोई औचित्य नहीं हैं। डायरिया से ग्रसित बच्चों में आंतों की पाचन-शक्ति काफी हद तक बरकरार रहती है। इसलिए उनका दूधस पानी व खाना न रोकें। मां भी अपना दूध बच्चे को पिलाना जारी रख सकती हैं।
उपचार-दस्त होने पर ओ.आर.एस. (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन) का घोल तत्काल पिलाना शुरू कर देना चाहिए। यह पैकेट हर प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों तथा सरकारी अस्पतालों मं निःशुल्क मिलता है अथवा इसे बाजार से भी खरीदा जा सकता है। यह ओर.आर.एस. यानी मुख के द्वारा दिया जाने वाला पुनर्जलीकरण घोल विश्व स्वास्थ्य संगठन उपलब्ध कराता है। इसके एक पैकेट में 20 ग्राम ग्लूकोज, 3.5 ग्राम नमक, 2.5 ग्राम सोडिम कार्बोनेट या 2.9 ग्राम सोडियम ट्राइसाइट्रेट तथा डेढ़ ग्राम पोटेशियम क्लोराइड होता है। इसे एक लीटर स्वच्छ व उबाल कर ठंडे किये गए पानी में मिलाकर तैयार करें। घोल को चार माह के बच्चे को एक-दो गिलास, 4 से 11 माह के बच्चे को 3-4 गिलास, 2 से 4 वर्ष के बच्चे को 4-5 गिलास तथा इससे ऊपर की आयु के बच्चे को 6-11 गिलास दस्त से पानी की कमी होने पर पहले चार घंटों में दिया जाना चाहिए।
सावधानी- बच्चों में पानी की कमी की भरपाई होने का मापदंड पेशाल की मात्रा का सामान्य होना है। अगर पेशाब की मात्रा सामान्य हो गयी, तो समझें कि शरीर में पानी की कमी नहीं है। छोटे बच्चों को पानी अथवा दूध सिर थोड़ा ऊपर करके पिलाएं। दस्त चालू रहने पर हर दस्त के बाद आधा कप पानी जरूर पिलाएं। उल्टी होने पर बी दस मिनट बाद पानी पिलाना चाहिए।
डायरिया से बचाव के लिए शुध्द पानी का उपलब्ध होना तो जरूरी है ही, घर का साफ सफाई का भी ध्यान रखें। पानी हमेशा ढक कर रखें। संदेह की स्थिति में पानी को उबालकर पिएं। भोजन को धूल, मक्खियों, कीड़ों, कॉकरोच और चूहों से बचाने के लिए हमेशा ढक कर रखें। कभी भी साबुन से ठीक तरीके हाथ साफ कर ही भोजन पकाएं, खाएं एवं बच्चों को खिलाएं। अपने व बच्चों के नाखून समय-समय पर काटते रहें। बच्चे के मल को यत्र-तत्र न फेंकते हुए यदि इसे शौचालय में बहाएं तो इसके संक्रमण से राहत मिल सकती है।


