साहित्यिक और सांस्कृतिक खबरें नदारद
एक समय था जब साहित्यिक सांस्कृतिक और कलाक्षेत्र से जुड़ी खबरों और उनकी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों द्वारा गहरी रुचि ली जाती थी। वर्तमान दौर में संचार माध्यमों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। यह बदलाव स्वाभाविक भी है। पहले यह जुमला चरितार्थ होता था कि ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है’ किन्तु अब राजनीति इतनी ज्यादा हावी हो गई है कि पूरे के पूरे संचार माध्यम चाहे वे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो, राजनीतिमय हो गये हैं। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि अब राजनीति ही समाज का दर्पण हो गई है। जैसी समाज की रुचि, वैसी ही उसकी सूरत। लेकिन राजनीति के दर्पण की इस सूरत और साहित्य के दर्पण की सूरत में जमीन आसमान का अन्तर परिलक्षित होता है। जहां कला, साहित्य और संस्कृति जीवन के मूल आधार के रूप में प्रतिष्ठापित है वहीं राजनीति इसके विपरीत स्वार्थ, लालसा, पद लोलुपता और दुर्भावनाओं जैसे दुर्गुणों की ओर इंगित करती है।
संचार-माध्यमों के जरिये प्रचार
मोटे तौर पर साहित्य की परिभाषा है-कोई ऐसा लेखन जिससे सम्पूर्ण समाज का हित साध्य होता हो। ऐसे साहित्य की विधा काव्य, कथा, नाटक, निबंध या रिपोर्ताज ही क्यों न हो, वह साहित्य माना जाता है। ऐसा साहित्य एक आदर्श, अनुशासित और मर्यादित समाज के निर्माण में सहायक होता है। साहित्य और संस्कृति ऐसे शब्द नहीं हैं जिनका इस्तेमाल नकारात्मकता का बोध कराते हों। ये तो वे शब्द हैं जो समाज की परम्पराओं, चारित्रिक धरोहरों के इतिहास को पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपने में अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं। देखा जाय तो किसी भी देश या समाज के अतीत को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने वाली साहित्यिक विधाओं का अपना एक अलग ही महत्व है।
बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में हर क्षेत्र व्यावसायिक नजर से देखा जाने लगा है। अब उद्योग और व्यवसाय की परिभाषा के अर्थ बदलते जा रहे हैं। जहां राजनीति को एक उद्योग समझा जाने लगा है वहीं कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र व्यवसायिक होते चले जा रहे हैं। धर्म क्षेत्र के व्यावसायीकरण के तो अनेक प्रमाण देखने में भी आये हैं। संचार माध्यम भी पूरी तरह से व्यवसायीकृत हो ही चुके हैं। ऐसे में संचार माध्यमों में अपेक्षा रखना कि वे कला, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए अपने माध्यमों में समय निकाल सके, बेमानी होगा। राजनीति और धर्म के क्षेत्र में तो इस दौर में आर्थिक दृष्टि से ज्यादा मजबूत होते गये हैं किन्तु कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े क्षेत्र आर्थिक बदहाली का सामना करते दिखाई देते हैं। धर्म और राजनीति के क्षेत्रों के साथ ही उद्योग, व्यवसाय और सेवा के क्षेत्रों में अपने प्रचार-प्रसार के प्रति ज्यादा ललक दिखाई देती है। अत: इन क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार और विज्ञापन के लिए अतिरिक्त बजट का प्रावधान संभव होना स्वाभाविक है। हालांकि संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर कतिपय शासकीय और अशासकीय संस्थान ढिंढोरा तो खूब पीटते हैं किन्तु संस्कृति के प्रचार के लिए जो बजट प्रावधान होता है वह उन संस्थानों की अन्य व्यावसायिकाताओं से जुड़े बजट प्रावधानों की तुलना में अत्यन्त अल्प ही होता है।
साहित्य और संस्कृति का क्षेत्र इसलिए भी उपेक्षित रह जाता है क्योंकि वह संस्थानों को बदले में कुछ रिटर्न नहीं देता है। सरकारी और गैरसरकारी संस्थान केवल उन्हीं क्षेत्रों के प्रचार-प्रसार के दिलचस्पी दिखाते हैं जिनमें उन संस्थानों को, आर्थिक सामाजिक या राजनैतिक लाभ नजर आता है। ऐसा नहीं है कि देश में साहित्य और संस्कृति के नाम पर कुछ हो नहीं रहा है। खूब हो रहा है। साहित्य में खूब अच्छा लिखा जा रहा है, पढ़ा जा रहा है और पसंद किया जा रहा है। किन्तु प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उतना ज्यादा महत्व न मिल पाना इस बात को जाहिर करता है कि इस विज्ञापन युग में इन क्षेत्रों की आर्थिक हैसियत बेहतर नहीं हो पाई है। फिल्म जगत का उदाहरण देखा जा सकता है कि ऐसी-ऐसी फिल्में संचार माध्यमों के जरिए खूब प्रचार बटोर लेती है जिनका न कोई कथानक होता है, न ही कोई अभिनय कला की दृष्टि से बेहतर होती है और न ही उनके गीतों के बोलों में कोई दम होता है। चूंकि फिल्म क्षेत्र आर्थिक हैसियत रखता है और वह इस विज्ञापन युग की होड़ा-होड़ी में आगे आ जाता है इसलिए खूब प्रचारित हो जाता है। धीरे-धीरे आम जनता की अभिरुचि में भी बदलाव आता चला गया और साहित्यिक क्षेत्र अछूत होता चला गया। एकदम से यह तो नहीं माना जा सकता कि संस्कृति क्षेत्र प्रचार-प्रसार में पीछे छूट गया है किन्तु यह तो माना ही जा सकता है कि संचार माध्यमों की व्यावसायिकता साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के महत्व देने में रुचि नहीं ले पा रही है।
राजनीति की खबरें
साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों की श्रृंखलाएं निरन्तर रूप से प्राय: हर महानगर और छोटे से छोटे कस्बों में अविरल चलती रहती है। कविता पाठ, कहानी पाठ, समीक्षाएं गीत और नाट्य प्रदर्शनों के कार्यक्रम की सूचनाएं मिलती रहती है, किन्तु मीडिया में इनसे जुड़े कार्यक्रमों के कवरेज उस तादाद में नहीं दिख पाते हैं जिस तादाद में कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। आखिर ऐसे आयोजनों के बारे में मीडिया की रुचि क्यों होगी जिनके विज्ञापन जारी नहीं होते और जिनकी खबरें छापने से मीडिया को कोई आर्थिक, सामाजिक या राजनैतिक लाभ नहीं होता हो। वह युग बीत गया जब साहित्य की खबरों से अखबार के पृष्ठ भरे होते थे। रविवार के अंक तो पूरी तरह से साहित्य को समर्पित होते थे। अब तो राजनीति की मसालेदार खबरों का जमाना है जिसके प्रचार-प्रसार से राजनीतिक क्षेत्र और संचार क्षेत्र दोनों हृष्ट-पृष्ट हो रहे हैं।
मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ : उपन्यास या वृहद् शोध ग्रंथ?
ई किताब, जिसके मुखपृष्ठ पर कृष्णा सोबती की टिप्पणी छपी हो- ‘हर सचेत नागरिक के लिए मानवीय चिन्ताओं की शैल्फ पर एक जरूरी टाईटल’, जिसके भीतरी क्लैप पर बीरेन्द्र यादव और बैक कवर पर विजयमोहन सिंह के अनुशंसात्मक बयान हों, जिसकी पांडुलिपि को राजकमल ने एक लाख रुपए का ‘मैला आंचल-फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार 2012′ दिया हो, जिसके बाजार में आने के प्राय: महीना-भर पहले से लेखिका के इंटरव्यू अखबारों में छपने लगे हों, जिसके बारे में स्वयं लेखिका का यह कहना हो कि जैसे समांतर कला-फिल्मों को खास कोण से देखना होता है वैसे ही इस उपन्यास को तय फार्मूले से नहीं। पढ़ा-जांचा जाना चाहिए, उस पर स्वतंत्र धारणा बनाना कठिन भी है, जोखिम-भरा भी।
महुआ माजी समाजशास्त्र की श्रेण्य अध्येता हैं, बल्कि कहें कि विदुषी हैं, यों ही प्रथम वर्ग में एम.ए. और पीएच.डी. करने के अलावा यूजीसी का ‘नेट’ नहीं निकाला है! फिर वे संकल्प की धनी हैं, एक जिद, एक समर्पण के साथ अपने काम में पिल पड़ती है। उनके पहले ही उपन्यास ने उन्हें देश ही नहीं विदेश में भी पुख्ता पहचान दिलाई। बड़े सिध्द-प्रसिध्द लेखक-लेखिकाओं-समीक्षकों-विद्वानों ने उन्हें सराहा है, सो उनके दूसरे उपन्यास मरंगगोड़ा को भी विशिष्ट तो होना ही था।
यह सब ठीक, किन्तु मेरी विनम्र दृष्टि में किसी उपन्यास की कथा-भूमि का चयन साक्षात्कार-आधारित या इंटरनेटी या पुस्तकीय या उस भूमि-विशेष में आन्दोलनरत कुछ कलाविदों, डाक्यूमेंट्री निर्माताओं से प्राप्त ज्ञान जानकारी के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। मुझे यह भी लगता है कि उपन्यास में उस विषय को उठाया जाना चाहिए जो आपके मन-मिजाज को मथ रहा हो, केवल इसलिए किसी विषय को नहीं उठाया जाना चाहिए। कि वह ‘क्लिक’ करेगा और गहन शोध के द्वारा उस विषय और कथा भूमि को उपन्यास में परोस दिया जाए।
कृष्णा सोबती जी ने यह किताब आद्योपांत पढ़ने का धैर्य दिखाया होगा, इसका भरोसा मुझे नहीं होता, किन्तु कवर पर उनकी जो अनुशंसात्मक टिप्पणी छपी है, वह अर्थगर्भ है, कौशलपूर्ण है। वे इस किताब को ‘…एक जरूरी टाईटल’ कहती हैं, और यहां इनसे असहमत होने की कोई वजह नहीं हो सकती। यूरेनियम के उत्खनन, विकिरण, प्रदूषण, आदिवासियों के तज्जन्य विस्थापन पर, पूरे वैश्विक संदर्भ को सामने रखते हुए पूरे प्रामाणिक विवरणों के साथ, मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई किताब इसके पहले लिखी गई है, कम-से-कम किसी भी भारतीय भाषा में तो नहीं ही। महुआ जी की इस श्रम निष्ठा के लिए उन्हें सलाम करने का जी करता है। इस शोध ग्रंथ पर कई-कई डी. लिट् उपाधियां न्योछावर हैं। लेकिन लेखिका और प्रकाशक को इसे ‘उपन्यास’ कहना प्रिय है। यह किताब अप्रतिम, मूल्यवान समाजशास्त्रीय शोध-अध्ययन है, वृहद् और परिश्रम साध्य प्रोजेक्ट वर्क! इस कृति, जिसे लेखिका उपन्यास कहती हैं, की भूमिका में 54 नाम गिनाए गए हैं जिनसे, लेखिका को तथ्य-संग्रह में सहायता मिली है। ‘प्रभात खबर’ की कतरनों का उपयोग किया गया है, तो उसके प्रधान संपादक के प्रति आभार व्यक्त करना उचित ही है। इसके अलावा अन्य ग्रामीण भी हैं।
अंत में जिन पुस्तकों, पत्रिकाओं, लेखों आदि से लेखिका को मदद मिली है उनमें से कुछ के नाम दिए गए हैं, और इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका सहित पुस्तकों के नाम तो हैं ही कई-कई पत्र-पत्रिकाओं के लेखों का उल्लेख है। यह सब भी इस किताब के अत्यंत श्रमसाध्य शोध-ग्रंथ होने की ही पुष्टि करते है।
लेखिका ने एहतियातन ‘डिसक्लेभर’ भी दिया है- इस उपन्यास में मरंगगोड़ा और वहां से जुड़े तमाम पात्र, स्थान, कंपनी, खदान मिल, टेलिंग डैम, नदी, सभी प्रकार की घटनाएं, विचार, आंदोलन आदि काल्पनिक हैं। सगेन, चरिबा, आदित्यश्री, प्रज्ञा, मोमोका, मासायुकि, अरिना, जाम्बीरा, मेन्जारी, सुकुरमुनी, रेकोण्डा, लुड़धु, परगना, सचिव, सगेन की ताई, अभिषेक जैसे ढेर सारे पात्र बिल्कुल काल्पनिक हैं। उनका किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं।
लेखिका अपने उपन्यास में दिखलाना यह चाहती हैं कि मरंगगोड़ा रेडिएशन का जहर फैलाकर गरीब आदिवासियों की जान ले रहा है, और वे किताब को नाम देती हैं ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ।’ शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को पीकर (कंठ में रखकर) मानवता की रक्षा की थी। वही मानवता के रक्षक शिव नीलकंठ हैं। लेखिका का मरंगगोड़ा जहर फैला रहा है, खुद पीकर लोगों की रक्षा नहीं कर रहा।
उपन्यास-लेखक या किसी भी लेखक-लेखिका को खुद को एडिट करने का धैर्य और संयम होना चाहिए। जितनी सामग्री मिल रही है उस सब का उपयोग कर लेने के मोह से उबरना होता है। कथा-भूमि को भी विस्तीर्ण करने से समस्या बढ़ती है। ‘मरंगगोड़ा…’ को सारा कुछ कह जाने की विकलता ने नुकसान पहुंचाया है। औपन्यासिक कक्षा में यह कसावट होनी चाहिए कि बीच का एक पन्ना भी पलट जाए, तो पाठक को लगे, कुछ छूट गया। इस पुस्तक में सिंहभूम की ‘हो’ जनजाति की बोली-बानी, रीति-रिवाज को पहले पढ़ने की कोशिश की गई है, हालांकि कभी-कभी लगता है कि लेखिका यह दिखलाना चाह रही है कि हो जनजाति की भाषा की पूरी समझ उसे है।
संयोग ऐसा कि जब मैं मरंगगोड़ा पढ़ रहा था, मरंगगोड़ा (जादूगोड़ा) जाने का सुयोग बैठ गया। यूसिल के गेस्टहाउस में पांच दिन रहा। जादूगोड़ा की बस्ती और बाजार भी घूम आया। बड़ी बात यह है कि खनन क्षेत्र के भीतर नीचे तीन स्तरों तक गया। चौथे स्तर पर काम चल रहा था। हम थक भी गए थे। तीन स्तरों के बाद लौट आए। नीचे लंबी सुरंगें हैं, प्रकाश की प्रचुर व्यवस्था है। सुरंगों में रेल बिछी है। बैटरी चालित इंजन से ब्लास्ट किए गए पत्थरों को कारखने में पहुंचाते हैं जहां आटोमेटिक मशीनें बड़े पत्थरों को छोटा आकार देती हैं, फिर उनको दूसरी मशीन बारीक पीसती है। यह पाउडर पानी के बड़े-बड़े टैंकों में डाल दिया जाता है। छाई बैठ जाती है। पानी को सुखा दिया जाता है और यूरेनियम को पॉलीथीन के छोटे जिप्पर बैगों में भरकर शीशाबंद बक्से में रख दिया जाता है। हमें बताया गया कि अभी भी यह यूरेनियम पूर्णत: शुध्द नहीं है। यहां से यह हैदराबाद भेज दिया जाता है। यहां अंतिम शोधन के बाद उसे कहां किसलिए भेजा जाता है इसकी जानकारी लोगों को नहीं होती। खान के भीतर की प्रदूषित हवा को बाहर फेंकने की व्यवस्था है और तकनीक ऐसी है कि टनेल में ठंडी हवा का तेज झोंका लगातार आता रहता है। मुजे टनेल के भीतर भी पत्थर का एक भी टुकड़ा गिरा हुआ नहीं मिला। ये पत्थर इतने कीमती हैं कि बाहर सड़क पर गिरे होने का सवाल ही नहीं है।
संबंधित कारखाना भी घेरे में है, जहां प्रवेश निषिध्द है और यूसिल का पूरा कैम्पस तो एक घेरे में है ही। आबादी दूर है। यहां अपने प्रवास के दौरान मैं सबों में पूछता, ‘यहां विकिरण का कितना खतरा है?’ तरह-तरह के जवाब-मैंने यहीं सारी जिन्दगी बिताई है! यूसिल के एक आदिवासी अधिकारी ने पूरा सेवाकाल के बिताया और अब सेवानिवृत्ति के बाद दो साल के अवधि विस्तार पर कार्यरत है। एक आदमी ने कहा, ‘आपके रांची में जगह-जगह जो मोबाइल टावर लगे हैं और हर हाथ में मोबाइल है, उससे अधिक खतरा यहां नहीं है। वैसे हम हर सावधानी बरतते हैं। एक टेम्पोवाले ने कहा उसकी तीन पीढ़ियां यहीं गुजरीं। वह बलिया का था।
अंत में फिर वही सवाल कि मरंगगोड़ा तो ठीक, कोयला उत्खनन, सारंडा के जंगल की सैर आदि के विवरण मूल कथा से भटकाव और कथा को बोझिल तथा शोध ग्रंथ जैसा नहीं बनाते? अंत में सिर्फ इतना और कि फिक्शन है, तो कथारस होना ही चाहिए और फैक्ट है, तो उसे सीधे-सीधे शोध सामग्री के रूप में क्यों न रखा जाए? आवरण मुरिया आदिवासी के बैसन नृत्य का मुखौटा है, जो तो है ही, मुखपृष्ठ और आकर्षक और कल्पनाप्रवण हो सकता था।
यह सब कुछ कहने के बावजूद ‘मरंगगोड़ा…’ का महत्व कमतर नहीं होता। आलोचना नेहरू जी की होती है, मंगरा-बुधुआ की नहीं। इतनी सामग्री एकत्र करके ‘हो’ आदिवासियों की कथा कहना और मरंगगोड़ा की त्रासदी को बढ़ा-चढ़ाकर ही सही, कहना महुआ माजी के ही बूते की बात थी। इस किताब की आलोचना तो हो सकती है, उपेक्षा नहीं।


