हाई ब्लड प्रेशर-क्यों आसान शिकार होती हैं महिलाएं?
यूं तो उच्च रक्त दाब औरत हो या आदमी दोनों के लिए एक गम्भीर समस्या होती है। लेकिन पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में यह समस्या कहीं ज्यादा बड़ी और गहरी होती है। महिलाएं उम्र के बढ़ने से साथ ही उच्च रक्तदान का ज्यादा शिकार होने के कगार पर पहुंच जाती हैं। यही वजह है कि 50 साल से ज्यादा की उम्र की 60 फीसदी महिलाएं उच्च रक्त दाब का शिकार होती हैं। वैसे तो 50 की उम्र को ‘यौवन के अंत’ और ‘बुढ़ापे की शुरुआत’ की रेखा के रूप में लेते हैं। परन्तु हकीकत में हमारा शरीर जिस उम्र में शारीरिक एवं मानसिक विकास पूर्णता को प्राप्त करता है। वहीं से बदलाव की शुरुआत भी हो जाती है। यह उम्र होती है 30 (जी हां, 30) की।
स्त्रियों में पुरुषों के मुकाबले उच्च रक्त दाब का खतरा ज्यादा होता है। मोटापा होने, गर्भ धारण करने, पारिवारिक इतिहास होने जैसे पूर्वानुकूल कारकों के चलते ऐसा होता है। दरअसल कुदरत ने स्त्री को बेहद नाजुक बनाया है। वह न सिर्फ शरीर की रचना एवं क्रिया में वरन् मानसिक भावनात्मक दृष्टि से भी पुरुष से भिन्न होती है। इसी के चलते उच्च रक्त दाब कैसे विकारों से अधिक पीड़ित होती है। 50 की उम्र के आसपास स्त्रियों में मासिक धर्म बन्द हो जाता है। वह रजोनिवृत्ति को प्राप्त हो जाती है। इसके बाद उसमें कैल्शियम की कमी का दुष्परिणाम सिर्फ अस्थियों के छीजने (आस्टियोपोरोसिस) के रूप में देखने को मिलता है वरन् कैल्शियम की कमी के चलते भी उनमें उच्च रक्त दाब के मामले अधिक देखने को मिलते हैं।
हमारे शरीर के काम करने का तरीका कुदरत ने इस प्रकार बनाया है कि जन्म के 30वें वर्ष से शरीर के विभिन्न अंगों एवं संस्थानों (पाचन, श्वसन, रक्तवह आदि) को काम करने की क्षमता में कमी आनी शुरू हो जाती है जो मृत्युपरन्त लगातार बढ़ती रहती है। कार्यक्षमता में ह्रास की इस वृध्दि पर ही बुढ़ापे एवं मृत्यु का आगमन निर्भर करता है। कार्य क्षमता ह्रास हेतु जिम्मेदार प्रवृत्तियों पर शारीरिक कमजोरी, हृदय वाहिनीय विकार, चिंता एवं उच्च रक्त दाब कैसे कई कारकों का प्रभाव होता है। साथ ही मोटापा स्वयं में एक ऐसा बड़ा कारक है जो उच्च रक्त दाब समेत कई विकारों का जननी होता है।
सबसे पहले गर्भ की स्थिति को लेते हैं। मां बनना प्रत्येक औरत का नैसर्गिक अधिकार है। परन्तु यही उसके लिये जी का जंजाल भी बन जाता है, जो स्त्री जितनी जल्दी एवं जितनी अधिक (एक से) बार मां बनती है वह उतनी ही बार उच्च रक्त दाब से पीड़ित होती है। बाद में रजोनिवृत्ति होने पर लगभग स्थायी उच्च रक्त दाब से उसे जूझना पड़ता है। गर्भस्थ शिशु का विकास मां से प्राप्त पोषण पर निर्भर करता है। उसके कंकाल तंत्र के निर्माण हेतु जरूरी कैल्शियम उसे मां से प्राप्त होता है। सामान्यतः एक वयस्क स्त्री को प्रतिदिन 300 मिग्रा. परन्तु गर्भ के दौरान 1200 मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत होता है जाहिर है इसकी कम उपलब्धता के चलते मां के शरीर (कंकाल तंत्र) पर अधिक बोझ पड़ता है।
हिन्दुस्तान में अधिकांश लड़कियों का शादी 18 वर्ष की कानूनन उम्र से पहले ही हो जाती है यानी शरीर के पूर्ण विकास से पहले ही वह मां बन जाती है। गरीबी, अशिक्षा, कुप्रथा एवं कानून के ढीले पालन के चलते यह सब होता है। इसका खामियाजा लड़की को भुगतान पड़ता है और यदि पैदा होने वाला बच्चा भी लड़की हो तो कुपोषण का शुरुआत वहीं से शुरू है जाती है। इसके उलट जो स्त्रियां देर में (30-35 वर्ष) मां बनने का फैसला करती हैं उनकी कैल्शियम की जरूरत पहले ही से बढ़ी हुई होती है। गर्भावस्था से और गम्भीर बना देती है। इसलिये जिनमें पहले ही से उच्च रक्त दाब मौजूद हो या फिर रक्त दाब होने के असार हों तो उन्हें इस संबंध में गर्भधारण से पहले भलीभांति सोच विचार करना चाहिए। ठीक यही स्थिति मधुमेह के संबंध में है। दोनों का प्रबंधन एक टेढ़ी खीर होता है।
गर्भ की स्थिति में उच्च रक्त दाब होने की आशंका लगभग सभी गर्भवतियों में रहती है। इसी स्थिति में पूर्ण आराम, अस्पताल में भर्ती होना, रक्तदाब घटाने ओवाली दवाओं के प्रयोग तथा गर्भस्थ शिशु के कल्याण के बारे में सतर्कता बरतना बेहद जरूरी होता है। क्योंकि उच्च रक्त दाब एवं मधुमेह में गर्भकाल के जरिये गर्भस्थ शिशु को रक्त की आपूर्ति घट सकती है। ऐसे में जाहिर है उसका विकास प्रभावित होगा और उसका वजह घट सकता है। जिसके चलते हम वजन वाले बच्चे के पैदा होने का खतरा होता है। हाथ ही यह बच्चा अल्प रिकसित भी हो सकता है। ऐसा 36 वर्ष की उम्र की महिलाओं द्वारा गर्भ धारण की स्थिति में खासकर होता है। ध्यान रहे गर्भवती द्वारा धूम्रपान से यह खतरा और भी बढ़ जाता है यदि गर्भवती धूम्रपान नहीं भी करती है, लेकिन उसका पति धूम्रपान करता है तो भी वह इसका शिकार हो सकती है, क्योंकि पति के धूम्रपान करने के कारण वह पैसिब स्मोकर हो जाती है।
जीवन के चौथे दशक में महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या पैदा हो जाती है। यदि इस दौरान वह अपने वजन को नियंत्रण में रखें तो वह न सिर्फ उच्च रक्त दाब के नियमित हो जाने के खतरे से बच सकती हैं वरन् मधुमेह, हृदय वाहिनी विकार, उच्च कोलेस्ट्रोल, जोड़ों (कुल्हे एवं घुटने खासकर) तथा पित्त की थैली के रोगों से भी बच सकती हैं। गौरतलब है कि मात्र 15 किग्रा. (3-4 महीनों में) वजन घटने/घटाने से उम्र में चार माह और जोड़े जा सकते हैं। साथ ही वजन के घटने से सोते वक्त खर्राटे भरने से भी निजात मिलती है। जिसके चलते होने वाले श्वसन अवरोध तंत्र का खतरा टल जाता है। यह खतरा स्वयं में भर उच्च रक्त दाब का एक अलग पहचान योग्य कारण होता है।
सबसे बड़ी मुसीबत यह होती है कि उच्च रक्त दाब से पीड़ित ज्यादातर मरीजों को इसका पता नहीं चलता। विशेषकर महिलाओं में यह आदत देखी जाती है।
जीवन के छठवें दशक में यदि महिला उच्च रक्त दाब से पीड़ित है तो उसके हार्ट अटैक का खतरा 6 गुना बढ़ जाता है। यदि मधुमेह भी हो तो बचने की संभावना और भी कम हो जाती है। कहना न होगा कि ऐसे में बढ़ती उम्र के साथ उच्च रक्त दाब एवं मधुमेह दोनों को ही नियंत्रण में रखने के बारे में सचेत रहना चाहिये।


