दवा कंपनियों का काला कारोबार
यह तो चंद उदाहरण मात्र है, इसकी पूरी तस्वीर कोयले की तरह काली है, जिसे पढ़कर आम आदमी का डाक्टरी जैसे पवित्र पेशे से विश्वास उठ जाएगा। अपने फायदे के लिए डाक्टर मरीजों को ऐसी दवाइयां लिखते हैं, जिसमें मरीज का मर्ज दूर हो न हो, उनकी जेब दवा कंपनी से अवश्य भर जाए। मप्र में दवा कंपनियों और डाक्टरों का गठजोड़ दवाइयों के नाम पर मरीजों को लूटने का धंधा सालों से चलाता आ रहा है। बीमारियों के इस दौर में दवा कंपनियों की गोद में बैठकर डाक्टर करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। इंसान ईश्वर के बाद यदि किसी पर विश्वास करता है वह डाक्टर है और डाक्टर आम आदमी के विश्वास का हर दिन गला घोट रहा है।
दवाव एक, कीमत अनेक
दवा बाजार में कीमत का अंतर ही सारे गठजोड़ की जड़ है। एक ही दवा को कई कंपनियां बनाती है, लेकिन ब्रांड के मुताबिक उसकी कीमत अलग-अलग होती है। एक कंपनी की दवा यदि 40 रुपए की है तो वही दवा दूसरी कंपनी की 100 रुपए तक की हो सकती है। आप कौन सी दवा लें? यह हमारे यहां डाक्टर तय करता है और डाक्टर क्या तय करे, यह दवा बनाने वाली नामी-गिरानी कंपनियां तय करती हैं।
बिक्री बढ़ाने का है फंडा
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में दवाई कंपनियों के बीच बिक्री बढ़ाने के लिए भारी दवाब है और यह तभी संभव है जब डाक्टर कंपनी के ब्रांड की दवा लिखें। इसलिए दवा दवा कंपनियों के अधिकारियों का पूरा ध्यान डाक्टरों पर केन्द्रित रहता है। डाक्टर उनके ब्रांड की दवा लिखे, इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते है। इनके लिए वे डाक्टरों को आफर देते हैं। यह आफर कभी कैश तो कभी गिफ्ट के रूप में हुआ करता था। अब विदेश यात्रा के रूप में किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक एक वर्ष में एक डाक्टर पर दवा कंपनियां औसतन एक से डेढ़ लाख रुपए खर्च करती है।
दवाइयों की ये हैं बड़ी कंपनियां
बोकहार्ड, निकालस, फाइजर, ग्लेक्सो, केडिला, सिपला, एमपीआई, एवेंटिस, नोवाटिस, टोरेन्ट, वन फार्मास्यूटिकल, एल्डर, वैथ, मेयर, बूस्ट, एबोट।
ऐसे होती है विदेश की सैर
डाक्टर की रुचि जिस देश में सैर-सपाटा की हो, दवा कंपनियां उस देश में मेडिकल कांफ्रेंस या सेमिनार आयोजित करती है। अमेरिका के अलावा अमूमन डाक्टर बैंकाक, स्विटजरलैंड, साउथ आफ्रीका, सिंगापुर जाना पसंद करते है। यहां तक कि जिस देश का नाम मेडिकल साइंस के क्षेत्र में कोई स्थान नहीं रखता, किन्तु मौज-मस्ती के पर्याप्त साधन उपलब्ध है, वहां भी डाक्टरों के कहने पर कांफ्रेंंस रखी जाती है।
क्या है नियम? हो क्या रहा है? क्यों?
बिना पर्ची के बिकने वाली दवाइयों का विज्ञापन किया जा सकता है। किन्तु दवा बनाने वाली कंपनियां इससे ज्यादा ध्यान डाक्टरों पर देती है। सभी तरह की दवा और टानिक डाक्टरों से पर्ची पर लिखवाकर बेचती है। प्रचार की तुलना में यह तरीका उन्हें ज्यादा पसंद है, क्योंकि पर्ची पर लिखी दवा खरीदने वाला मरीज अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के ग्राहक की भांति न तो मोल भाव करता है और न ही यह सवाल कि फलां ब्रांड की कीमत तो कम है। दवाएं नगद में बिकती है और एमआरपी अर्थात अधिकतम खुदा मूल्य में बिकती है।
क्या कहते हैं पेशे से जुड़े लोग
एक मेडिकल रिप्रजेंटेटिव ने कहा-यह सत्य है कि दवा कंपनियां अपने महंगे उत्पाद लिखने के लिए डाक्टरों को विदेशों की सैर कराती है। बहाना सेमिनार या कांफ्रेंस का होता है, किन्तु वहां करते हैं मौज-मस्ती। ज्यादातर बैंकाक, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका, स्विट्जरलैंड जाते हैं। ऐसी जगह भी जिसका मेडिकल साईस में कोई महत्व नहीं है।
शासकीय चिकित्सालय के कंपाउंडर ने बताया
एक नसबन्दी शिविर में डाक्टर ने प्रोटीन पाउडर और सीरप के नाम पर्ची पर लिखकर दिया और मुझसे कहा कि सभी को यह दिलवा दो। शिविर में 40 महिलाओं ने उसे खरीदा। जिस डिब्बे की कीमत 30 रुपए है, वह मेडिकल स्टोर से एमआरपी 140 रुपए में हरेक महिला को खरीदना पड़ा।
दवाएं बिकवाने का रोचक मामला
डाक्टर से अपनी कम्पनी का दवाएं बिकवावने का एक रोचक मामला ऐसा भी है। प्रदेश के एक शासकीय चिकित्सालय के डाक्टर और हैदराबाद की एक फार्मास्यूटिकल कम्पनी के बीच स्टांप पेपर का लिखित एग्रीमेंट हुआ था। कुछ समय बाद दवा कम्पनी के स्टॉकिस्ट ने स्वास्थ्य विभाग के मुख्यालय मे लिखित शिकायत में कहा कि डाक्टर द्वारा एग्रीमेंट का उल्लंघन करने पर किसी दूसरी कम्पनी की दवाएं लिखी जा रही हैं। कम्पनी द्वारा डाक्टर को दवाएं लिखने के लिए 1.5 लाख रुपए की राशि अदा की गयी थी। स्टाकिस्ट की लिखित शिकायत पर जांच की गयी और आरोप सही पाये जाने पर डाक्टर इस तरह की प्रैक्टिस से बचें।
दवा कम्पनी ने दी डाक्टर को दस लाख की मशीन
भोपाल के एक डाक्टर को कुछ वर्ष पहले एक दवा कम्पनी ने दस लाख रुपए मूल्य की अमेरिकन मशीन दी है। बतौर ऐहतियात मशीन के कागजात एक अन्य व्यक्ति के नाम पर बनवाए गये हैं। अलबत्ता मशीन डाक्टर के यहां लगी है। बीपी कोलिन नाम की यह मशीन धमनियों में वसा के जमाव का परीक्षण करती है। दवा कम्पनी ने यह मशीन इसके मूल्य का आठ गुना बिजनेस देने की शर्त डाक्टर साहब को दी थी।
दवाएं भी होती हैं फैंसी
दवा कम्पनी की सेहत बनाने डाक्टर मरीज को पर्चे में दवा के साथ जो लिखते हैं, उन्हें मेडिकल के पेशे में फैंसी ड्रग कहा जाता है। ये होते हैं प्रोटीन, विटामिन और आयरन वाले उत्पाद।
सर्जिकल आइटमों में भी भारी मुनाफा
सर्जिकल आइटम बनाने वाली कम्पनियां भी भारी मुनाफा कमा रही हैं। स्लाइन चढ़ाने वाली किट की कीमत 3 रुपए होती है, जिसे 27 रुपए में बेचा जाता है। डिस्पोजल सिरिंज की कीमत 1 रुपए है, जो 5 रुपए में बिकवाई जाती है। शुगर और हृदय रोगियों का इलाज करने वाले विशेषज्ञों के पेशेंट जिन्दगी भर के लिए होते हैं। इन बीमारियों की दवाएं भी महंगी होती हैं।
बांग्लादेश में यहां से अच्छी व्यवस्था
बांग्लादेश की सरकार ने 90 प्रतिशत बीमारियों के इलाज के लिए 200 सामान्य नामों वाली दवाइयों के विक्रय को मंजूरी दी है। इन दवाओं का मूल्य ब्रांडेड दवाओं से 1/10 हिस्सा कम होता है।
अल्केम ने टैक्सिम से कमाए करोड़ों
अल्केम कम्पनी ने आज से दस-बारह वर्ष पूर्व एक इंजेक्शन टैक्सिस 1 ग्राम लांच किया था, तब उसकी कीमत थी 72 रुपए, लेकिन महंगाई बढ़ने के बावजूद आज इसकी कीमत हो गयी 34 रुपए 96 पैसे। कारण अब उसे कई कम्पनियां बना रही हैं। अल्केम द्वारा आधी से कम कीमत कर दी गयी। फिर भी मुनाफा है। समझा जा सकता है कि इतने वर्षों में अल्केम कम्पनी ने सिर्फ इस इंजेक्शन से कितनी कमाई की होगी।
मरीजों की लूट के लिए छूट की जिम्मेदार है सरकार
भारत में गरीबों का प्रतिशत काफी ज्यादा है। यहां दवा कम्पनियों और डाक्टरों की मिलीभगत से हो रही मरीजों की लूट के खिलाफ स्वास्थ्य और रसायन मंत्रालय को मदक उठाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई दवाओं को मूल्य नियंत्रण की सीमा में लाने का आदेश दिया है। केन्द्र की यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भी यह प्रावधान है कि लोगों को दवाएं सस्ती मिलनी चाहिए। किन्तु इन साढ़े चार सालों में केन्द्र सरकार दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिए असरदार कदम नहीं उठा सकी।
होना क्या चाहिए?
- अन्य कई देश की तरह भारत में भी डाक्टर पर्ची पर दवा के ब्रांड की जगह केमिकल का नाम लिखें।
- दवा का फार्मूला एक होने पर भी अलग ब्रांड और जेनेरिक रेंज होने से दवा की कीमत में जमीन-आसमान का अंतर है। इसे समाप्त करने के लिए सख्त कानून बनाएं जाएं।
क्या कहा एमसीआई ने
मेडिकल क्षेत्र और डाक्टरों से जुड़ी देशी संस्थाओं को लिखे एक पत्र में एमसीआई ने आगाह किया कि फार्मा कम्पनियों से किसी भी प्रकार का उपहार लेना इस पवित्र पेशे की आचार संहिता के खिलाफ है। 13 अप्रैल, 2008 को लिखे अपने इस पत्र में मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने स्पष्ट तौर पर सभी से इन मुद्दों पर गाइडलाइन तैयार करने के लिए सुझाव मांगे हैं।


