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न्यायमूर्ति स्वर्गीय जगमोहनलाल सिन्हा

12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के विरुध्द समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा प्रस्तुत चुनाव याचिका स्वीकार कर रायबरेली संसदीय चुनाव क्षेत्र से उनका निर्वाचन रद्द कर दिया व छह वर्ष तक उन्हें कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया।
यह घटना 37 वर्ष पूर्व की है। उक्त कालखंड में जन्मे व अब युवा वर्ग ने कदाचित न्यायमूर्ति जगमनोहन लाल सिन्हा का नाम भी नहीं सुना होगा।
उल्लेखनीय है कि इस ऐतिहासिक व अभूतपूर्व निर्णय के गर्भ से ही आपातकाल का जन्म हुआ। जयप्रकाश, मोरारजी व अन्य हजारों लोग जेल भेजे गये। संविधान का हनन हुआ। मौलिक अधिकार स्थापित कर दिये गये। अखबारों पर सेन्सरशिप लगा दी गई। देश में प्रजातंत्र को कुचलने का काला अध्याय लिखा गया।
अंतत: जनता जागी व 1977 में कांग्रेसी शासन का अन्त हुआ। इंदिराजी स्वयं रायबरेली से राजनारायण के हाथों पराजित हुई। संविधान की पुर्नप्रतिष्ठा होकर जनतंत्र जागृत हुआ।
न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश थे जिनके समक्ष चुनाव याचिका की सुनवाई हुई। साक्ष्य के लिये इन्दिराजी कठघरे में आने वाली थी उसके पूर्व जज सिन्हा ने धीर गंभीर आवाज में खचाखच भरे कोर्ट में निर्देश दिया कि श्रीमती इन्दिरा गांधी के न्यायालय कक्ष में आने पर कोई भी व्यक्ति अपने स्थान से नहीं उठेगा। सब अपने-अपने स्थान पर बैठे रहेंगे और यही हुआ। यद्यपि जज ने साक्ष्य देते समय इन्दिराजी को कुर्सी पर बैठकर बयान देने की आज्ञा दे दी थी। यह न्यायपालिका का स्वर्णिम क्षण था जब एक प्रधानमंत्री को भी न्यायालय के नियमों से ढील नहीं दी गई थी।
माननीय सिन्हा एक निर्भीक, ईमानदार,र् कत्तव्यनिष्ठ व देश के संविधान व कानून के प्रति प्रतिबध्द न्यायाधीश थे।
सिन्हा ने 258 पृष्ठों का अपना निर्णय न्यायालय में पढ़कर सुनाया व अन्त में चुनाव याचिका स्वीकृत करने का क्रियात्मक आदेश घोषित किया। 12.6 को ठीक दस बजे निर्णय सुनाते ही पूरे देश में भूचाल सा आ गया। कम ही लोग जानते हैं कि न्यायाधीश सिन्हा के स्टेनोग्राफर नेगीराम निगम जिन्हें 11 व 12 जून की मध्य रात्रि को निर्णय लिखाया गया था वे इसके बाद से ही अपनी पत्नी सहित अपने निवास से गायब थे व इन्टेलीजेन्स ब्यूरो व अन्य जासूस भी निर्णय सुनाते तक उन्हें नहीं खोज पाये थे। निर्णय लिखाने व सुनाने की पूरी अवधि में न्यायाधीश सिन्हा व उनके स्टेनो नेगीराम किसी से भी नहीं मिले न उनसे कोई मिल पाया था।
कुलदीप नैयर की प्रसिध्द पुस्तक दी जजमेन्ट में लेखक ने उत्तरप्रदेश के एक संसद सदस्य द्वारा जस्टिस सिन्हा को 5 लाख रुपया रिश्वत (जो आज के 5 करोड़ से भी अधिक हैं) देने के प्रस्ताव का जिक्र किया है। यही नहीं उन्हें तब के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.एस. माथुर द्वारा याचिका खारिज करने पर उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनाने का प्रस्ताव दिया गया था पर ये दोनों प्रस्ताव न्यायाधीश सिन्हा द्वारा ठुकरा दिये गये। उन्हें कोई भी प्रलोभन नहीं डिगा सका।
सन् 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आने पर उन्हें हिमालय प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने का प्रस्ताव भेजा गया जिसे भी सिन्हा ने नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।
वे अति महत्वाकांक्षी अथवा लोभी लालची व्यक्ति नहीं थे। वे अन्तरात्मा की आवाज एवं संवैधानिक तथा न्यायिक प्रतिबध्दता व ईमानदारी को ही सर्वोपरि मानकर जीवन पर्यन्त न्याय का पथ प्रशस्त करते रहे। वे शुध्द अंत:करण से वस्तुनिष्ठ सत्य निष्ठावान सतत कर्तव्यरत कर्मयोगी रहे।
चारों ओर फैले लोभ लालच के समन्दर में न्यायमूर्ति सिन्हा ईमानदारी के अविचल टापू की तरह दृढ़ रहे।
वे अब हमारे बीच नहीं है पर देश के न्यायिक इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों से लिखा जावेगा। इस महान न्यायाधीश को हम सबका नमन।

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