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झारखंड में एड्स का खतरनाक प्रसार

झारखंड में एचआईवी एड्स पीड़ितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन राज्य सरकार को यह अहसास नहीं हो रहा है कि इस खतरनाक बीमारी की जड़ें लगातार कितनी गहरी होती जा रही हैं। इसी माह एक से 17 जुलाई के बीच सत्रह पोजिटिव मामले सामने आये। साथ ही तेरह दिनों में सिर्फ रिम्स में जांच के लिए 240 नमूने भेजे गये हैं ये आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि भयभीत करने वाले भी हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक की सहायता से इस जानलेवा बीमारी पर नियंत्रण के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। बावजूद उसके राज्य में एचआईवी पॉजिटिवों की संख्या बढ़कर साढ़े तीन हजार के पास पहुंच गयी है। इस बीमारी से कई मौतें भी हो चुकी हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य में एड्स कंट्रोल सोसाइटी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रही है। सभी क्षेत्रों में बदहाल झारखंड के लिए यह नयी और खतरनाक चुनौती विस्फोटक रूप में सामने है। भूख, बीमारी और गरीबी से जूझ रहे लोग झारखंड से बड़ी संख्या में काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं और इनमें से कई लोग अपने साथ एड्स के रूप में मौत की सौगात लेकर लौटते हैं। हजारीबाग के विष्णुगढ़, गिरिडीह, कोडरमा, गढ़वा और पलामू तथा राजमार्गों के आसपास के इलाकों के ग्रामीण इस रोग से विशेष रूप से प्रभावित हैं। दूसरे राज्यों से झारखंड के ढाबों आदि में आने वाले ट्रक ड्राइवर भी इस रोग के वाहक होते हैं। सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि राज्य में इस बीमारी की जांच के लिए इतनी सुविधाएं नहीं हैं जितनी जनसंख्या के आधार पर होनी चाहिए। साथ ही इस बीमारी में मरीज के प्रति घृणा और हिकारत का भाव रहता है। यह आम धारणा है कि एड्स चरित्रहीनों को होता है। इस कारण भी इस बीमारी को छुपाया जाता है जो मरीजों के लिए अत्यंत घातक होता है। चिंता का एक कारण यह भी है कि आने वाले दिनों में इस प्राण घातक बीमारी की सबसे अधिक शिकार महिलाएं होने वाली हैं क्योंकि हमारे देश में महिलाएं अपने पति से सुरक्षित यौन संबंधों की बात नहीं कर सकतीं। इसलिए जरूरी है कि एड्स कंट्रोल सोसाइटी तथा इस क्षेत्र में काम करने वाली विभिन्न संस्थाएं न केवल इस बीमारी के प्रति गांव-गांव में जागरूकता अभियान तेज करें बल्कि सरकारी स्तर पर स्वैच्छिक परामर्श एवं जांच केन्द्रों का जाल बिछाने का काम युध्द स्तर पर शुरू किया जाए।

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