यूपी में कांग्रेस का पुनरुध्दार असंभव
जैसे उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति पद के चुनाव में सर्वाधिक मत पाने के बावजूद कांग्रेस के इस राज्य में पुनुरुध्दार की कोई संभावना नहीं है। वैसे ही राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपकर कांग्रेस महंगाई और भ्रष्टाचार की पर्याय बनकर जनता मे ंजो क्षोभ पैदा कर चुकी है उससे उबर नहीं सकती। यदि हम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के निरंतर पतन पर दृष्टि डालें तो यहां के साथ हीं सारे देश में उसकी स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का शासन सर्वाधिक समयय तक रहा है फिर भी उसने अपने किसी भी मुख्यमंत्री को एक के बाद दूसरे निर्वाचन तक सत्ता में नहीं रहने दिया।
ब्राह्मण विरोधी सीताराम केसरी
पिछले तेइस वर्ष से कांग्रेस का प्रभाव घटता ही जा रहा है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अपने ‘सर्वश्रेष्ठ’ नेता को गांव-गांव दौड़ाने के बाद भी कांग्रेस का उध्दार नहीं हो पाया। इसका कारण यह है कि उसने अपनों पर भरोसा करने के बजाय ‘बाहरवालों’ को ज्यादा महत्व दिया। इसकी शुरूआत 1990 में हुई। जनता दल जो विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में केन्द्र में और मुलायम सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ था, उसका विभाजन हो गया। अजीत सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाला पक्ष रेवती रमण सिंह के नेतृत्व में विपक्ष में बैठ गया। मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में हो गई। इस राजनीतिक स्थिति पर विचार करने के लिए उत्तर प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की गई। राजीव गांधी कांग्रेस अध्यक्ष और संसदीय दल के नेता भी थे। उनके प्रतिनिधि के रूप में सीताराम केसरी इस बैठक में शामिल होने के लिए आये थे। मेरी केसरी से बातचीत 1972 से थी जब वे कांग्रेस पार्टी का चुनाव कराने के लिए उत्तर प्रदेश आये थे और पंडित कमलापति त्रिपाठी के निवास पर उनको धक्का मुक्की से बचाकर मैने कार में बैठा दिया था। उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय नेहरू भवन बुलाकर मुझसे पूछा क्या किया जाय। मैने कहा सरकार गिर जाने दीजिए, चुनाव होगा आपकी पार्टी सत्ता में आ जाएगी। केसरी गंभीर हो गए फिर बोले मेरी पार्टी के सत्ता में आने का मतलब है राजेन्द्र कुमारी वाजपेयी नारायण दत्त तिवारी, श्रीपति मिश्र या कोई ब्राह्मणों ही मुख्यमंत्री होगा। देश को बिनाश से बचाने के लिए ब्राह्मण का विनाश जरुरी है। मैने हंसकर कहा केसरी जी यह तो मै नहीं जानता कि ब्राह्मण का विनाश होगा या नहीं लेकिन यदि आपने सरकार को समर्थन दिया तो कांग्रेस का विनाश जरूर हो जाएगा। रात्रि में नारायण दत्त तिवारी ने मुझे फोनकर पूछा केसरी जी से क्या बात हुई। मैने पूरा विवरण बताते हुए उनसे कहा-यदि आप लोग समर्थन करेंगे तो खत्म हो जायेंगे क्योंकि इस समय जनभावना मुलायम सिंह के बहुत खिलाफ है। लेकिन राजीव गांधी ने मुलायम सिंह की सरकार को समर्थन की घोषणा कर दी। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के किसी नेता में डटने का साहस नहीं था। परिणाम क्या हुआ। 1991 के चुनाव में चौथे क्रम की पार्टी भाजपा सत्तारूढ़ हो गई। मुलायम सिंह की पार्टी कुल 32 सीटों पर सिमटकर रह गई। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपनों पर भरोसा करने के बजाय बेनी प्रसाद वर्मा जो केन्द्रीय इस्पात मंत्री है और चुनाव के बाद से विलुप्त हो गए हैं तथा रसीद मसूद पर अधिक भरोसा किया। विधानसभा चुनाव में आधे से अधिक टिकट प्राय: इन्हीं दोनों की संस्तुति पर उन लोगों को दिये जो ऐन चुनाव के समय कांग्रेस में इसलिए शामिल हो गए थे क्योंकि उनके अपने दल से टिकट पाने की गुंजाइश नहीं थी।
सलमान खुर्शीद चाहे जितनी सफाई दें कि पार्टी की दिशाहीनता की उनकी अभिव्यक्त राहुल गांधी के खिलाफ नहीं थी लेकिन उनका यह कहना कि राहुल गांधी नए कार्यक्रम और नीति के साथ आगे आये राहुल गांधी की क्षमता पर भीतर से उठने वाली आवाज का नमूना ही है। दरअसल उत्तर प्रदेश के दो चुनाव में राहुल गांधी के गांव-गांव घूमने के बावजूद मिली असफलता से उनकी क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है लेकिन कांग्रेस में ‘परिवार’ की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगाना ‘अपराध’ है। वैसे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार में सलमान और दिग्विजय सिंह का योगदान कम नहीं है।
कांग्रेस का पुनर्भव असंभव
उत्तर प्रदेश का कांग्रेसी तो बहुत ही हताश और निराश है। ऐसे में यदि यह कहा जाय कि कांग्रेस का पुनर्भव असंभव है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए अस्सी सदस्य चुने जाते हैं। यहां कांग्रेस युवराज राहुल गांधी और प्रियंका को बाल बच्चों सहित चुनाव मैदान में उतारकर भी उसे जो परिणाम हासिल हुआ है उसने तो यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में ‘परिवार की चमत्कारिकता’ अब बेमाने हो गई है। सत्ता की बुराइयों से संघर्ष करके ही कोई दल सत्ता के लिए विकल्प बन सकता है। कांग्रेस की केन्द्रीय सत्ता बुराइयों का पर्याय बन गई है और उत्तर प्रदेश में उसे सत्ता में संघर्ष की क्षमता नहीं है तो फिर उसका उध्दार होगा कैसे? क्या वह तामिलनाडूं या बिहार के समान देश की सबसे बड़ा राज्य और कांग्रेस को चार-चार प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश भी उस्सी स्थिति में नहीं आ गया है?
कांग्रेस की जो तस्वीर उत्तर प्रदेश में उभरी है वह बिहार की पुनरावृत्ति ही है। दोनों राज्य राज्य के चुनाव में राहुल गांधी के नाम पर कांग्रेस ने वोट मांगे थे। कांग्रेस नेहरू गांधी परिवार की चमत्कारिता के भरोसे ही अपनी सफलता का आकलन करती रही है। इसीलिए राष्ट्रीय समस्याओ पर मौन और क्षेत्रीय तथा वर्गीय भावनाओं को उभारकर मत पाने का भी उसका प्रयास असफल हो चुका है। सोनिया गाधी और उनके पुत्र राहुल गांधी के हुक्म से ही मनमोहन सिंह सरकार हिलती डुलती है तो फिर राहुल गांधी को और कौन सी बड़ी जिम्मेदारी सौंप कर वह जनमानस को अनुकूल बनाने की आस लगाये बैठी है। जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त्र है। राहुल गांवी चाही कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष या मनमोहन मंत्रिमंडल के सदस्य। क्या इतने मात्र से इन दोनों मोर्चा पर कांग्रेस लड़ सकती है। आज यदि एनसीपी उससे छुटकारा पाना चाहती है या फिर जनता को यह बताना चाहती है कि जो कुछ केन्द्रीय सरकार कर रहा है उसमें मेरी भागीदारी नहीं है तो उसका कारण इन मोर्चा पर असफलता से कांग्रेस और उसकी सरकार को समर्थन देने वाले दलों के प्रति जनता में बढ़ता हुओ रोष है। कांग्रेस के पास आम आदमी के हित के लिए कोई कार्यक्रम या नीति नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी नीयत भी नहीं है अन्यथा पढ़ाई के लिए बैंक से कर्ज बारह प्रतिशत ब्याज पर और कार खरीदने के लिए सात प्रतिशत की नीति न अपनायी जाती। यूपीए शासन में कुछ लोग बहुत धनी होकर विश्व में धनपतियों में शामिल हो गए हैं लेकिन भूख से या कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने वालों की संख्या में बहुत इजाफा हुआ है।
उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव से राहुल गांधी की क्षमता का नमूना मिल चुका है। उन्हें चाहे जिस पद पर कांग्रेस बैठाये उसकी उध्दार संभव नहीं है क्योंकि सबसे भ्रष्ट मंत्रिमंडल के मुखिया होने के नाते अब लोगबाग मनमोहन सिंह की असफलता के लिए श्री सोनिया गांधी और राहुल गांधी को खुलकर नाम लेने लगे हैं। राष्ट्रपति चुनाव में भारी बहुमत से जीतने के बाद कांग्रेस के लिए यह उम्मीद करना कि उन्हें मत देने वाले दल 2014 में भी साथ रहेंगे, मृगमरीचिका से ज्यादा कुछ भी नहीं है। सभी को मालूम है कि कांग्रेस की नौका डूब रही है, ऐसे में रिमोट संचालन से सीधे संचालन में प्रगट होकर राहुल गांधी उसका और गर्त करने वाले ही साबित होंगे।


