वोट बैंक की राजनीति का कहर
मनमोहन सिंह ने असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को असम में जातीय-साम्प्रदायिक हिंसा पर काबू पाने के लिए हर संभव उपाय करने को कहा है। प्रश्न है किसी मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री की ओर से इस तरह की नसीहत देने की कितनी आवश्यकता है। एक ऐसा कार्य जो किसी भी मुख्यमंत्री का संवैधानिक दायित्व है, उसके लिए प्रधानमंत्री की मंत्रणा की प्रतीक्षा की भी किसी को जरूरत है क्या। असम में हिंसा का वर्तमान दौर राज्य में अवैध ढंग से प्रवेश करने वाले बांग्लादेशी मुस्लिम समुदाय और बोड़ो आदिवासियों के बीच झड़प से आरंभ हुआ। आल बोडो मुस्लिम स्टूडेन्ट्स यूनियन के दो प्रमुख कार्यकर्ताओं की हत्या की प्रतिक्रिया में आल बोडो स्टूडेन्ट्स यूनियन के चार प्रमुख कार्यकर्ताओं की हत्या ने आग में घी का काम किया। ईंट का जवाब पत्थव से देने, हिंसा का जवाब हिंसा और प्रतिहिंसा से देने से नफरत की जो आग फैलती और प्रतिक्रिया-शृंखला चलती है, वह पुलिस या सेना की लाठी-गोलियों से नहीं दबायी जा सकती है। वस्तुस्थिति यह है कि असम की समस्या राज्य व केन्द्र की कांग्रेस सरकारों की लापरवाही, अक्षमता और वोट बैंक की राजनीति की उपज है। पिछले पांच दशक से यह समस्या विकट से विकटतर होती जा रही है। लेकिन सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं। असम और देश के अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बाहरी-भीतरी का विवाद बढ़ता जा रहा है। बांग्लादेशी मुसलमानों के अवैध प्रवेश से विकास का असंतुलन भी बढ़ता जा रहा है। स्थिति विकराल होती जा रही है। असम में पिछले दो दशकों में तालिबान, अलकायदा और पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. से संबध्द कई जिहादी गुटों की सक्रियता बढ़ गयी है। समय आ गया है कि वोट बैंक की राजनीति और ढिलमुल प्रशासनिक क्रियाविधि को त्यागकर इस अति गंभीर राष्ट्रीय समस्या के समाधान के ठोस कदम उठाये जायें।


