जरूरी है आजाद इंटरनेट
भले इंटरनेट की दुनिया वर्चुअल या आभासी दुनिया हो, लेकिन हाल के सालों ने यह साबित किया है कि यह आभासी दुनिया भी बेहद प्रभावशाली है। शायद यही वजह है कि अब उन तमाम देशों में भी इंटरनेट को लेकर सरकारें संवेदनशील हो गई हैं जो इसे पहले कतई भाव नहीं देती थी। चाहे अरब बसंत का आगाज हो, ट्यूनेशिया में हुई क्रांति हो या मिस्र में होस्नी मुबारक की विदाई। सबमें इंटरनेट की जबरदस्त भूमिका उभरकर सामने आयी है और यह भूमिका हर गुजरते दिन के साथ और ज्यादा मजबूत होती जा रही है। मध्यपूर्व में लगातार राजनीतिक आंदोलन मजबूत हो रहे हैं तो इसमें सबसे अहम भूमिका इंटरनेट की है। अरब देशों में अगर औरतों की आजादी की सुगबुगाहट सिर उठा रही है तो कहीं न कहीं जिम्मेदार इंटरनेट ही है।
इंटरनेट की ताकत
इंटरनेट की अब इस ताकत और महता को राष्ट्र संघ की मानवाधिकार परिषद ने भी स्वीकार किया है और इंटरनेट को आजादी के नए हिरावल का दर्जा दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने पहली बार इंटरनेट के स्वतंत्रता सम्बंधी एक प्रस्ताव पारित किया है। इस प्रस्ताव को 85 देशों ने समर्थन किया है जिसमें से 30 देश एचआरसी के सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस प्रस्ताव में सभी देशों की सरकारों से अपने नागरिकों को इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी देने की अपील की है। हालांकि यह शर्म की बात है कि भारत ने इसका विरोध किया है। सिर्फ भारत ही नहीं चीन और रूस जैसे दुनिया के दो और ताकतवर देशों ने भी इसका विरोध किया है। यह हैरान करने वाली बात है कि हम वैसे तो दुनिया के सबसे बड़े, निरंतर और लचीले लोकतंत्र हैं। लेकिन जब भी लोकतात्रि मूल्यों को समर्थन देने की बात आती है हम अकसर नाकाम रहते हैं। चीन को तो समझा जा सकता है, क्योंकि जिन दिनों मिस्र में होस्नी मुबारक के विरुध्द थियानमन चौक आंदोलन का गढ़ बना हुआ था, उन दिनों चीन ने अपने यहां तमाम सोशल साइटों पर बैन लगा दिया था। कई दुसरे मौकों पर भी उसने ऐसा किया है। हालांकि रूस ने कभी भी ऐसा नहीं किया, लेकिन सोवियत संघ के टुटने के बाद से उसकी लोकतांत्रिक प्रतिबध्दताओं पर उसकी दुनिया ज्यादा भरोसा नहीं करती और जिस तरह से वह आजादी की मांग करने वालों से जूझ रहा है, वैसे में इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी के लिए उसके डर को समझा जा सकता है।
लेकिन हिंदुस्तान में तमाम आरोपों के बावजूद व्यवहारिक रूप में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए स्पेस की मौजदूगी दिखती है। यह अलग बात है कि कपिल सिब्बल जैसे कुछ नकचढ़े मंत्री जिनको लगता है कि लोकतंत्र उनकी जेब की चीज है, वह तमाम सोशल साइटों का विरोध कर रहे हैं और पिछले दिनों फेसबुक सहित तमाम साइटों को अदालत तक भी खींचा गया। इसके बावजूद हिंदुस्तान में इस मीडिया की तारीफ करने वाले और उसकी आजादी के पक्षधर विरोधियों से बहुत ज्याद है। फिर भी हिंदुस्तान ने इस प्रस्ताव का विरोध करके दुनिया के सामने अपनी गैर लोकतांत्रिक छवि पेश की है। लोकतंत्र सिर्फ व्यवहार में, अमल में ही नहीं दिखना चाहिए बल्कि उसकी माहौल में भी मौजूदगी होनी चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक संप्रभू गणराज्य की यह खासियत होनी चाहिए। लेकिन भारत के साथ यह बेहद विचित्र बात है कि हम व्यवहार में लोकतांत्रिक हो, लेकिन हमारे यहां का माहौल अमूमन गैर लोकतांत्रिक रहता है।
बहरहाल इंटरनेट की आजादी का समर्थन करके राष्ट्र संघ ने दो बड़े काम किये हैं। एक तो लोकतंत्र की परोक्ष महत्ता को तय किया है और दूसरा यह साबित किया है कि आज की तारीख में अभिव्यक्ति आजादी का एक बड़ा मोर्चा है, जिसे हर सभी देशों को समर्थन करना चाहिए। हालांकि ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि जिन देशों में लोकतंत्र नहीं है या जो सरकारें लोकतंत्र के प्रति मित्रवत नहीं है, वो जानती हैं कि अभिव्यक्ति एक बहुत ही तेज दुधारी तलवार है, जो भले किसी की भी हाथ में हो पर सबके लिए खतरनाक है। एक बार जब अभिव्यक्ति का सिलसिला शुरु हो जाता है तो यह सिलसिला कितना ही गैर लोकतांत्रिक क्यों न शुरू हो अंत में यह सिलसिला कितना ही गैर लोकतांत्रिक क्यों न शुरू हो अंत में यह लोकतांत्रिक धारा की तरह मुड़ ही जाता है। वैसे भीकहा जाता है आंदोलन चाहे सांस्कृतिक हों या फासीवादी। अगर लम्बे समय तक चले तो अंत में लोकतंत्र के समर्थक हो जाते हैं।
दुनिया का सबसे बड़ा मंच
इंटरनेट आज की तारीख में देखा जाए तो व्यवहारिक तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा मंच है। यह एक ऐसा मंच है जहां करोड़ों करोड़ लोग एक दूसरे से मिलते हैं और मजेदार बात यह है कि यह मंच किसी खास वर्ग, समुदाय, सोच या प्रतिष्ठान के लिए आरक्षित नहीं है। यहां हजारों रंग, रूप और विचार के लोग हर रोज आपस में एक दूसरे के साथ इंटरैक्ट होते हैं। इनकी कोई निश्चित हैसियत नहीं होती और न ही निश्चित बौध्दिक स्टेटस। इनमें सभी तरह के लोग होते हैं। छात्र, कारोबारी, नौकरीपेशा, लेखक, पत्रकार, निठल्ले और हर बात को मनोरंजन के रूप में लेने वाले। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर लोगों के आपस में मिलने, विचारों के आदान-प्रदान करने से दुनिया की एक साझा राय तो बनती ही है फिर भले ही यह मिलन वास्तविक न होकर आभासी ही क्यों न हो। यह इसी मिलन का नतीजा है कि हाल के सालों में दुनिया के कई देशों में परिवर्तन हो गए और इन परिवर्तनों में इंटरनेट की अहम भूमिका रही। साथ ही भविष्य में दर्जनों देश ऐसे ही परिवर्तनों की तरह बढ़ रहे हैं और वहां भी इंटरनेट बुनियादी ऊ र्जा मुहैय्या कराने वाली भूमिका में है। हजारों, लाखों, करोड़ों विचारों का इंटरनेट में हर रोज आदान-प्रदान होता है। इंटरनेट ने हमें कई तरह से जीवन जीने में सुविधा दी है। उसे बेहतर बनाया है। आज इंटरनेट महज आजादी की स्थूल लड़ाई ही नहीं लड़ रहा है बल्कि कई मोचों पर लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है। भ्रष्टाचार के विरुध्द जितनी लड़ाई वास्तविक दुनिया में हो रही है, उससे कई गुना ज्यादा बड़ी और मजबूत लड़ाई इंटरनेट में हो रही है। इंटरनेट ने हमारे मनोरंजन को जहां काल्पनिक आयाम दिये हैं, वहीं हमारी संचार क्षमताओं को भी कई गुना ज्यादा बढ़ दिया है। इंटरनेट की बदौलत ही आज खरबों रुपये का कारोबार हो रहा है। लाखों लोगों की जानें बच रही हैं और करोड़ों लोगों को समय पर जरूरी जानकारियां मिल रही हैं। इंटरनेट ने एक तरह से हमारे जीने के ढंग को आमूलचू ढंग से बदलकर रख दिया है। इसमें इसके नुकसानों का भी बड़ा हिस्सा है। इंटरनेट सिर्फ फायदेमेंद ही नहीं है इसके तमाम नुकसान भी हैं। लेकिन अंतिम तौर पर अगर देखा जाए तो इंटरनेट हमें फायदा पहुंचाता है, हमें आगे ले जाने के लिए है। ऐसे में यह आजाद होना ही चाहिए।


