चंदूलाल शाह : मौजूदा बॉलीवुड फिल्मी ट्रेंड के जन्मदाता
कुछ लोग किसी क्षेत्र में संयोग से या दुर्घटनावश आते हैं और बाद में ऐसा लगता है कि जैसे वह इसी क्षेत्र के लिए बने थे। चंदूलाल शाह भी भारतीय सिने इतिहास में ऐसी ही हस्ती हैं। वह एक प्रकार से दुर्घटनावश या कहें संयोग फिल्मों में आये थे और अपने दौर के सबसे कुशल व्यावसायिक फिल्मकार बने। एक बार संयोग से ही सही इस क्षेत्र में आने के बाद चंदूलाल शाह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगता है जैसे वह इस क्षेत्र में नहीं आये होते तो हिन्दी के व्यावसायिक सिनेमा का नुकसान होता। क्योंकि आज हिन्दी का व्यावसायिक सिनेमा जिस तरह का है उसमें एक बड़ी भूमिका चंदूलाल शाह जैसे प्रैक्टिकल फिल्मकारों की भी है।
माहिर निर्देशक
चंदूलाल जयसिंह भाई शाह का जन्म सन् 1898 में हुआ था। वह कॉमर्स से स्ातक थे और पढ़ाई करने के बाद शेयर बाजार के कारोबार में लग गये थे। चंदूलाल के बड़े भाई दयाराम शाह भी वैसे तो शेयरों की खरीदफरोख्त का ही काम करते थे लेकिन साथ ही साथ वह फिल्मों के लिए कहानियां भी लिख दिया करते थे। बीच-बीच में चंदूलाल अपने बड़े भाई का हाथ बंटा दिया करते थे। चंदूलाल शाह को सन् 1925 में संयोग से एक फिल्म के निर्देशन का मौका मिला। दरअसल वह अपने बड़े भाई की लिखी कहानियों पर होन वाली शूटिंग को देखने स्टूडियो पहुंच जाया करते थे। वहां वो निर्देशकों के साथ बड़े दोस्ताना स्वभाव से वक्त गुजराते थे। कभी-कभी अपने सुझाव भी देते थे जो बेहद ताजगी भरे और पहली ही नजर में निर्देशकों को पसंद आने वाले होते थे। निर्देशक उनकी तारीफ करते थे और कहते थे एक दिन वो जरूर बड़े निर्देशक बनेंगे। जल्द ही वह दिन आ गया। लक्ष्मी फिल्म कंपनी की विमला नामक फिल्म की शूटिंग चल रही थी कि अचानक फिल्म के निर्देशक मणिलाल जोशी बीमार पड़ गये। जोशी ने निर्माता को सुझाव दिया कि वह चंदूलाल को निर्देशक के तौर पर रख लें। निर्माता ने ऐसा ही किया और श्री शाह अपने से लगायी गई उम्ममीद पर खरे उतरे। उन्होंने तय समय पर फिल्म पूरी कर दी। लक्ष्मी फिल्म कंपनी को उनका काम पसंद आया और उसी साल कंपनी ने उन्हें दो फिल्में निर्देशन के लिए और दीं।
लेकिन ये दोनों फिल्में पूरी होते ही चंदूलाल शाह फिर से वापस शेयर बाजार की दुनिया में लौट गये मगर उनकी किस्मत में तो फिल्म निर्देशक होना ही लिखा था। इसलिए एक बार फिर दुर्घटना घटी और वह हमेशा हमेशा के लिए इस क्षेत्र में आ गये। हुआ यह कि होमी मास्टर फिल्म शीरी फरहाद का निर्देशन कर रहे थे, एक दिन जब वह कलाकारों को कुछ दृश्य समझा रहे थे कि फिसल कर गिर पड़े और उनकी टांग टूट गयी उन्होंने दर्द में कराहते हुए चंदूलाल शाह को याद किया और शाह भाई हाजिर हो गये। उन्होंने फिल्म का निर्देशन करना स्वीकार कर लिया लेकिन उसकी पटकथा बदल दी फिल्म हिट हुई और चंदूलाल शाह भी फिल्मी क्षेत्र में स्थापित हो गये।
चंदूलाल शाह बड़े माहिर निर्देशक थे उनके पास अपनी हर योजना का मजबूत आधार होता था। यही वजह है कि उनसे अभिनेता हमेशा संतुष्ट रहते थे, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने उस जमाने के बड़े बड़े अभिनेताओं, अभिनेत्रियों से छोटी-छोटी भूमिकाएं तक करा लीं। 1926 में बनी फिल्म टाइपिस्ट गर्ल में नायिका सुलोचना (रूबी मेयर्स) थीं। गौहर ने उस फिल्म में एक छोटी सी भूमिका निभाई थी जबकि इसके पहले गौहर ने नायिका के अलावा कभी दूसरी कोई भूमिका ही नहीं निभाई थी।
व्यावसायिक कुशलता
चंदूलाल शाह अपने तमाम सामयिक निर्देशकों से इसलिए भी आगे निकल गये और खास बन गये क्योंकि उन्होंने तय किया कि वह दूसरे फिल्मकारों की तरह पौराणिक फिल्में नहीं बनायेंगे बल्कि सामाजिक मुद्दे वाली फिल्में बनायेंगे। यह निर्णय उन दिनों कोई मामूली निर्णय नहीं था, क्योंकि पौराणिक फिल्में बनाना उन दिनों कारोबारी नजरिए से सबसे ज्यादा सुरक्षित था। चंदूलाल शाह ने ही हॉलीवुड फिल्मों की नकल करके हिन्दी फिल्में बनाने का चलन शुरू किया था। सन् 1928 में उन्होंने जगदीश फिल्म कंपनी के लिए विश्व मोहनी, गृह लक्ष्मी, चंद्रमुखी, और राज लक्ष्मी नाम की चार फिल्में बनायी। ये चारों फिल्में आदर्श अबला के फार्मूले पर आधारित थीं। उनकी इन सभी फिल्मों में एक केन्द्रीय संदेश यह था कि पत्नियों को पतियों की सेविका नहीं बल्कि दोस्त होना चाहिए। उस जमाने में यह सोचना कल्पनातीत था इसलिए लोगों को यह विचार बहुत ही ताजा और आकर्षक लगा।
सन् 1929 में चंदूलाल शाह और गौहर ने मिलकर अपने मित्र बिट्ठल दास ठाकुर के साथ रणजीत फिल्म कंपनी की स्थापना की इन दोनों की यह व्यावसायिक साझेदारी 35 सालों तक अबाध चली। गौहर का नाम जन्म सन् 1910 में लाहौर में हुआ था। उन्होंने 1925 में मात्र 15 साल की थीं के. राठौर द्वार निर्देशित फिल्म बाप कमाई में नायिका की भूमिका की थी। उनकी अंतिम फिल्म अछूत थी जिसके नायक मोतीलाल थे। चंदूलाल शाह बहुत नियमबध्द ढंग से फिल्में बनाते थे। उनकी और गौहर की कारोबारी केमेस्ट्री भी बहुत शानदार थी। उन दोनों ने बड़ी कुशलता से अपने व्यापार को आगे बढ़ाया। उनकी स्टूडियो में उन दिनों 600 लोग काम करते थे जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कारोबार कितने बड़े पैमाने का रूप ले चुका था। चंदूलाल शाह मूलत: दो किस्म की फिल्में बनाते थे- एक सामाजिक फिल्में जो एक तरह का इमोशनल ड्रामा होती थीं और दूसरी स्टंट फिल्में जिनमें मारधाड़ ज्यादा होती थी। स्टंट फिल्मों का बजट सामाजिक फिल्मों से ज्यादा होता था क्योंकि उन दिनों उनमें बड़ी संख्या में घोड़े, राजकुमार और राजकुमारियों की पोशाकें आदि की दरकार होती थी।
चंदूलाल शाह के व्यावसायिक कुशलता का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ध्वनि के आगमन के बावजूद मूक युग का उनका साम्राज्य ढहा नहीं बल्कि पूरी पहचान के साथ खड़ा रहा सन् 1931-1946 के बीच चंदूलाल शाह ने 100 से ज्यादा फिल्में बनायीं। भारत में किसी एक स्टूडियो द्वारा अपनी इतनी फिल्में नहीं बनायी गयीं। चंदूलाल शाह की अंतिम फिल्म पापी थी जो उन्होेंने सन् 1953 में बनायी थी।


