एक था सुपरस्टार (राजेश खन्ना 29 दिसम्बर 1942-18 जुलाई 2012)
राजेश खन्ना को किसी श्रध्दांजलि की जरूरत नहीं है। उन्होंने जो कुछ सिल्वर स्क्रीन पर किया व कहा, उतना ही पर्याप्त है। उनके डायलॉग उनके जिन्दगी के सफर को बयान करते हैं और उनके गाने उनके जीवनदर्शन को।
दिलीप कुमार अगर रोमांस के मतला (गजल का पहला शेर) थे तो राजेश खन्ना रोमांस का मक्ता (अंतिम शेर) थे। उनके बाद हिन्दी फिल्मों का नायक रोमांटिक नहीं रहा। इसलिए जब फिल्म ‘आनंद’ में उनके साथ कोई हिरोइन नहीं थी तो उन्हें इस फिल्म की सफलता पर शक था, खासकर इसलिए भी कि स्क्रीन पर वह पहली बार मर रहे थे। लेकिन वही मृत्यु सीन उन्हें अमर कर गया। अमिताभ बच्चन जो इस यादगार सीन का हिस्सा थे, का कहना है कि जब उन्होंने राजेश खन्ना को ‘मरते’ हुए देखा तो उन्हें लगा जैसे भगवान मर गया हो।
15 हिट फिल्मों का रिकार्ड
राजेश खन्ना फिछले कुछ माह से बीमार चल रहे थे, शायद कैंसर से पीड़ित थे (शायद इसलिए क्योंकि आधिकारिक तौर पर बीमारी घोषित नहीं की गयी)। जब उन्हें अस्पातल से छुट्टी दी गई और अपने घर ‘आशीर्वाद’ की बालकनी से उन्होंने उंगलियों से विजय चिन्ह बनाकर अपने चाहने वालों की तरफ तसल्ली का इशारा किया, तो लगा कि वह स्वास्थ्य लाभ की तरफ बढ़ रहे हैं। लेकिन इसके दो ही दिन बाद दोपहर में खबर आई कि राजेश खन्ना नहीं रहे। फौरन ही ‘आनंद’ का उक्त सीन और डायलॉग याद आ गया- ‘बाबा मोशाय, जिन्दगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है जहांपनाह, जिसे न आप बदल सकते हैं न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतली हैं, जिसकी डोर ऊपरवाले के हाथ बंधी है। कब, कौन, कैसे उठेगा, यह कोई नहीं जानता।’ 18 जुलाई 2012 की दोपहर को राजेश खन्ना ने मात्र 69 वर्ष की आयु में हमें अलविदा कह दिया।
आज के युग में 69 वर्ष की उम्र कोई खास ज्यादा नहीं है। लेकिन इसे अजीब संयोग कहिए कि राजेश खन्ना अपनी फिल्म ‘आनंद’ के एक डायलॉग की तरह ही जीए- ‘जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं…।’ यकीनन राजेश खन्ना की जिन्दगी बड़ी थी। हालांकि उन्होंने 1966 में ‘आखिरी खत’ से फिल्म उद्योग में कदम रखा था, लेकिन उन्हें अप्रत्याशित सफलता 1969 में ‘आराधना’ से मिली। इसके बाद 1972 तक भारतीय फिल्म उद्योग में केवल एक ही व्यक्ति छाया रहा-राजेश खन्ना। इस अवधि में उन्होंने लगातार 15 हिट फिल्में दीं, जिस रिकार्ड को आज तक कोई नहीं तोड़ सका है। यह एक ऐसा दौर था जब राजेश खन्ना के मुकाबले के लिए कोई सामने था ही नहीं, अगर जावेद अख्तर के शब्दों का प्रयोग किया जाए तो रेस में केवल एक ही घोड़ा था- राजेश खन्ना। वह जिस चीज को भी छू रहे थे, वह सोना बन रही थी। निर्मताओं के लिए ‘ऊपर आका (ईश्वर) और नीचे काका (राजेश खन्ना) थे। चूंकि जो सफलता मात्र 4 वर्ष (1969-1972) में राजेश खन्ना ने देखी, वैसी उनसे पहले और बाद में कोई दूसरा सितारा नहीं देख सका है, इसलिए शब्द सुपरस्टार का आरंभ उन्हीं से होता है और उन्हीं पर खत्म हो जाता है।
फिल्म ‘दो रास्ते’ की सिल्वर जुबली का समारोह मुम्बई के ‘सन एंड सैंड’ होटल में चल रहा था। धर्मेंद्र, महेश भट्ट, जिन्होंने इस फिल्म से अपना कैरियर आरंभ किया था, से बातें कर रहे थे। तभी एक शोर मचा कि समारोह में राजेश खन्ना आ गए हैं। सारी पब्लिक उनके दर्शन करने, उनको स्पर्श करने के लिए दौड़ पड़ी। धर्मेन्द्र व महेश भट्ट अकेले खड़े रह गए। धर्मेन्द्र ने कहा, ‘महेश, सुपर स्टारडम इसे कहते हैं।’
राजेश खन्ना को देखकर पुरुषों का मुंहर् ईष्या से खुला रह जाता था, महिलाएं उनकी पूजा करती थीं और लड़कियां उनकी तस्वीर से ब्याह रचाया करती थीं। राजेश खन्ना की सफेद कार जब अवाम के बीच पहुंचती थी तो लड़कियां लिपिस्टिक से उसे लाल कर देती थीं और टायरों की मिट्टी लेकर उसे अपनी मांग में भर लिया करती थीं। एक बार जब राजेश खन्ना को बुखार हो गया तो कालेज की छात्राओं का एक समूह उनकी तस्वीर पर रात भर बर्फ के पानी से सिकाई करता रहा।
प्रशंसकों की दीवानगी
भारतीय सिनेमा के इतिहास में किसी कलाकार के प्रति प्रशंसकों की ऐसी दीवानगी नहीं रही जैसी राजेश खन्ना के लिए थी। निश्चित रूप से दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, आदि राजेश खन्ना से बेहतर व सफल अभिनेता रहे हैं, लेकिन जो प्यार व दीवानगी युवाओं विशेषकर लड़कियों में उनके लिए रही है उतनी कभी देवानंद, शम्मीकपूर या आजकल की खान तिकड़ी (आमिर, शाहरुख व सलमान) के लिए भी नहीं रही। राजेश खन्ना की यह शोहरत केवल भारत तक सीमित नहीं थी। पाकिस्तान में उनके चाहने वालों का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उनके निधन पर सभी प्रमुख चैनलों ने 3-3 घंटे का विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया। 1965 के युध्द के बाद पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के
रिलीज होने पर प्रतिबंध लग गया था। राजेश खन्ना ने इस युध्द के बाद यानी 1966 में अपना फिल्मी कैरियर आरंभ किया। लेकिन उनकी शोहरत सरहद पार तक पहुंची और ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो भारत का वीजा केवल राजेश खन्ना की फिल्में देखने के लिए लेते थे। पाकिस्तान के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ अहमद अली शाह का कहना है, ’70 के दशक में वीजा हासिल करना कठिन नहीं था। हम भारत अपने रिश्तेदारों से मिलने कम और राजेश खन्ना की फिल्में देखने के लिए ज्यादा जाया करते थे।’ इसलिए इस साझी विरासत के निधन पर पाकिस्तान में भी शोक स्वाभाविक था।
फिल्म ‘अंदाज’ में राजेश खन्ना ने गाया था- ‘जिन्दगी एक सफर है सुहाना’। यकीनन उनकी शोहरत का सफर सुहाना रहा, भले ही संक्षिप्त रहा हो। बहरहाल, जतिन खन्ना के रूप में उनका जन्म 29 दिसम्बर 1942 को पंजाब में हुआ था। उन्हें उनके रईस रिश्तेदारों ने गोद ले लिया और वह मुम्बई के निकट ठाकुरद्वार में आकर रहने लगे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गिरगांव के सेंट सेबिस्टियंस गोअन हाई स्कूल में हुई, जहां एक्टर जितेन्द्र भी उनके साथ पढ़ते थे। ये दोनों किशनचंद चेलाराम कालेज में भी साथ रहे, जहां खन्ना थिएटर में सक्रिय हो गए। चूंकि उनका संबंध एक सम्पन्न परिवार से था इसलिए अपने संघर्ष के दिनों में भी वह निर्माताओं के पास अपनी एमजी स्पोट्र्स कार से जाया करते थे। सन् 1965 में उन्होंने विनोद मेहरा को हराकर अखिल भारतीय टैलेंट हंट प्रतियोगिता जीती, जिसमें 10000 युवा शामिल हुए थे। इससे उन्हें फिल्मों में प्रवेश का अवसर मिला और अपनी पहली फिल्म ‘आखिरी खत’ से उनका नाम जतिन की जगह राजेश खन्ना पड़ गया।
कुछ वर्ष संघर्ष व असफलता में बीते, लेकिन 1969 में ‘आराधना’ के रिलीज होने से उनका गोल्डन पीरियड आरंभ हुआ जो 1972 तक जारी रहा। इस बीच उन्होंने लगातार 15 सफल फिल्में दीं जिनमें ‘सच्चा झूठा’, ‘सफर’, ‘कटी पतंग’, ‘आनंद’, ‘हाथी मेरे साथी’ आदि शामिल हैं। 1973 में राजेश खन्ना ने 16 वर्षीय डिम्पल कपाड़िया से विवाह किया और उसी वर्ष ‘नमक हराम’ के प्रीमियर पर उन्होंने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से कहा कि उनका समय समाप्त हो गया है और अमिताभ बच्चन कल के सुपरस्टार हैं। राजेश खन्ना की भविष्यवाणी के अनुसार अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा के मिलेनियम स्टार अवश्य बन गए, लेकिन बॉलीवड का एकमात्र सुपरस्टार राजेश खन्ना ही रहे, जो 18 जुलाई को ‘अच्छा तो हम चलते हैं’ कहते हुए हम से रुख्सत हो गए। अलविदा सुपरस्टार।


