कितने अमीर हैं अमीर देश
दुनिया के अमीर देशों ने उपनिवेशवाद अर्थात दूसरे देशों को अपना गुलाम बना कर खूब संपत्ति हासिल की। उसी के माध्यम से अपनी औद्योगिक क्रांति को आगे बढ़ाया, रेल मार्गों का विस्तार किया और संसाधन समपन्न हुए। उन्होंने अपने उपनिवेशों की जमीनों और जंगलों के साथ ही साथ श्रम का भी खूब शोषण किया और यह साबित करने की कोशिश की कि पूंजीवादी विकास ही जनकल्याणकारी रास्ता है और इसी से समानता आएगी। परंतु आज की स्थिति कुछ और ही कहानी कह रही है क्योंकि वैश्विक आर्थिक संकट अब इन अमीर देशों को भी लीलने को आतुर दिखाई दे रहा है।
अब देश भी हो रहे दिवालिया
अभी तक तो लोग परिवार और कम्पनियां ही कंगाल हुआ करती थी लेकिन अब तो देश दिवालिया घोषित किये जाने के कगार पर आ गए हैं। हाल ही में ग्रीस के सामने दिवालिया हो जाने की नौबत आ गई है। ग्रीस का कुल सकल घरेलू उत्पाद 303 अरब डालर का है, पर उसकी सरकार पर 489 अरब डालर का कर्जा हो गया है। ऐसे में अब उसे कोई और अधिक कर्जा देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में यूरोपियन कमीशन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय केन्द्रीय बैंक ने उसे कर्ज देने से पहले यह पूछा कि वह अपने खर्चे में 32.5 करोड़ यूरो की कटौती कैसे करेगा। ग्रीस को 130 अरब यूरो के बेल आउट पैकेज के लिए उधार की जरूरत है और इसके लिए उसे वेतन, पेंशन और सरकारी सेवाओं में होने वाले अपने खर्चों को कम करना होगा तभी उसे किसी भी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्था से कर्ज मिल पायेगा। इसका मतलब है कि उसे अपने नागरिकों को बेरोजगार करना होगा और स्वास्थ्य शिक्षा और उनकी सामाजिक सुरक्षा पर किये जाने वाले व्यय को भी कम करना होगा।
ग्रीस तो केवल एक उदाहरण है। दुनिया में संपन्न माने जाने देशों-इटली, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी आदि भी कमोवेश इसी तरह की स्थिति में है। गौरतलब है कि ऐसे देश, जिनके ऊपर बाहरी कर्जा उनके सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में ज्यादा हो चुका है, उन्हें गहरे संकट में माना जाता है। ग्रीस, पुर्तगाल और आयरलैंड ऐसे ही देश हैं और इन देशों की बेरोजगारी की दर भी 14 प्रतिशत हो चुकी है। वैसे अभी भी जो देश विकसित बने भी हुए हैं वे वास्तव में या तो दूसरे देशों को लूट कर विकसित हुए हैं या पिर खूब कर्जा लेकर। आंकड़े थोड़ा ‘बोर’ तो करते हैं लेकिन कई बार ये अत्यंत रुचिकर भी दिखाई पड़ते हैं। जरा नीचे दिए आंकड़ों पर गौर कीजिए।
कर्ज में डूबे देश
प्रति व्यक्ति कर्ज के हिसाब से यह जापान में भारत से 120 गुना ज्यादा, अमेरिका में भारत से 51 गुना ज्यादा, ग्रीस और फ्रांस में भारत से 50 गुना ज्यादा है। पर जिन्हें विकासशील देश माना जाता है उनके हालात कम से कम दिवालिया होने के तो नहीं है। भारत में एक व्यक्ति के ऊपर 722.82 डालर का कर्जा है और हमार ऊपर सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 54 प्रतिशत हिस्से के बराबर कर्ज है। चीन पर प्रति व्यक्ति 709 डालर, मिस्र पर 2035 डालर और इथियोपिया पर 115.91 डालर का कर्ज है। आज चीन दुनिया में उभर चुकी नयी ताकत है और उसकी ताकतक के पीछे एक बड़ा कारण है उसका कम कर्जदार होना। इससे उसकी अर्थव्यवस्था ज्यादा संतुलित और सुरक्षित बन जाती है। चीन पर 1.09 खरब डालर का कर्ज है, परंतु यह कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का केवल 17.4 प्रतिशत है। जब कि भारत पर 927 अरब डालर का कर्ज है जो कुल सकल घरेलू उत्पाद का 55 प्रतिशत है। यही स्थिति हमें पूंजी बाजार के सामने झुकने और ढांचागत बदलार की उनकी शर्तों को मानने के लिए मजबूर करती है। आर्थिक सम्पन्नता का मतलब है कि कुछ देशों ने कर्ज लेकर उपभोक्तावादी नीति को अपनाया है और इसे ही वे पूंजी की तरलता भी मानते हैं। मतलब साफ है-कुछ देशों ने उपनिवेशवादी तरीकों से दूसरे देशों के संसाधनों को लूटा और अपना विकास किया और दूसरी बात यह कि जब प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद की दायार कम हो गया तो उन्होंने बेईमानी से व्यापार के जरिये विकासशील देशों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। तीसी बात उन्होंने अपने नागरिकों को कर्ज के नशे की लत लगाई, जिससे वहा का समाज इन अन्यायपूर्ण नीतियों पर चुप रहा। आखिर इतनी लूट के बाद भी ये देश आर्थिक संकट में क्यों है? इसकी वजह है पिछले 100 सालों से जिस आर्थिक विकास की वकालत की जा रही है वह संसाधनों के सही उपयोग पर केन्द्रित न होकर उसके बेतहाशा शोषण और लूट पर कन्द्रित रहा और यह माना जात रहा है कि लोगों की उपभोक्तावादी प्रकृति को जितना उभरा जा सकता है उतना उभारा जाए।


