राहुल की बड़ी भूमिका का अर्थ
स्वयं राहुल गांधी के उद्धोष के बाद किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि संगठन एवं सरकार दोनों में उनकी विस्तृत और बड़ी भूमिका की पटकथा तैयार हो चुकी है। उसे केवल अब अभिनित किया जाना शेष है। यह देखना होगा कि यह पटकथा एकांकी है या उसके कई अंक होंगे। पिछले एक सप्ताह से थोड़ा ज्यादा समय से कांग्रेस के अंदर से इसके बिखरे हुए संकेत मिल रहे थे। देश की राजनीतिक स्थिति, आगामी लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस एवं विपक्ष के अंदर जारी मंथन के साथ जिन लोगों ने टुकड़ों में मिलते संकेतों को जोड़ना आरंभ किया उन्हेें इसका आभास होने लगा था कि कांग्रेस के नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन दोनों का सूत्र राहुल के हाथों आने वाला है। आखिर सलमान खुर्शीद नेहरू इंदिरा परिवार के वैसे सदस्य के बारे में, जिसे पूरा कांग्रेस नेतृत्व भविष्य का नेता मान रहा हो, कोई निराधार वक्तव्य दे नहंीं सकते थे। उसके बाद महासचिव दिग्विजय सिंह का यह बयान कि राहुल बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं और आगामी सितंबर में इसकी शुरूआत हो जाएगी, वास्तव में कांग्रेसजनों के लिए स्पष्ट संदेश था कि अब प्रतीक्षा की घड़ी समाप्त हो रही है।
हो रही है पटकथा तैयार
इन दोनों नेताओं के वक्तव्यों को जिन लोगों ने उनके पूर्व बयानों के क्रम में लिया वे संभवत: यह नहीं समझ पाए कि पहले वक्तव्यों में पटकथा तैयार करने की पूर्व पीठिका की सोच थी, जबकि इस बार पटकथा तैयारी के अंतिम चरण का साफ संकेत था। खुर्शीद के वक्तव्य में एकदम साफ संदेश नहीं था, लेकिन उससे इसकी ओर अग्रसर होने की निश्चितता का आभास तो मिल ही रहा था। दिग्विजय ने खुर्शीद के वक्तव्य में कयासों के लिए बची हुई जगह का अंत कर दिया। इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और स्वयं राहुल गांधी ही बचते थे। सोनिया गांधी ने सांसदों को दिए गए भोज के दौरान कह दिया कि इसका फैसला राहुल को ही करना है और फिर राहुल ने इसका उत्तर यह दिया कि वे भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। लेकिन उसकी पटकथा,रंगमंच और साथ के अन्य पात्रों का निर्णय पार्टी करेगी। पार्टी के निर्णय का तात्पर्य समझना कठिन नहंीं है। एक तो यह शिष्टाचार के तौर पर व्यक्त किया गया विचार है ताकि संदेश यह जाए कि उनके लिए पार्टी का महत्व प्रथम है। दूसरे, उनकी मां सोनिया गांधी अध्यक्ष हैं और उनके प्राधिकार को किसी प्रकार की चुनौती या कम करने का संदेश उनके रवैये से नही ं निकलना चाहिए इसका ध्यान भी उन्होंने रखा है।
वस्तुत: जिस तरह महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि सोनिया जी के बाद राहुल जी के कंधे हीं जिम्मेवारी आनी है और इसमें उन्हें नहीं लगता कि आश्चर्य का कोई कारण है। उन्होंने राहुल गांधी के वक्तव्य को सोनिया के बयान का पूरक करार दिया। यानी सोनिया गांधी ने इसका निर्णय राहुल पर छोड़ा और राहुल के हां करने के बाद इसका क्रम पूरा हो गया। अब पटकथा लिखने वालों पर निर्भर है कि उन्हें कब, किस रूप में और किनके साथ भूमिका निभाने के लिए तैयार करें। लेकिन इस क्रम के पूरा होने के साथ ही कांग्रेस के अंदर नेतृत्व को लेकर बढ़ रही बेचैनी का अंत हो गया है। जैसे-जैसे 2014 नजदीक आ रहा था कांग्रेस के अंदर नेतृत्व के प्रश्न को लेकर छटपटाहट बढ़ रही थी। मनमोहन सिंह कांग्रेस के स्वाभाविक नेता न थे, न है न हो सकते है। उन्हें तो परिस्थितिवश सोनिया गांधी ने नेता के लिए नामित किया और इसीलिए पार्टी ने उन्हें सरकार के प्रबंधक नेता के तौर पर ही स्वीकार किया। जाहिर है, उनकी भूमिका तभी तक है ज तक सोनिया गांधी चाहती है या नेहरू गांधी परिवार का कोई व्यक्ति इसके लिए तैयार नहंीं होता। कांग्रेस से जुड़े नेहरू गांधी परिवार में राहुल और प्रियंका की ओर ही ध्यान जाता है। चूंकि प्रियंका ने अपनी भूमिका परिवार तथा भाई एवं मां के चुनाव क्षेत्र तक सीमित कर दी है, इसलिए राहुल ही शेष बचते हैं। राहुल ने 2004 एवं 2009 लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी के बाद सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं एवं सड़क सम्पर्क किया, लेकिन यह भूमिका एक स्टार प्रचारक तक ही सीमित रही। पार्टी में महासचिव और युवा कांग्रेस के प्रभारी जैसी भूमिका तक ही वे समिटे रहे। 10, जनपथ के करीबी हमेशा उनको पार्टी में सोनिया गांधी के बाद और सरकार में सर्वोपरि भूमिका दिलाने की पटकथा तैयार करने की कोशिश करते, पर यह कभी परवान नहीं चढ़ सका। समय और अपने व्यक्तित्व के कारण पं.नेहरु और इंदिरा गांधी ने जितनी बड़ी संख्या में अपने एवं परिवार के निष्ठावान बढ़ाए उतना सोनिया एवं राहुल नहीं बढ़ा सके। पं.नेहरु की मृत्यु के बाद से ही परिवार के निष्ठावान इंदिरा गांधी के साथ खड़े रहे।
मनमोहन सिंह से निराशा
धीरे-धीरे इंदिरा परिवार के सच्चे निष्ठावानों की संख्या घट रही है। उन दोनों ने जैसे निष्ठावान बनाए वैसा सोनिया एवं राहुल नहीं बना सके हैं। इसका ध्यान आते ही निष्ठावानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें बढ़ रही थीं। हालांकि कांग्रेस के हालात देखते हुए अभी यह साफ है कि उसकी एकता उस परिवार के नेतृत्व में ही सुरक्षित और संरक्षित रह सकती है, फिर भी बदलती राजनीति को देखते हुए रणनीतिकारों को लगता था कि धीरे-धीरे समय नियंत्रण से बाहर जा रहा है। मनमोहन सिंह को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के पक्ष में कोई नहीं और वे 82 वर्ष को हो भी चुके हैं। 2014 के चुनाव के वक्त वे 84 वर्ष के होंगे। एकाएक राहुल गांधी 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जाएं इससे बेहतर यही हो कि रंगमंच पर उनकी भूमिका अभी से ऐसी हो कि उस समय तक इसकी कथानक उन्हें स्वाभाविक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत कर दे। प्रश्न है कि भूमिका क्या दी जाएगी? अगले राहुल को पद प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होने की तैयारी के लिए संगठन के पद का महत्व गौण है। सुरक्षा मामलों पर मंत्रिमंडल की जो समिति है वह सरकार की सर्वप्रमुख नीति निधार्रक इकाई है, उसमें शामिल होने के लिए उन्हें प्रमुख मंत्रालय दिया जा सकता है। वह कांग्रेस की कोर कमेटी में भी शामिल हो सकते हैं। वैसे सीधी राजनीति में पदार्पण के इन आठ वर्षों में राहुल की उपलब्धियां, हाव-भाव ऐसे नहीं रहे हैं जिनसे उनकी ओर आम नागरिकों का स्वाभाविक आकर्षण हो। संजय गांधी की विमान दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद हिचकिचाहट से राजनीति में आए उनके भाई राजीव गांधी के प्रति देश का आकर्षण हुआ और उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी आवाज एवं व्यवहार से जगह बनाई। कांग्रेस का संकट यही है कि परिवार के बाहर नेतृत्व विकसित होने की संभावना नि:शेष है। भारतीय इतिहास की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की सबसे बड़ी उत्तराधिकारी की दशा दु:खदायी है, किन्तु हमारे देश की राजनीति की यह विडम्बना है कि आम जनता में परिवारवाद को लेकर सामूहिक वितृष्णा का भाव नहीं। इसके उलट कांग्रेस के समर्थक तो इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इसलिए यह लोकतंत्र के सिध्दान्त की दृष्टि से भले चिंताजनक हो, इसका वर्तमान कांग्रेस पर किसी प्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव की संभावना नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन कला से महरूम मनमोहन सिंह से निराश पार्टी के नेताओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे ज्यादा एकजुट होकर काम कर पाएंगे। मनमोहन की पीठ पीछे आलोचना के कारण कांग्रेस के अंदर व्याप्त जड़ता का माहौल टूटेगा। निश्चय की विपक्ष को राहुल के नेतृत्व के समानांतर अब आगे की राजनीतिक रणनीति बनाने की विवशता उत्पन्न हो गई है और यह कितना कठिन है बताने की आवश्यकता नहीं।


