सूचना आयुक्त : पद या पुरस्कार?
देश में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया की धज्ज्ाियां उड़ रही हैं। झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। सवाल यह है कि जिस उद्देश्य से इस पद का सृजन किया गया और जिस प्रकार के लोग इस पद पर लाये जा रहे हैं क्या उससे इसके वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति हो पायेगी। यह एक जिम्मेदारी भरा पद है। सूचना का अधिकार कानून के सात साल के सफर में ऐसा कई बार हुआ है जब सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल खड़े हुए हैं। कई मामले अदालत तक भी पहुंचे हैं। नियुक्ति प्रक्रिया की गड़बड़ी पर कड़ी टिप्पणियां भी आयी हैं। कहा गया है कि किसी राज्य में जिस राजनीतिक पार्टी या गठबंधन की सरकार होती है उसके सत्ताधारी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को निजी सम्पत्ति समझने लगते हैं। आम लोगों की जानकारी के बगैर राज्य सरकारें आयुक्तों की नियुक्ति कर रही हैं। यह संविधान के समानता और योग्यता के अधिकार के खिलाफ है। सूचना आयुक्तों के चयन में पारदर्शिता को नजरअंदाज किया जा रहा है। यही वजह है कि तमिलनाडु हाईकोर्ट एक मामले में तीन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति रद्द पर चुका है। अभी केरल, नगालैंड और पंजाब में तीन सूचना आयुक्त ऐसे हैं, जो राजनीतिक दलों से जुड़े रहे हैं। बताया गया है कि वर्ष 2006-07 के दौरान राज्यों के 52 प्रतिशत सूचना आयुक्त सेवा निवृत्त नौकरशाह थे। वर्ष 2012 में यह आंकड़ा 66 फीसदी हो गया। सहज समझा जा सकता है कि ये पद सत्ताधारी पार्टी द्वारा पुरस्कार स्वरूप अपने चहेतों को रेवड़ी की तरह बांटने का एक जरिया बन गया है। चयन समितियां यह भी जानने-समझने की जरूरत नहीं समझतीं कि चुने जाने वाला व्यक्ति सूचना के अधिकार के दायित्वपूर्ण कार्यों को जानते-समझते भी हैं या नहीं। यही वजह है कि झारखंड में चयन समिति ने जिन चार लोगों के नामों की सूचना आयुक्त पद के लिये अनुशंसा की है, उस पर सवाल खड़े होने लगे हैं। इनके अब तक के कार्य-निष्पादन और उपलब्धियों से आम जनता अनभिज्ञ है। सवाल उठ रहे हैं कि इनके नामों की अनुशंसा किस आधार पर की गयी है। ऐसे सवाल न उठें इसलिये जरूरी है कि इस पद पर नियुक्ति के लिये सरकार पूरी पारदर्शिता बरते। योग्य व्यक्ति का चयन करे। तभी इस पद की सार्थकता सिध्द होगी और राज्य का कल्याण होगा। इसके साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या झारखंड जैसे छोटे राज्य के लिए पांच सूचना आयुक्तों की जरूरत है भी या नहीं?


