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यूपी : निजाम बदला है दस्तूर वही

जुलाई के प्रथम पखवारे में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के कामकाज को सौ में सौ अंक प्रदान करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पन्द्रह दिन बाद ही अकर्मण्यता के लिए डांट लगाई तो लोगों का आश्चर्यचकित हो जाना स्वाभाविक है। जब-जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बनते रहे, उनका एक ही अवरोध रहता था, हमारी आलोचना करने से पहले हमें छह महीने का समय दीजिए। इस अपने पुत्र को विरासत सौंपने के बाद भी उन्होंने छह महीने का समय मांगा था। लेकिन चार महीने भी पूरे नहीं हो पाये कि वे स्वयं बिफर पड़े। हालांकि इन चार महीनों में वे स्वयं कई बार मंत्रिमंडल की बैठक कर चुके हैं। जिसका आम लोगों में यही संदेश जाता रहा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भले ही अखिलेश बैठे हों रिमोट कंट्रोल से सरकार मुलायम सिंह ही चला रहे हैं।
बिना शर्त मनमोहन सरकार का समर्थन
कांग्रेस पार्टी की चुनावों में पराजय हो या फिर केन्द्रीय सरकार के घोटालों से घिरते जाने की समस्या इन सबके लिए सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी को कांग्रेस में जिम्मेदार ठहराना अपराध माना जाता है। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस की प्रतिष्ठा दिन प्रतिदिन गिरती जा रही है। स्वयं कांग्रेसी भी अब बहुत खिन्न हैं लेकिन सोनिया गांधी की प्रतिष्ठा और राहुल को और जिम्मेदारी-संगठन व सरकार दोनों में देने का कीर्तन तेज होता जा रहा है। एक पुराने कांग्रेसी ने इस संदर्भ में चर्चा चलने पर कहा ‘कांग्रेस में रहना है तो हां जी हां जी कहना है’ लेकिन अब घोटालों को संरक्षण प्रदान करने और पार्टी की दुर्दशा के लिए मां-बेटे के खिलाफ चलने वाली खुसुर-फुसुर ज्यादा मुखरित होने लगी है। यद्यपि सरकार केवल वही ‘सुधार’ आगे बढ़ाती है जिसे सोनिया ने नेतृत्व में गठित सलाहकार समिति स्वीकार कर लेती है। यह ठीक है कि साझा सरकार के साझीदारों और समर्थकों के विरोध के कारण उनमें से तमाम लटके हुए हैं और रहेंगे, लेकिन मनमोहन सरकार उसकी प्राथमिकता के साथ अपनी प्रतिबध्दता बनाये हुए हैं। इसके लिए साम-दाम-दण्ड-भेद सभी का जैसा नग्न स्वरूप राष्ट्रपति चुनाव के समय उभरा है वह सिलसिला सीबीआई द्वारा उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के विरुध्द अभियोग न चलाने के फैसले से जाहिर हो चुका है और अंधकार कर बिजली मंत्री का पदभार छोड़कर गृहमंत्रालय में बैठाये जाने वाले ‘सक्षम’ मंत्री सुशील कुमार शिन्दे की स्थिति से दस जनपथ के प्रभाव का आंकलन लगाया जा सकता है। अनेक घोटालों को संरक्षण या भागीदारी के आरोप से सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी से घिरे चिंदम्बरम को पुन: वित्त मंत्री बनाया जाना भी उसी का उदाहरण है। लोकसभा के 2009 के चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव ने बिना शर्त मनमोहन सिंह सरकार को समर्थन दिया था और देते चले आ रहे हैं तथा यह माना जा रहा है कि चाहे खुदरा क्षेत्र में सीधे विदेशी निवेश हो या खाद्यान्न सुरक्षाविधेयक जिन दोनों का वे सार्वजनिक विरोध कर रहे हैं, को भी संसद में उनका समर्थन प्राप्त हो जायेगा क्योंकि वे पिछले कुछ महीनों से संप्रग सरकार को समर्थन देते रहने की घोषणा करते हुए उसके पांच साल चलाने का बोझ उठाने के लिए भी बलिदान देने की मंशा प्रगट करते रहते हैं और पार्टी कैडर को लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहने का आदेश भी जारी करते रहते हैं।
परिवारवाद को प्रश्रय
अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने का विरोध निर्णय लेने में लटकाता रहा है। इस विरोध का स्वरूप उस दिन प्रगट हो गया जब वे अपना विधान परिषद के लिए नामांकन करने गए और अपने कार्यालय में रहते हुए भी संसदी कार्यमंत्री आजम खां मंत्रिमंडल में नंबर दो पर हैं, वहां नहीं गए। कुछ बचकानी हरकतों के अलावा अखिलेश की छवि राजीव गांधी के समान अभी भी ‘निरीह’ की ही बनी हुई है। लेकिन जैसी कि आम चर्चा है निजाम बदला है दस्ता वही है। जिस प्रकार से सत्ता का संचालन और उपयोग मायावती करते रही हैं उसमें और प्राथमिकताओं में कोई फर्क नहीं पड़ा है। मायावती के समय कितनी घोषणाएं हुई है इसकी गिनती करना भी मुश्किल है। अखिलेश ने भी शुरूआत कर दी है। अनुउत्पादक मदों में खर्च बढ़ाते जाने का सिलसिला तो जारी ही है, मायावती के कार्यकाल में चल पड़ा एनडीए-नान डिस्टर्बिंग एलाउंस का चलन बंद नहीं हुआ है। भ्रष्टाचारी आचरण के आरोप से बिंधे लोगों को मनचाही तैनाती का मामला उच्च न्यायालय में उठ गया है और जो सीबीआई के कारण जेल से बाहर नहीं आ रहे हैं उनसे वरिष्ठ मंत्री जेल में मिलने जाते हैं।
मायावती ने कहा था जिस दिन मेरी सरकार बनेगी मुलायम सिंह और उनका कुनबा जेल में होगा। यही बात अखिलेश और मुलायम सिंह ने मायावती के बारे में कहीं थी। न तो मायावती ने कोई जांच तक बैठायी और न अब तक अखिलेश ने। इसीलिए कहा जा रहा है सिर्फ निजाम बदला है दस्तूर नहीं। जिन लोगों की यह अपेक्षा थी कि तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद सत्ता और पार्टीजन के जिस आचरण के कारण मुलायम सिंह को हर बार धाराशायी होना पड़ता था उससे कुछ सीख उन्होंने और पार्टी ने अवश्य ली होगी पर ऐस दिखाई नहीं पड़ता। जिले में अराजकता की जो स्थिति सत्ता में आते ही ‘समाजवादियों’ ने पैदा की है वह इस बात का सबूत है कि आदत यथावत बनी है। मुलायम सिंह पहले भी इमाम या इमामों की ब्लैकमेलिंग के आगे झुकते रहे हैं। आज भी उसी की प्राथमिकता है। बकौल शाहिद सिद्दिकी जिनको नरेन्द्र मोदी का साक्षात्कार करने के कारण पार्टी से निकाला गया, उत्तर प्रदेश में तीन महीने में चार दंगे हो चुके हैं।जनेश्वर मिश्र के नाम पर भले ही कोई योजना शुरू कर दी गयी हो लेकिन उन्हीं की परम्परा के मोहन सिंह का क्या हश्र हुआ है इससे सभी वाकिफ है। ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी की संगत से मुलायम सिंह एक बात सीख ली है, पार्टी हो या सरकार उसे निकटस्थ परिवार में सीमित करते जाओ और समय-समय पर पार्टी और सरकार की आलोचना कर उसके कुकृत्यों से अपनी छवि अलग बनाये रखो।

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