अखबारों की ‘पेज 3′ संस्कृति की विकृति
पृष्ठ-3 या पेज 3 आमतौर पर टैब्लायड अखबारों में पाया जाने वाला वह पृष्ठ है जिसमें चर्चित महिला मॉडलों और दूसरे सोशलाहटों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपती हैं। ये तस्वीरें अक्सर तड़क-भड़क वाली होती हैं। यह चलन विशेष तौर पर ब्रिटेन के टैब्लायड अखबारों का है जिसे दुनिया के तमाम दूसरे देशों के अखबारों ने भी समाचार पत्रों की नीरस संजीदगी को तोड़ने के लिए अपना लिया है। चूंकि आमतौर पर इस तरह की सामग्री अखबारों के तीसरे पृष्ठ पर ही छपती है इसलिए यह चलन पेज 3 के नाम से मशहूर हो गया है। वैसे भारत में अखबारों से ज्यादा इस संस्कृति को प्रचार व पहचान मधुर भंडारकर की इसी शीर्षक (पेज 3) से बनी फिल्म के जरिये मिली है।
भारत के हिन्दी या दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों में इस तथाकथित पेज 3 का चलन नहीं है। यह चलन अंग्रेजी के महानगरीय अखबारों का है। पेज 3 सामग्री के लिए विशेष तौर पर जिस अखबार को जाना जाता है, वह है मुम्बई से छपने वाला टैब्लायड दैनिक मिड-डे। भारत में इस संस्कृति को चलन में लाने और स्थापित करने का श्रेय मिड-डे को ही जाता है। मिड-डे में अक्सर महिला मॉडलों के बड़े-बड़े फोटोग्राफ्स (ज्यादातर बिकनी में) छपते हैं। मिड-डे में छपने वाली इन शख्सियतों को सोशालाइट सर्किल में ‘मिड-डे मेट्स’ के नाम से जाना जाता है। मिड-डे द्वारा लोकप्रिय बनाई गई इस संस्कृति को देश के दो और प्रमुक महानगरीय अंग्रेजी दैनिकों ने मजबूती प्रदान की है। ये अंग्रेजी दैनिक हैं द टाइम्स आफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स। ये दोनों अंग्रेजी दैनिक अपनी महानगरीय सामग्री के विशेष हिस्सों, जिन्हें राजधानी दिल्ली में क्रमश: एच टी सिटी और डेल्ही टाइम्स के नाम से जाना जाता है, में इस पेज 3 को समाहित करते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया जैसे अखबारों में इस सामग्री के तहत सोशलाइट पार्टीज, फैशन शोज और शहर में आए या मौजूद ग्लैमर की दुनिया के लोकप्रिय चेहरां की तस्वीरें और उनमें संबंधित सामग्री छपती है। तस्वीरों को पेज 3 फोटोज कहते हैं। इन पेजों में छपने वाली सेलिब्रिटीज को पेज 3 सेलिब्रिटीज कहते हैं। यही नहीं इन पार्टियों में मौजूदा रहने वाले लोगों या इन पेजों से किसी भी तरह जुड़े लोगों को पेज 3 संस्कृति के लोग कहा जाता है। पेज 3 संस्कृति जैसे शब्दों का चयन मधुर भंडार की इस नाम से बनी फिल्म के बाद ज्यादा लोकप्रिय हुआ।
पेज 3 में वैसे सिर्फ ग्लैमरस और कम से कम कपड़ों में काम चलाने वाली महिला सेलेब के ही फोटोग्राफ्स नहीं छपते बल्कि अपने-अपने क्षेत्र के तमाम दीग्गजों जैसे थियेटर, फैशन, लेखन कारपोरेट और म्युजिक की दुनिया की तमाम हस्तियों के लिए जाने-जाने वाले पेज में छपती हैं। दुनिया में पेज 3 का आगाज नवम्बर 1970 में ब्रिटेन के मशहूर टैब्लायड द सन से हुआ। इसी अखबार ने सबसे पहले अपने तीसरे पेज पर टॉपलेस मॉडल की फोटो छापी और फिर धीरे-धीरे यह जगह ऐसी ही तस्वीरों के लिए सुनिश्चित होने लगी। द सन के इस प्रयोग से उसकी लोकप्रियता बढ़ी, जिसे देखकर लंदन के दूसरे टैब्लायड अखबारों ने भी इस ट्रेंड को अपनाया। ब्रिटेन के टैब्लायड दैनिकों में इस ट्रेंड के लोकप्रिय होते ही इसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी तमाम अखबारों द्वारा अपनाया गया। ब्रिटेन के बाद यह ट्रेंड बहुत तेजी से न्यूयार्क पहुंचा। वहां भी पाठकों ने इस हाथों हाथ लिया ‘पेज थ्री’ और ‘पेज 3′ ट्रेड मार्क रजिस्टर्ड है। इसका मालिकाना हक द सन अखबार की समूह कम्पनी एन आई ग्रुप लि. के पास है। धीरे-धीरे यह पेज और इस पेज पर छपने वाली सामग्री पुरी दुनिया में लोकप्रिय हो गयी और यह एक विशेष तरह की सामग्री के रूप में पहचान पाने लगी।
उत्तेजित तस्वीरें
हालांकि पेज 3 कुछ खास किस्म के पाठकों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। लेकिन यह बात भी है कि अखबारों का यह पेज कुछ दूसरे पाठकों के बीच उतना ही अलोकप्रिय भी है। खासतौर पर महिलावादियों ने इस पेज की खूब आलोचना की है। महिलावादियों का कहना है कि पेज महिलाओं को उपभोक्ता वस्तु या कहें सेक्स आब्जेक्ट की तरह पेश करता है। दुनिया की तमाम प्रसिध्द महिलाएं पेज 3 को महिलाओं के लिए दैत्य की उपमा देती हैं। कुछ कट्टरपंथी लोग पेज 3 को ‘साफ्टपोर्न’ की संज्ञा देते हैं। तमाम लोग अखबारों में इन पेजों की मौजूदगी को घर की महिलाओं और बच्चों के लिए खराब मानते हैं। अमेरिका की पूर्व संसद सदस्य क्लेयर ने 1980 के दशक में इस पेज 3 और इसकी संस्कृति के विरुध्द एक आन्दोलन के तहत छपने वाली टॉपलेस तस्वीरों पर रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि सैध्दांतिक तौर पर भले यह आन्दोलन सफन न रहा हो, लेकिन व्यवहारिक तौर पर उन दिनों ऐसी तस्वीरों में एक किस्म का मौन प्रतिबंध लगा था।
इन पेज 3 की शुरुआत करने वाला ब्रिटेन का द सन अखबार पिछले चार दशकों से भी ज्यादा समय से इस पेज की निरंतरता बरकरार रखे है। हां, बदलते वक्त के साथ इसमें कुछ फेरबदल किए गए हैं। सन् 1999 से तो द सन पेज 3 की तस्वीरों को एन आई समूह की आधिकारिक वेबसाइट पेज 3 में भी प्रकाशित करता है। माना जाता है पेज 3 की परिकल्पना रुपर्ट मर्डोक की थी। वास्तव में 1969 में जब मर्डोक ने सन को ‘री-लांच’ किया तो इसके तीसरे पेज में एक बेहद खूबसूरत मॉडल की फोटो छापी। हालांकि यह तस्वीर पूरे कपड़ों में थी, कहीं से इसमें अश्लीलता का कोई चिह्न नहीं था लेकिन इसमें आकर्षण में एक जबरदस्त सेक्स अपील मौजूद थी। इस तस्वीर को पाठकों द्वारा पसंद किये जाने से यह मतलब निकाला गया कि अगर तस्वीर में कुछ और खुलापन होता तो इसे लोग और ज्यादा पसंद करते। यही धारणा आगे चलकर पेज 3 की टॉपलेस तस्वीरों का आधार बनी। इस तरह की आक्रामक तस्वीरों के छपने की शुरुआत उला लिंडस्ट्रोम द्वारा पहने गए एक बटन विहीन कमीज से हुई। शुरुआती की महीनों तक कामुक तस्वीरें या यूं कहें जिनसे शरीर के अंगों का प्रदर्शन हो रहा था वो तो छपीं, लेकिन ऐसी तस्वीरें नहीं छपीं जिन्हें आप पूरी तरह नग्न कह सकते हैं।
ऐसी आक्रामक टॉपलेस तस्वीरों के छपने का सिलसिला तो इस ट्रेंड के एक साल पूरा होने पर संपादक लैरी लैंब द्वारा शुरू हुआ। दरअसल अखबार एक साल की अपनी सफलता (री-लांच के बाद) का जश्न पेज 3 में 20 वर्षीय बेहद सेक्सी जर्मन मॉडल स्टीफन रान की उस स्थिति में फोटो छापकर मनाया, जिस स्थिति में वह पैदा हुई थी। अपने हाथों से अपने वक्षों को ढकती स्टीफन की यह तस्वीर फोटोग्राफर बेवरली गुडवे की उतारी हुई थी। वह द सन के पेज 3 के फोटोग्राफर के तौर पर इसी फोटो के साथ अपना कैरियर शुरू किया था और 2003 तक अखबार के पेज 3 से ही जुड़ा रहा। शुरुआत में थोड़ी उत्तेजित तस्वीरों तक ही द सन का यह पेज सीमित रहता था, लेकिन जैसे-जैसे उसके इस खास ट्रेंड की लोकप्रियता बढ़ी, तस्वीरें नग्न और आक्रामक होती गयीं। आज की तारीख में जहां भी प्रिंट मीडिया है, विशेषकर अंग्रेजी भाषा का, वहां पेज 3 की संस्कृति किसी रूप में मौजूद है। नाम भले पेज 3 हो या न हो।


