शरमायें या जश्न मनायें?
ओलंपिक में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शर्न’, ‘बीजिंग में थे 3 पदक लंदन में मिले 6 पदक’, कुछ इसी तरह की सुर्खियां मीडिया में आयी हैं और लंदन ओलंपिक की समाप्ति पर कुछ इसी लीक पर विचार प्रकट किये गये हैं। यह बहुत अच्छी बात है कि भारतीय एथलीटों- खिलाड़ियों ने 6 ओलंपिक पदक जीते। ओलंपिक में स्वर्ण, रजत या कांस्य कोई भी पदक जीतना काफी दुष्कर होता है। भारत ने 2 रजत और 4 कांस्य पदक जीते, जबकि बीजिंग ओलंपिक में तीन पदकों में एक स्वर्ण पदक भी था। यह भी काफी उत्साहवर्धक बात है कि लंदन में हमारे कुछ खिलाड़ी मामूली अंतर से चूके। लेकिन इस सिक्के का जो दूसरा पहलू है वह बड़ा दयनीय है। जब हम देखते हैं कि कई ऐसे देश जिनकी आबादी या क्षेत्रफल भारत के किसी जिले के बराबर है हमसे अधिक पदक प्राप्त कर लेते हैं तब बहुत शर्म महसूस होती है। वास्तव में यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। ब्रिटिश शासनकाल में गुलामी के दिनों में जब भारतीय हाकी टीम हर ओलंपिक में स्वर्ण पदक लेकर भारत लौटती थी तो हर भारतीय अपने को गौरवान्वित महसूस करता था। आज इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है कि हमारी हाकी टीम सभी मुकाबलों में आखिरी स्थान पर रही। यह सिध्द हो गया कि यह टीम ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतियोगिता के लायक ही नहीं। प्रश्न है इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? जब तक हमारे देश में खेलों को निहित स्वार्थी तत्वों, बदइंतजामी, खराब प्लानिंग, धोखाधड़ी और धनबल के प्रयोग से मुक्त नहीं किया जायेगा। राजनीतिक नेताओं तथा सरकारी अफसरों को खेलकूद से दूर नहीं रखा जायेगा तब तक स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। आजादी के 65 वर्ष बाद भी जबकि साधन-स्रोतों की कोई कमी नहीं है खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम अभी भी ‘पिछड़ा वर्ग’ ही नहीं ‘अति पिछड़ा वर्ग’ में शुमार किये जाते हैं। हर ओलंपिक के बाद आवाज उठायी जाती है कि इतनी बड़ी आबादी (इस समय करीब सवा सौ करोड़ की आबादी) वाले इस देश में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी दुर्लभ क्यों हैं। हम एक दो जोड़ी रजत पदक और कांस्य पदक मिल जाने पर ही संतुष्ट ही नहीं गद्गद हो जाते हैं। प्रश्न है क्या हमारी कोई राष्ट्रीय खेल नीति है? जो नीति है वह कागज पर ज्यादा और धरातल पर कम है। क्रिकेट के क्रेज ने बाकी खेलों को पीछे धकेल दिया है। खेलों को सरकारी संरक्षण तो चाहिए लेकिन सरकारी दखलंदाजी नहीं। पालिटिक्स खेलनेवाले अधिकारियों की छंटनी करनी होगी। हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं, यदि हम उसकी सही ढंग से पहचान करें, प्रोत्साहित करें तो हमें ओलंपिक में शरमाने की नौबत नहीं आयेगी।


