केन्द्रीय नेतृत्व की तरफ बढ़ते राहुल गांधी के कदम
राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा रहा है। इसकी घोषणा कभी भी हो सकती है। राहुल गांधी को यह अहम कुर्सी उनकी पारिवारिक विरासत व सांसद एवं पार्टी महासचिव के रूप में प्राप्त अनुभव के कारण मिलने जा रही हैं। जिसका अगला पड़ाव प्रधानमंत्री पद होगा, जिस पर राहुल गांधी सन् 2014 तक विराजमान हो जायेंगे, ऐसा पक्का अनुमान है। कभी महात्मा गांधी ने शाही जीवन का परित्याग कर आम लोगों के बीच आम आदमी बन कर आम लोगों का दुख दर्द बांटने की कोशिश की थी। तभी वे अंग्रेजों के अत्याचारों को जान पाए थे अहिंसा के रास्ते अंग्रेजों को न सिर्फ चुनौती दी थी बल्कि उन्हें देश से बाहर जाने पर भी मजबूर कर दिया था। ठीक उसी तरह राहुल गांधी भी आम लोगों का दुखदर्द बांटने के लिए आम लोगों के बीच गए। उनके लोगों के बीच जाने से राजनीतिक विरोधी उनके इन जनप्रेम को नौटंकी बता रहे हैं और इसे उ.प्र. में कांग्रेस की हार व समाजवादी पार्टी की जीत के सपने देखा जा रहा था। परन्तु कांग्रेस के पास राहुल गांधी को छोड़ कर कोई ऐसा नेता फिलहाल नहीं है जिसे सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रोजेक्ट किया जा सके। मौजूदा प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह पर लगते कमजोरी के ठप्पे से कांग्रेस भी चिन्तित है। हालांकि कांग्रेस के रूप में डा. मनमोहन सिंह की खबर का खण्डन किया है। परन्तु डा. मनमोहन सिंह की बढ़ती उम्र और कांग्रेस जनों का राहुल के प्रति बढ़ता विश्वास कांग्रेस को राहुल गांधी को आगे लाने के लिए मजबूर कर रहा है। जिसके लिए सारी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। लेकिन राहुल गांधी को छोड़कर क्या किसी अन्य नेता ने वातनुकूलित कमरों और लग्जरी गाड़ियों का मोह छोड़कर गरीब किसान मजदूरों की तरह रहने का साहस जुटाया है? स्वयं कांग्रेस में भी राहुल को छोड़कर ऐसे बहुत कम नेता हैं जो आम लोगों के बीच जाकर रहने की हिम्मत कर पाते हों। राहुल गांधी आज से नहीं जब से राजनीति में आए हैं तभी से आम लोगों के बीच जाते रहे हैं। अपने संसदीय क्षेत्र में तो राहुल गांधी प्राय: गरीब लोगों के घर जाकर रात गुजारते आए हैं।टूटी खटिया पर सोना, मच्छरों के बीच भीषण गर्मी या फिर सर्दी में उनहीं की तरह रहकर सादा खाना खाना राहुल गांधी की खासियत रही है।
किसानों को भूमि अधिग्रहण मामले में तो जो कुछ राहुल गांधी ने कर दिखाया वह एक करिश्मा ही है। अपनी सुरक्षा की परवाह किए बगैर राहुल सीधे पीड़ित किसानों के आंसू पोंछने गए और मायावती सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए और मायावती सरकार को हटवाने में कामयाब हुए। इतना ही नहीं राहुल ने किसानों को न्याय दिलाने के लिए पदयात्रा तक की। किसानों के बीच बिना कपड़ाबिछी खाट पर सोना, खुले नल पर स्ान करना और किसानों की तरह ही सादा भोजन करना राहुल गांधी की खासियत मानी जा रही है। जिसकी बदौलत किसानों को न्याय मिल पाया। सच यह भी है कि राहुल गांधी की उ.प्र. में इस सक्रियता से कांग्रेस विरोधी पार्टियों में जबरदस्त बेचैनी महसूस की जाती रही है। युवा राजनीति की धुरी बने राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र कायम कर नये युवाओं के लिए राजनीति के दरवाजे खोले तो मूल कांग्रेस में भी चापलूस एवं कागजी नेताओं की छुट्टी कराकर उन्हीं कार्यकर्ताओं को तवज्जों दी जो जमीन से जुड़े हैं। कम से कम उत्तराखंड को लेकर तो यह माना ही जा सकता है जहां उन्होंने हरियाणा के किसान नेता चौ. वीरेन्द्र सिंह को पार्टी का प्रभारी बनाकर सन् 2012 के चुनाव पर दाव लगाया जिसमें वे सफल भी रहे हैं। गांधीवाद पर चलते हुए राहुल गांधी की कार्यशैली यदि यही रही तो निश्चित ही वे भविष्य के बेहतर प्रधानमंत्री हो सकते हैं।
जो लोग राहुल गांधी के इर्द-गिर्द रहकर उनकी नजरों में आकर सत्ता सुख का ख्वाब पाल रहे हैं, उन्हें भी समझ लेना चाहिए कि राहुल गांधी जब स्वयं ही प्रधानमंत्री की कुर्सी से अभी तक दूरी बनाए रखी तो दूसरों को कैसे बिना योग्यता और अवसर के वे नेता बनने देंगे और यह सहीभी है, तभी कांग्रेस उ.प्र. में अपना खोया जनाधार वापस प्राप्त कर सकती है। और उ.प्र. समेत देशभर में सन् 2014 का लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार कर सकती है। लेकिन इसके लिए राहुल गांधी को दिग्विजय सिंह व कपिल सिब्बल जैसे बड़बोले नेताओं से बचकर रहना होगा अन्यथा वे कांग्रेस की लुटिया डुबोने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे औरऐसा होने पर उनके लिए नेतृत्व संभालना टेढ़ी कीर हो जाएगा।


