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वर्षों याद आएंगे हंगल

अभिनेता ए.के. (अवतार किशन) हंगल नहीं रहे। वे लम्बे समय से बीमार थे। लेकिन उम्र के दूसरे पड़ाव में अभिनय की शुरूआत करने वाले श्री हंगल ने 200 से अधिक फिल्में कर इस बात को और पुष्ट कर दिया है कि काम करने वालों के लिये उम्र सीमा आड़े नहीं आती। अपनी भरभरायी आवाज के जरिये उन्होंने हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर कई ऐसे किरदारों को जीवंत कर दिया, जिन्हें उनके चाहनेवाले वर्षों याद रखेंगे। चर्चित फिल्म ‘शोले’ के रहीम चाचा को कौन भूल सकता है। ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ इस फिल्म के डायलाग को लोग आज भी याद करते हैं। नमक हराम, लगान, शौकीन जैसी कई फिल्मों में श्री हंगल ने यादगार भूमिका निभाई। सियालकोट (अब पाकिस्तान) में जन्मे हंगल दर्जी के काम को अपना भविष्य बनाना चाहते थे। इस कार्य में उनकी बेहद रुचि भी थी, लेकिन परिवार के अन्य सदस्य बड़े सरकारी पदों पर थे। विरोध के कारण हंगल को पेशा बदलना पड़ा और वे फिल्मों में आ गये। उनके लिये कोई काम छोटा-बड़ा नहीं था। बल्कि किसी भी काम को पूरी ईमानदारी से करना उनकी आदत में शुमार था। यही वजह रही कि उनकी तमाम फिल्मों में छोटी भूमिकाओं में भी वे अलग नजर आये और लोगों के दिलों में बस गये। अपने अभिनय के लिये 2006 में वे पद्म भूषण से भी नवाजे गये। श्री हंगल स्वभाव से शांत और मिलनसार थे। यही वजह है कि उन्हें करीब से जानने वाले कहते हैं कि फिल्मों में उनकी भूमिकाएं उनके वास्तविक जीवन के कई अंशों को परिलक्षित करती हैं। देखा जाए तो सिनेमा में अपना कैरियर तलाशने वाली नयी पीढ़ी के लिये श्री हंगल का पूरा जीवन ही अनुकरणीय और प्रेरणास्रोत है। इसमें संदेह नहीं कि सिनेमा के शौकीनों को ए.के. हंगल की कमी खलेगी।

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