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बड़े खेल के शिकार हो गए खेल

भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाने वाले महान और कालजयी हाकी खिलाड़ी, ध्यानचंद सिंह के जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में तो मनाया जाता है। पर मेजर ध्यानचंद ने खेलों को क्या दिया, वह भावना कहीं बहुत पीछे छूट जाती है तो ये दिन भी बाकी दिनों की तरह बेमानी-सा होकर बीत जाता है। यदि सच्चे मन से आत्मावलोकन करें तो भारत में खेल दिवस मनाने का कोई औचित्य नजर ही नहीं आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि 125 करोड़ की आबादी एवम् दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भी इस देश का खेलों की दुनिया में को उल्लेखनीय मुकाम नहीं बन पाया है। भले ही व्यक्तिगत स्तर पर कुछ खिलाड़ी अपने बलबूते पर दुनिया में पहचाने जाते हों, पर टीम स्तर पर तो क्रिकेट के अलावा हर खेल में परिणाम शून्य या इसके आस-पास ही है।
ओलंपिक में दयनीय स्थिति
सबसे पहले उसी हॉकी को लीजिए जिसे इस देश ने राष्ट्रीय खेल का दर्जा देकर सम्मान दिया है, उस खेल में हम कहां है? लंदन में सम्पन्न हुए ओलंपिक खेल इसका साक्षात नमूना हैं? बड़े ही जोर-शोर से हॉकी से टीम बड़े-बड़े दावे करते हुए एवम् पुराने गौरवशाली दिन लौटाने का वायदा देश से करते हुए रवाना हुई थी, पर? पर परिणाम फिर वही ढाक के तीन पात या फिर सच कहें तो तीन पत्ते भी वह ढाई या दो करके ही लौटी है। अब तक का सबसे शर्मनाक प्रदर्शन कर उसने देश का नाम डुबा में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब गलत नीतियों, गलत चयन, गलत रणनीति व पता नहीं क्या-क्या गलत कह के हम फिर चार पांच साल को सो जाएंगे? अगले ओलंपिक या विश्व कप के लिए फिर किसी रम्मू झम्मू को विदेशी कोच के नाम पर या अपने किसी को केवल लाभ देने व उससे लाभ लेने के लिए नियुक्त कर माल साफ किया जाएगा व देश का नाम तथा पैसा डुबोया जाएगा।
जब किसी देश के राष्ट्रीय खेल का यह हाल हो तो बाकी खेलों से क्या उम्मीद की जा सकती है? हॉकी ही क्यों फुटबाल, कबड्डी, बास्केट बॉल, खो खो, टेनिस, किसी भी खेल को लें, वहां खेल कम और दूसरा खेल ज्यादा नजर आएगा। किसी प्रतियोगिता में जाने का मतलब खुद या अपने किसी को भेजने, उपकृत करने से ज्यादा कुछ रहा ही नहीं है। मंत्री, संतरी, अधिकारी, चमचे, कड़छे, कोच, फिजियो, सब की खातिरदारी होती है, पर बेचारे खिलाड़ी एक कमरे में दस सोने को विवश होते है? भूखे सोने, कुपोषण में जीने को अभिशप्त हों तो वे खेलों में परिणाम कैसे वह कहां से दें? हां, एक और मजेदार बात ये है कि हमारे खेल तंत्र किसी खिलाड़ी के द्वारा किये गए व्यक्तिगत प्रयास व मेहनत का श्रेय लेने में जरा भी देर नहीं लगाता। ये खेल संघ अब चाहे वह आई.अ.ए. हो या आई.एच.एफ. या कोई और, ज्यादातर खिलाड़ियों की बजाय जोड़ जुगाड़ वाले अधिकारियों, नेताओं के संजाल में फंसी हैं। कहीं कलमाड़ी रहे तो कहीं भुल्लर, कहीं गिल, कहीं डालमियाओं का डेरा जमा तो कहीं पंवार और उनके लोग हावी रहे, अब ये लोग भला कैसे भला करेंगे खेलों का? परिणाम भी सामने है।
अंधेरा ही अंधेरा
ऐसा भी नहीं कि खेलों की दुनिया में सब अंधेरा ही अंधेरा है, वहां सचिन, गावस्कर, कपिल, धोनी ही नहीं विश्वनाथ आनंद, सानिया मिर्जा, साईना नेहवाल, गोपी चंद, प्रकाश पादुकोण, अमृतराज बंधु, विजेंदर, अभिनव बिन्द्रा पी.टी. उषा, मैरी कोम, शाईनी विल्सन, विजय कुमार, गगन नारंग, मेजर ध्यानचंद के खेल में भी अजित पाल, अशोक कुमार, परगट सिंह जैसे न जाने कितने प्रकाश पुंज हैं, पर इनमें से एक के भी बनने या चोटी में पहुंचने में कौन से खेल संघ का हाथ है? किसने उन्हें सहारा दिया सिवाय उनकी सफलता का श्रेय लेने के? हमने क्या किया उनके विकास में? कमोबेश सब जानते हैं।
125 करोड़ लोग और तरस जाएं एक-एक पदक को? झोली खाली आए पर खेल तंत्र शर्म के साथ बहाने बनाए, झूठी उम्मीदें देकर खेलों में अपना ही खेल खेलता रहे, यह सब कब तक चलेगा? 180 का दल और गोल्ड एक भी नहीं, वह क्या उपलब्धि है? साधनों का रोना, पर करोड़ों का बजट स्वाहा!
सीखिए जमैका से, जापान से कजाकिस्तान, हंगरी या कोरिया से, चीन भी जनसंख्या का मारा है पर खेलों में अमेरिका जैसे धनाढ्यों को चुनौती दे रहा है। और हम कहां हैं? ये पूछे भी तो किससे? सब के अपने लक्ष्य हैं। जो वे पूरे कर रहे हैं. ये सवाल हमें लगातार शर्मिंदा करता है हमारे कुल घरेलू उत्पाद की दर जहां दुनिया के समृध्द देशों को भी पीछे छोड़ रही है, वहीं हम अंतरराष्ट्रीय खेलों में पहले दस पायदानों पर भी नहीं पहुंच पाए। आरोप-प्रत्यारोप के चक्र में शक की सुई घूम कर जाती है, खेल अधिकारियों की ओर जिन्होंने खेल का स्तर सुधारने की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। खेल संगठनों में पनपते भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और निहित स्वार्थ के कारण एक अरब से ज्यादा की हमारी आबादी मात्र दर्शक बनी रह गई। आंकड़ों को देखा जाए, तो दुनिया भर में खेलों की लोकप्रियता बढ़ाने में हमारा सबसे बड़ा योगदान है। लेकिन भारत में कितने खिलाड़ी हैं और कितने दर्शक, ये अंतराल भी दुनिया के किसी और देश में नहीं होगा। अब जबकि खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब का दौर बीत गया है, खिलाड़ी करोड़पति हैं, अरबपति हैं, अधिकारी मंडल की सम्पत्ति की थाह लेना भी नामुमकिन है। यादि खेलों में प्रदर्शन करें तो पैसे की कमी अब नहीं है, पर प्रदर्शन तो करना ही पड़ेगा और यह मुमकिन है केवल व केवल ईमानदार प्रयास से। ना उम्मीदी है पर उम्मीद की किरण जगानी ही होगी, देखें कब तक आ पाता है वह दिन जब हम भी गर्व से कह पाएंगे कि हां, हम हैं खेलों के भी शूरमा। (मंथन)

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