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Home » Features » 30 August 2012 »

अगली सरकार का नेतृत्व करने की मुलायम की उम्मीद

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को लग रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद केन्द्र में तीसरे मोर्चे की सरकार होगी। उन्हें उम्मीद है कि यदि उनकी पार्टी को लोकसभा में 60 सीटें भी मिल गई, तो वे सरकार के गठन के नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकते हैं। उनकी इस आशावादिता पर अन्य राजनैतिक दलों के नेताओं ने अलग-अलग तरह से प्रतिक्रियाएं जाहिर की हैं। उनमें से कुछ का कहना है कि आगामी चुनाव नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच होगा और उन्हीं दोनों में से कोई प्रधानमंत्री होंगे। अनेक नेताओं का मानना है कि तीसरे मोर्चे की कहीं कोई उम्मीद नहीं है और लड़ाई मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होनी है।

मुलायम की व्यूहनीति

आगामी लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आने के साथ-साथ सभी राजनीतिक दल अभी से अपने आपको उसके लिए तैयार करने लग गए हैं। यदि अपने तय समय पर चुनाव हुआ, तो वह 2014 में होगा, लेकिन वर्तमान राजनैतिक हालत को देखते हुए उसके समय से पहले होने की भी उम्मीद की जा सकती है। तैयारी के मामले में मुलायम सिंह ने अपने किस्म की खास तैयारियां करनी शुरू कर दी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी को शानदार सफलता मिली थी और उस सफलता से उत्साहित होकर यदि केन्द्र में खुद प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद पालने लगे हैं, तो यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 सांसद चुनकर आते हैं, जो किसी भी अन्य राज्य की तुलना में बहुत ज्यादा है।

कोई पहली बार नहीं है, जब मुलायम सिंह कह रहे हैं कि यदि उनकी पार्टी 60 लोकसभा सीटों पर चुनाव जीत ले, तो वे देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। 2004 में जब लोकसभा का चुनाव हो रहा था, उस समय भी वे अपनी पार्टी के नेताओं, कार्र्यकत्ताओं और समर्थकों से यही कह रहे थे। उस समय उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार थी। लेकिन दुर्भाग्य से उनकी पार्टी के लोकसभा सांसदों की संख्या 40 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। इसके कारण वे केन्द्र सरकार के गठन में कोई भूमिका तब नहीं निभा सके थे।

लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग है। इस बार इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में मुलायम की पार्टी पहली बार आरामदेह बहुमत के साथ विजयी हुई थी। जाहिर है, उनके साथ आज ज्यादा बड़ा समर्थक आधार है। इसके बूते वे 60 या उससे भी अधिक सीट जीतने की आशा तो पाल ही सकते हैं। अपने समर्थक आधार को और मजबूत और व्यापक करने के लिए मुलायम सिंह यादव की पार्टी राजनैतिक गोटियां सावधानी से फेंक रही है। अनुसूचित जाति व जनजाति के सरकारी कर्मचारियों में प्रोन्नति के मसले पर अपनी भीड़ से हटकर बनाई गई रणनीति मुलायम सिंह की नई राजनीति का हिस्सा है। देश की लगभग सभी पार्टियां जब अनुसूचित वर्गों के प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन कर रही हैं, तो वहीं समाजवादी पार्टी ने इसके खिलाफ बोलना शुरू किया है। मुलायम सिंह को पता है कि उत्तर प्रदेश में उन्हें दलितों का मत तो मिलना नहीं है, इसलिए इस तरह के विरोध से उन्हें कोई नुकसान नहीं होना है, जबकि इसके कारण उन वर्गों में उनकी लोकप्रियता बढ़ जाएगी जो आरक्षण और प्रोन्नति में आरक्षण का विरोध करते हैं। अन्य पिछले वर्गों के लोगों को तो पहले भी कभी प्रोन्नति में आरक्षण नहीं मिला है और न ही उनकी तरफ से इस तरह की कोई मांग हो रही है, इसलिए मुलायम के विरोध से पिछड़े वर्गों का कोई लेना-देना नहीं है।

आसान काम नहीं

उत्तर प्रदेश में 60 सीटें लाने के बावजूद मुलायम सिंह के लिए प्रधानमंत्री बनना आसान नहीं होगा। उनके प्रधानमंत्री बनने के लिए जरूरी है कि देश की राजनीत में गैर कांग्रेस और गैर भाजपा सरकार बनाने का माहौल हो। खासकर क्षेत्रीय पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ माहौल हो। कांग्रेस और भाजपा दोनों को किनारे कर सरकार बनाने में सबसे ज्यादा रुचि वाम पार्टियां लेती हैं। लेकिन मुलायम सिंह के साथ उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा है। वामपंथी नेता 2008 की उस घटना को नहीं भूले होंगे, जिसमें मुलायम सिंह ने मनमोहन सिंह की सरकार का समर्थन कर दिया था और वामपंथी दलों के सरकार गिराने के प्रयासों को नाकाम कर दिया था। यदि वे मुलायम को उस घटना के लिए माफ भी कर दें, तो मात्र उनके समर्थन से मुलायम की सरकार नहीं बनती। लालू यादव पार्टी भी मुलायम का साथ दे सकती है, लेकिन उसकी हालत बिहार में बहुत पतली हो चुकी है और चारा घोटाला में खुद लालू को सजा मिलने की संभावना की चर्चा से बिहार और झारखंड की राजनीति गर्म है।

मुलायम के प्रधानमंत्री बनने के लिए यह जरूरी है कि कांग्रेस और भाजपा के लोकसभा सांसदों की सम्मिलित संख्या बहुमत से बहुत कम हो। अनेक छोटी पार्टियां मुलायम के ऊपर भाजपा को तरजीह दे सकती है, इसलिए कांग्रेस का रवैया सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। क्या अपनी सरकार बनाने में विफल कांग्रेस मुलायम सिंह सरकार का समर्थन देगी? इस सवाल के जवाब में मुलायम ही मुलायम की आशावादिता की मजबूती या कमजोरी को देखा जा सकता है।

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