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शायरी का सच्चा यार : शहरयार

‘सींने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है …’ गजल आज भी हम उसी तरह गुनगुनाते हैं जैसे बत्तीस वर्ष पूर्व गुनगुनाते थे। आखिर कुछ तो है इस गजल में जो अनायास ही यह हमारी जुबां पर मचल जाती है। कहने को आप कुछ भी कह सकते हैं लेकिन इस गजल का दर्द हर शहरी का दर्द है। इस गजल का दर्द आम आदमी का दर्द है। बहुत तेजी से पत्थरों, शीशों और लोहे की शक्लों में बदलते जा रहे शहरों और महानगरों की सच्ची दास्तान है यह गजल। शहरों में आदमी तो बढ़ते जा रहे हैं लेकिन इंसान कम होते जा रहे हैं। एक-दूसरे से आगे भागने की दौड़ में हम अपनी भावनाओं और संवेदनाओं से रूबरू नहीं हो पा रहे हैं। इंसानियत की शक्ल दौलत के भंडार में दबती जा रही है। आदमी की गैरत उसके ईट, पत्थर और शीशे के महल से, लम्बी और अधिक सुविधाओं वाली गाड़ियों से और उसके बैंक-बैलेंस से पहचानी जा रही है। नकली चेहरों और बनावटी फितरत वाले लोगों से भरी इस दुनिया में सब कुछ औपचारिकता में बदलता जा रहा है यहां तक कि हमारे इंसानी रिश्ते भी। इस दर्द को पहचानने वाले और अपने शब्दों में इस बांधने वाले शायर ‘शहरयार’ अब हमारे बीच नहीं रहे। अब इस सबको क्या माना जाए, महज इत्तफाक या कुछ और, 13 फरवरी 2012 को ‘फैज’ साहब की दूसरी जन्म शताब्दी की शुरूआत हो रही थी, उनके जन्मदिन पर गजल प्रेमी उन्हें याद कर रहे थे और उसी गजलनुमा शाम में ‘शहरयार’ का चिराग बुझ गया।
‘शहरयार’ का जन्म 16 जून 1936 को आंवला जिला बरेली में हुआ था। उनका पूरा नाम अखलाक मुहम्मद खान था। उनके पिता पुलिस की नौकरी में थे और तलादलों के चलते आखिर 12 वर्ष की उम्र में अलीगढ़ उनका ठिकाना बना। अंग्रेजी माध्यम के छात्र का उर्दू भाषा से ऐसा संजोग जुड़ा कि इस भाषा ने न केवल उनकी रोजी-रोटी को बांधे रखा बल्कि उनके भीतर के इंसान को लोगों के सामने गजल और नज्म बनाकर पेश किया। वर्ष 1961 में उर्दू में स्ातकोत्तर डिग्री लेने के बाद वह 1966 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू पढ़ाने लगे और कालान्तर में वह उर्दू विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए।
सम्पूर्ण जीवन साहित्य को समर्पित
उनका सम्पूर्ण जीवन साहित्य को समर्पित रहा। उन्होंने उर्दू साहित्य में गजल और नज्म को अपने साथ रखा। साथ क्या रखा, बल्कि उसे अपने दर्द से सजाया, संवारा और उसे एक नई दिशा देने का भी प्रयास किया। उनकी गजल कहीं झंडा नहीं उठाती मगर कहीं झुकती भी नहीं। अपने सीधे-सादे विचारों को जो उन्होंने अमलीजामा पहनाया, वह अतुलनीय है। उन्होंने कहीं दावे नहीं किए, न ही उन्होंने अपने आप को झूठी आन-बान में ढलने दिया। वह तो सबके हितैषी थे, यहां तक कि उन्होंने भाषा की लड़ाई को भी अपने साहित्य में कहीं नहीं आने दिया। उन्होंने अपनी किताबों को उर्दू और देवनागरी में प्रकाशित कराया क्योंकि वह मानते थे कि उर्दू और हिन्दी में केवल लिपि का अन्तर है, नहीं तो दोनों भाषाओं में बहुत सी समानताएं हैं।
शहरयार ने जब शायरी प्रारंभ की तो बहुत वर्षों तक उनका तखल्लुस ‘कुंवर’ रहा मगर बाद में उनके करीबी कहे जाने वाले खलीलुर्रहमान आजमी साहब ने उसे ‘शहरयार’ कर दिया। उनकी रचनाओं में शहर का जिक्र अक्सर आता रहता है। उन्हें अपने शहर से अथाह प्रेम था। यह इस बात से भी जाहिर होता है कि फिल्मों के लिए गीत लिखने के लिए उन्हें बार-बार बम्बई जाना पड़ता था और काम खत्म होने के बाद वह वापस अलीगढ़ आ जाते थे। बम्बई में अधिक समय तक न टिक पाने के कारण बहुत से फिल्मकार उनके सम्पर्क में नहीं आ सके और बहुत से फिल्मकारों को बंबई में न रहने वाले शायर से अपनी फिल्मों के गीत लिखवाना पसंद नहीं था। वह कोई फिल्मी शायर थे भी नहीं, मगर यह भी अजीब बात रही कि उन्हें सिनेमाई शायर ही माना गया। ‘गमन’ और ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ फिल्मों के गीतों ने उन्हें सिनेमा में पहचान तो दी लेकिन ‘उमराव जान’ से वह सिनेमा जगत में छा गए और वह रातों-रात प्रसिध्द हो गए।
‘उमराव जान’ जिन्दगी का हिस्सा
दरअसल ‘उमराव जान’ उनकी जिन्दगी का एक हिस्सा थी। उन्होंने तवायफों को नजदीक से देखा था। उन्होंने ‘उमराव जान’ के गीतों की रचना-प्रक्रिया के बारे में बताया था कि उनके वालिद साहब की बहेड़ी (बरेली) पोस्टिंग के दौरान उनकी उम्र सात-आठ बरस ही रही होगी। वहां पर तवायफों के मकान थाने के नजदीक ही होते थे। वह घूमते-फिरते अक्सर वहां पहुंच जाते थे और उनकी वहां पर अच्छी खातिरदारी भी होती थी। उन्होंने अपने बड़े भाइयों की शादी में भी मुजरे देखे थे। कहते हैं न कि बचपन की उम्र कच्ची उम्र होती है और उस उम्र की यादें कभी भी इंसान भूल नहीं सकता। अपने बचपन में ही वह तवायफों से बातचीत करते थे और उनके बारे में तरह-तरह की बातें सुनते-सुनते उनकी हकीकत से रूबरू हो गये थे और फिर ‘उमराव जान’ उन्होंने यूनिरर्सिटी में पढ़ाया भी था। यही वहज रही कि ‘उमराव जान’ के सभी गाने एक से बढ़ कर एक थे। फिल्म के निर्देशक मुजफ्फर अली उनके जिगरी दोस्त थे। इस फिल्म के तमाम गाने उन्होंने अपनी शर्तों पर लिखे। खय्याम साहब एक गीत के मुखड़े में बदलाव चाहते थे, मगर उन्होंने नहीं माना था। आखिरकार खय्याम साहब मान गए और गजल ‘ये क्या जगह है दोस्तो …’ पूरी हुई। शहरयार साहब एक नेक दिल इंसान भी थे, ‘उमराव जान’ का सारा क्रेडिट उन्होंने खय्याम के संगीत को, रेखा के अभिनय को और मुज्जफर अली के निर्देशन को दे दिया था। गीतों के लिए तो यह था कि उनका काम लिखना था और पसंद करना न करना सुनने वालों का। आजकल के गीतों पर वह कोई टिप्पणी नहीं करते थे लेकिन वह जानते थे कि उनकी गजल कभी कमर्शियल नहीं हो सकती थी।
शहरयार की गजलों और नज्मों की बात करें तो हम देखते हैं कि उनकी शायरी जमीन से जुड़ी हुई रहती थी और वह आधुनिक समाज की समस्याओं को समझते थे। समाज के प्रत्येक वर्ग की जरूरतों का उन्हें ध्यान रहता था। उनकी शायरी घोर निराशा में डूबे हुए लोगों के लिए प्रेरणा पैदा करती थी, उन्हें हिम्मत देती थी-
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता।
उर्दू शायरी को रचना उनके लिए बहुत आसान था मगर फिर भी शैली और भाषा की आत्मा से उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया था। वह बखूबी गढ़ते थे और भाषा का मान भी रखते थे। खुद आम आदमी थे इसलिए अपनी शायरी में वह आम आदमी का पूरे का पूरा गम उड़ेल देते थे, जिससे उनके शब्दों में एक चमक पैदा होती थी और वह शायरी आम आदमी अपने ऊपर ओढ़ लेता था। जीवन की सच्चाई से वह रूबरू रहते थे, इसी को ध्यान में रख कर यह पंक्तियां उन्होंने ही लिखी हैं
जहां जाइए रेत का सिलसिला
जिधर देखिए शहर उजड़े हुए
वह अपनी शैली में विरले थे, किसी को सपाट कहना भी उनसे सीखा जा सकता है-
जो बुरा था कभी वह अच्छा हो गया कैसे
वक्त के साथ मैं इस तेजी से बदला कैसे
कमलेश्वर ने उनके लिए एक जगह लिखा है-
‘सुनो शहरयार’
शहरयार की खूबी यही है कि उनकी रचना का चेहरा निहायत व्यक्तिगत है, लेकिन उसमें झांकिए तो अपना और फिर धीरे-धीरे वक्त का बदहाल चेहरा झांकने लगता है। उनकी शायरी में हर इंसानी और कुदरती मौसम के साथ-साथ वह शऊर मौजूद है, जो तुकबंदी को तोड़ कर अशऊर और बात को बेतुका होने से बचाता है, जहां गजल का फन नहीं, हर मौसम की हल्की हवा की तरह बात अपनी बात कहती है और वह बात एक यादगार गजल या नज्म बन जाती है। इसमें न कुछ रेशमी है न तो सूती, यह बस भीगी बालू की तरह भारी, हमवार और सराबोर है। शहरयार की शायरी की इस भीगी बालू को निचोड़ा नहीं जा सकता बस इतना महसूस किया जा सकता है कि इसके नीचे या तो गहरे अहसास की कोई नदी है या तहजीबी अहसास का कोई समुन्दर।
बहुत से शायरों, गीतकारों, रचनाकारों ने शहरयार के बारे में बात की है और सभी की नजरों में शहरयार एक ईमानदार शायर थे जो न केवल अपना रचना-धर्म निभाने में पूर्ण थे बल्कि हर शख्स की हैसियत का अंदाजा भी उन्हें रहता था। कोई भी इंसान अपने आप में कहीं न कहीं कमजोर भी होता है, परन्तु शहरयार की खूबी यह थी कि उन्होंने अपनी शायरी को कहीं टूटने नहीं दिया। उनका हर शेर अपने आप में सब-कुछ बयां करता है, वह अपने आप में एक सच्चे शायर थे। उनकी शायरी में कहीं भी झूठ का आवरण नजर नहीं आता।
उनकी एक किताब ‘सुनो शहरयार’ के लिए गुलजार साहब ने अपनी टिप्पणी में उन्हें नए समय का शायर बताते हुए कहा है कि शहरयार रवायत को बचाकर, आधुनिकता का बोध को रचते हैं, शहरयार की जदीदियत उर्दू शायरी से थोड़ी भिन्न भी है। यहां संश्लिष्टता है और व्यापकता भी। नज्मों में वो समय, मृत्यु, जीवन, व्यर्थता जैसे तत्वों पर लिखते वक्त कहीं सूफियाना रंग बिखेरते हैं तो कहीं आध्यात्मिक होने लगते हैं :
ध्यान की पुरपेच गलियों और गुजरगाहों पे,
ज्ञान के फैले हुए सहरा की जानिब, चंद साए जा रहे हैं।
गुलजार साहब के शब्दों में ही, ‘शहरयार अपनी गजलों में और जन्मों में जिन्दगी लय को ऐसे तहलील करते हैं कि शायरी, समय, इंसान और प्रकृति का रागतत्व बन जाती है। बेशक उनकी शायरी में किश्तियां, ख्वाब, सैबाल, दरिया, रात जैसे प्रतीक बार-बार रिपीट होते हैं। इसके बावजूद उनकी शायरी, इतनी महीन, सूक्ष्म, अर्थवान है कि लय और अनुभूति मिल कर जिस सृष्टि की संरचना करते हैं वो और कुछ नहीं वो शहरयार की शायरी हो होती है।’
शहरयार को न जाने कितने पुरस्कारों से नवाजा गया और उनकी शायरी की रंगत ही यह रही कि वर्ष 2008 का भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें प्रदान किया गया, जिसे भारतीय साहित्यिक नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है। इससे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू अकादमी पुरस्कार और फिराक सम्मान सहित बहुत से पुरस्कारों से नवाजा गया।
आज ‘शहरयार’ हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी शायरी से इस जहां की सारी महफिलें परवान चढ़ती रहेंगी और उन्हें याद किया जाता रहेगा। उन्होंने स्वयं ही एक बार लिखा था-
आसमां कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए
मैंने सब तैयारियां कर ली हैं मरने के लिए।
(साभार : प्रयास)

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