अब नौकरशाही पर नकेल
पटना, टेक्नोक्रेट मुख्यमंत्री ने अब ब्यूरोक्रेट पर लगाम कसना शुरू कर दिया है। शीर्ष अधिकारियों के कामकाज की न सिर्फ समीक्षा की जा रही है बल्कि काम के आधार पर अंक देने और उसी आधार पर प्रोन्नति की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है। इस ग्रेडिंग सिस्टम के पहले नतीजे में जिन अधिकारियों को कम अंक मिले, उनमें नाराजगी भी है।
उल्लेखनीय है कि विगत कई माह में ही नीतीश सरकार ने यह तय किया था कि आईएएस अधिकारियों के कामकाज की समीक्षा प्रत्येक दो माह में की जायेगी। विकास से लेकर जन कल्याणकारी योजनाओं की प्रगति के आधार पर एक-एक अधिकारी की भूमिका की समीक्षा और 10 अंकों के आधार (पूर्णांक) पर ग्रेडिंग कर उसी आधार पर सीआर बनाने का सरकार ने निर्णय लिया।
अभी हाल में अगस्त महीने के अंतिम में शीर्ष अधिकारियों का पहला परफॉरमेंस रिजल्ट आया। पीएआर यानी कार्य मूल्यांकन प्रतिवेदन में लगभग दर्जन भर आईएएस अधिकारी फेल हो गये। किसी को मिले 7 अंक तो किसी अधिकारी को मिले 8 अंक। पूरे 10 अंक जिन अधिकारियों को मिले उनमें प्रमुख हैं, वित्त विभाग के प्रधान सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग के प्रधान सचिव, कैबिनेट के प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव आदि।
अब तक हर वर्ष आईएएस अधिकारियों के सीआर अर्थात चारित्रिक अभियुक्ति दर्ज करने का प्रावधान था, लेकिन अब सीआर की जगह पीएआर दर्ज करने का प्रावधान किया गया है। सूत्रों के अनुसार सचिव स्तर के आईएएस की रिपोर्ट जहां मुख्य सचिव लिखते हैं वहीं प्रधान सचिव स्तर के आईएएस की रिपोर्ट स्वयं मुख्यमंत्री लिखते हैं। अब तक सीआर में अच्छा, बहुत अच्छा या विशिष्ट लिखा जाता था लेकिन अब इसके लिये 10 अंक निर्धारित किये गये हैं। पीएआर की इस नयी प्रक्रिया में जिन अधिकारियों को औसत अंक मिले हैं उनमें भारी असंतोष है और इन अधिकारियों ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाले रेफरल बोर्ड में अपना विरोध भी दर्ज किया है। उनके विरोध पर मुख्य सचिव ने आपत्तियों की समीक्षा करने का आश्वासन भी दिया है।
उल्लेखनीय है कि नीतीश सरकार के सुशासन के नारों के खिलाफ विपक्ष ने अपना तेवर दिखाना शुरू कर दिया है। पिछले सात वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर नौकरशाह को सीमा से अधिक छूट देने के आरोप लगते रहे।
उधर मुख्यमंत्री बिहार में आईएएस की कमी बताकर अपरोक्ष रूप से यह बताने की कोशिश में जुटे रहे कि बढ़ते योजना आकार को खर्च करने, योजनाओं के क्रियान्वयन मं उन्हें अधिकारियों से सहयोग की जरूरत है।
लेकिन जब मुख्यमंत्री को पिछली सेवा यात्रा के दौरान आम लोगों का आक्रोश झेलना पड़ा और इस जन आक्रोश का विश्लेषण किया गया तब ब्यूरोक्रेट पर नकेल कसने की जरूरत महसूस हुई। सेवा यात्रा के दौरान कई स्थानों पर ‘मुख्यमंत्री जिंदाबाद’ के नारे लगे तो उसी नारे के साथ-साथ अधिकारियों का पदनाम लेकर उनके मुर्दाबाद के नारे लगे- मुख्यमंत्री के सामने आम जनता की जितनी शिकायतें आयीं उनमें अधिकांश बीडीओ से लेकर जिलाधिकारी तक के खिलाफ आक्रोश थे। सेवा यात्रा के दौरान ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महसूस किया कि जनता के बीच भले ही उनकी लोकप्रियता बरकरार है लेकिन नौकरशाह पर शीघ्र लगाम नहीं कसी गयी तो जनता का आक्रोश उनके खिलाफ भी हो सकता है और लोकप्रियता का ग्राफ गिर सकता है।


