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Home » Entertainment » 16 September 2012 »

अपनी बॉलीवुड इंडस्ट्री

बॉलीवुड इंडस्ट्री में तीन खानों का जादू आज भी कायम है। दशक गुजर चुके हैं। लेकिन अब भी खानों को उनकी गद्दी से कोई उतार नहीं सका। हालांकि समय समय पर ऋतिक रोशन, अक्षय कुमार, अजय देवगन भी बड़े पर्दे पर अपना जादू बिखेरते रहते हैं। लेकिन 100 करोड़ रुपये का दाव खेलने की ताकत इन तीनों खआनों में ही सहजता से दिखाई देती है। जबकि अन्य हीरो पर इतना बड़ा दाव खेलना रिस्क जोन में निर्देशकों को डालता है।

लेकिन अब भी हम यह कह सकते हैं कि हमारे पास हीरो की न सिर्फ कमी है बल्कि बॉलीवुड हीरो की किल्लत से जूझ रहा है। एक्टिंग न आने के बावजूद भी तुषार कपूर, रितेश देशमुख, अभिषेक बच्चन, जॉन अब्राहम जैसे अन्य हीरो को फिल्मों में साइन किया जाता है। इन्हीं गिने चुने अभिनेताओं से लोगों को हंसाने की, रुलाने की कोशिश की जाती है। सवाल उठता है कि क्या 100 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले हमारे देश में महज कुछ गिने -चुने ही चेहरे हैं जो हीरो बनने के काबिल है या फिर एक्टिंग से लोगों का मन भर गया है? अगर आते भी है तो भी कुछ एक फिल्मों के बाद वे कहीं गुम हो जते हैं। ऐसा नहीं है कि हीरोइनों की इंडस्ट्री में रेल है। हमारे पास विद्या बालन, प्रियंका चोपड़ा, जैसी गिनी चुनी बमुश्किल कुछ हीरोइन है। लेकिन जिन्हें एक्टिंग नहीं आती, उन्हें भी जबरन एक्टिंग में खींचा जाता है। बावजूद इसके नए चेहरों को इंडस्ट्री मौका नहीं देती।

लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने की बात यह है कि अरबों रुपये की फिल्म इंडस्ट्री हाल के सालों में एक भी ऐसा अभिनेता पैदा नहीं कर सका जो कि दर्शकों को अपना दीवाना बना सके। पहले सुपर हीरो राजेश खन्ना, उसके बाद अमिताभ बच्चन। अमिताभ बच्चन अपनी गद्दी में आज भी विराजमान हैं जबकि कोई भी उन्हें …….. सीट से हिला नहीं सका है। यहां तक कि इंडस्ट्री के बादशाह कहे जाने वाले शाहरूख खान भी उनकी गद्दी छीनने में नाकामयाब है। सवाल है ऐसा क्यों है? क्या लोगों में ब अभिनय क्षमता कम हो गई है? ऐसी फिल्में बननी बंद हो गई है? या फिर ये इंडस्ट्री नए चेहरों को आजमाना नहीं चाहती ? यह कहने की बात नहीं है किसी भी फिलम के हिट होने की बड़ी वजह फिल्म की पटकथा ही होती है। लेकिन यह भी सच है कि अभिनय क्षमता रद्दी फिल्मों को भी उच्च मुकाम तक पहुंचाने का माद्दा रखती है। इस नजरिये से देखा जाए तो हम सहज इस बात को कह सकते हैं कि इंडस्ट्री ने एक भी ऐसा हीरो नहीं बनाया है जो दर्शकों को रिझा सके, अपनी अभिनय क्षमताओं से लोगों को चौंका सके।

आपके जहन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर हीरो दर्शकों को रिझा न सके तो निर्देशक उन पर करोड़ों रुपये का दांव क्यों खेलता? या फिर दर्शक ही उनकी फिल्म देखने दौड़ते हुए सिनेमा हॉलों तक क्यों पहुंचते? दरअसल इसकी कई वजहे हैं। दर्शक अब फिल्मों को मनोरंजन का जरिया भर मानता है। साथ ही बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने लोगों से समय छीन लिया है। हमारे पास आज अपने ही पार्टनर के लिए वक्त नहीं है। ऐसे में तीन घंटे की हिन्दी फिल्में हमारे लिए कुछ वक्त निकलती है कि हम अपनों के साथ बैठक कुछ देख सकें। थोड़ी मस्ती कर सकें। यही कारण है कि हर रद्दी से फिल्म में भी टिकट काउंटर में दर्शकों की लाइन अवश्य नजर आ जाती है।

इसके अलावा बॉलीवुड इंडस्ट्री ने दर्शकों के सामने यह विकल्प नहीं रखा कि वे पसंदीदाहीरो की फिल्म देख सकें। हीरो के नाम पर हमारे पास अधिकतम 15 से 20 नाम मौजूद हैं। इनमें से भी कुछ अभिनेता ऐसे हैं जिनको अभिनय जरा भी नहीं आता वरन् उन्हें उनकी मां या पिता के कारण इंडस्ट्री ढो रही है साथ ही दर्शक भी उन्हें झेल रहे हैं। तुषार कपूर ऐसे ही हीरो में से एक हैं। शायद उनके खाते में एक भी फिल्म ऐसी मौजूद नहीं है जो उनके सहारे चली हो। फिर भी इंडस्ट्री न सिर्फ उन्हें सइन करती है बल्कि वे निरंतर फिल्मों में बने हैं यानी उनका भविष्य बिल्कुल सिक्योर है। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि हीरो की एक जगह हमेशा खाली रहेगी।

हीरो की कमी एक बड़ी वजह पैसा भी है। आज फिल्में करोड़ों रुपये की बनती है। कोई निर्माता यह नहीं चाहता कि उसकी फिल्म बॉक्स आफिस पर पिट जाए। वह नियमित हिट बने रहना चाहता है ताकि उसके पैसे भी निकल आएं और उसकी मौजूदगी भी बरकरार रहे। यही कारण है कि ज्यादा से ज्यादा पैसे अक्सर खानों की तिकड़ी में खर्च किये जाते हैं। दरअसल ये तीनों पैसा कमाने की सौ फीसदी गारंटी बन चुके हैं। जबकि निर्माता किसी नए चेहरे पर अपना पैसा खर्च करना नहीं चाहते, क्योंकि उसमें पैसा लौटने की कोई गारंटी नहीं होती। इसलिए अक्सर हीरो को इंडस्ट्री में इंट्रोड्यूस करने के लिए उनके पिता आते हैं जैसे कि ऋतिक रोशन इसी फेहरिस्त का हिस्सा है। वह पने पिता की फिल्म से ही इंडस्ट्री में एक नई पहचान बना सके। अगर निर्माता नए चेहरों को मौका देता भी है चो उन पर नाम मात्र पैसा खर्च करते हैं।
इससे यह स्पष्ट हो गया है कि नए चेहरों पर पैसा लगाने के लिए कोई तैयार नहीं है। हर कोई उन्हीं चेहरों को कैश करना चाहता है जो कि पहले से ही इंडस्ट्री में मौजूद है। अगर हम एक नजर इंडस्ट्री में दौड़ाए तो पाएंगे ज्यादातर हीरो वहीं इंडस्ट्री में टिके हैं जिनके पिता, भाई, बहन, मां अपने दौर के मशहूर अभिनेता व अभिनेत्री रही हैं। ये इंडस्ट्री आज भाई-भतीजावाद चल रही है। परिणामस्वरूप हमारे पास एक भी ऐसा नया चेहरा नहीं है जिसे देखकर यह कहा जा सके कि ‘वाह! क्या बात है?’ इंडस्ट्री सालों साल से एक भी ऐसा चेहरा इजाद नहीं कर सकी जिन्हें हम वास्तव में एक बेहतर मान सकें या फिर उसे दर्शकों द्वारा बनाई गई सिंहासन पर बिठाया जा सके।

कुल मिलाकर कहने की बात यह है कि यहां डाइरेक्टर का बेटा डाइरेक्टर बनता है, हीरो का बेटा हीरो बनता है, निर्माता का बेटा निर्माता बनता है। बेशक उन्हें फिल्मों के बारे में कोई जानकारी न हो। फिर भी उनके इस इंडस्ट्री बाहें खोल रखी हैं। लेकिन बाहर से आए नए चेहरों को मौका कभी नहीं मिलता। अगर मिलता भी है तो उन्हें अक्सर बड़े नामी हीरो व हीरोइनों द्वारा दबा दिया जाता है ताकि उनकी छाप पर कोई आंच न आ सके।

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