डायबिटीज और आयुर्वेद
भारत में तो हजारों वर्ष पूर्व ही मधुमेह रोग को पहचान लिया गया था। आयुर्वेद की तीनों ग्रंथ-पुस्तकों, चरक संहिता, अष्टांग हृदय संहिता तथा सुश्रुत संहिता में इसका जिक्र मिलता है। उसमें अलग प्रकार के मधुमेह व उसके उपचार का वर्णन है। बावजूद इसके आज भी बहुत कम लोग ही मधुमेह के बारे में विस्तृत जानकारी रखते हैं।
वे यह भी जानते कि यदि यह रोग एक बार लग गया तो पूरे जीवन सावधानी व संयम बरतना पड़ता है बल्कि मधुमेह के लक्षण अच्छी तरह दिखाई देने भी ज्यादातर लोग यह नहीं समझ पाते कि उन्हें मधुमेह है। याद रहे मधुमेह एक जानलेवा रोग है। यह एक बार लग गया तो जिंदगी भर पीछा नहीं छोड़ता।
आयुर्वेद में मधुमेह को ‘प्रमेह’ कहा गया है। इस रोग में तीनों दोष वात, पित्त और कफ दूषित होते हैं व शरीर की सभी धातुएं, रस, रक्त, मांस, भेद मज्जा, शुक्र एवं वसालसिका ओज भी दूषित हो जाती हैं। आयुर्वेद में प्रमेह के 23 प्रकारों का वर्णन है। कफजन्य 10, पित्त अन्य 6 और वातजन्य के 7 प्रकार हैं। ऐसी धारणा गलत है कि डायबिटिज होने पर सब खाने पीने के सुख छीन जाएंगे। कुछ लोग इसी चक्कर में यह भी छिपाने की चेष्टा करते हैं कि उन्हें मधुमेह रोग है। यह धारणा ही गलत है। सच तो यह है मधुमेह रोगियों का भोजन औरों के भोजन से अधिक होना चाहिये। यदि सब लोग डायबिटिज खाना खाने लगें तो उसका स्वास्थ्य अच्छा हो जाएगा।
आज हम प्राकृतिक भोजन से दूर होते जा रहे हैं। आयुर्वेद में भोजन के तौर तरीकों की भी ज्ञानवर्धक जानकारी है। जरूरी है खान-पान के नियमों को जानने की। फलों एवं सब्जियों के मिश्रण का भी पर्याप्त ज्ञान जरूरी है अन्यथा पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण फल एवं सब्जियां भी घातक सिध्द हो सकती हैं। खान-पान में परहेज आवश्यक है।


