Home » Features » 16 September 2012 »

कांग्रेस हारी, तो वंशवाद खत्म

इसमें कोई शक नहीं कि 2014 या उससे पहले हो जाने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद नेहरू गांधी परिवार की प्रतिष्ठा को ग्रहण लग जाएगा। यदि चुनाव के बाद किसी तरह कांग्रेस ने सरकार का गठन भी कर लिया, तब भी नेहरू-गांधी वंश की प्रतिष्ठा नहीं बचेगी, क्योंकि उनके नेतृत्व को छोटी-छोटी पार्टियों की ओर से चुनौती मिलती रहेगी। इसके कारण पार्टी पर से सोनिया परिवार की पकड़ भी कमजोर हो जाएगी। उनकी उपस्थिति के बावजूद पहले की तरह पार्टी में उनकी बात नहीं चलेगी। इसकी शुरूआत तो हो भी गई है। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन के विद्रोह और सफलता से आहत कांग्रेस नेतृत्व हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो रहा है।
1977 और 1989 की घटनाएं
कांग्रेस पहले भी कई बार हारी है, लेकिन इस बार की हार उसके लिए अलग मतलग लेकर आएगी। 1977 और 1989 में कांग्रेस पराजित होकर सत्ता से बाहर हो गई थी। 1977 में हार के पीछे इन्दिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल जिम्मेदार था, जिसके खिलाफ अधिकांश विरोधी पार्टियां एक हो गई थी और कांग्रेस को सत्ता से बाहर हो जाना पड़ा था। लेकिन उस समय भी कांग्रेस के पास लोकसभा में लगभग 200 सांसद थे। 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में शानदार वापसी हो गई थी, क्योंकि तब कांग्रेस उस लायक थी कि विपक्षी पार्टियो के बीच मतों के विभाजन का वह लाभ उठा सके। इन्दिरा गांधी की पकड़ भी लोगों के ऊपर बहुत मजबूत थी और जब उनकी 1984 में हत्या हुई तो सहानुभूति से उपजी लहर ने राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को 400 से भी ज्यादा लोकसभा सीटें दिलवा दी थी।
1989 में कांग्रेस की हार हुई थी, लेकिन उसका एक बड़ा कारण वीपी सिंह के कारण कांग्रेस के अंदर हुई टूट थी। उस टूट के बाद भी पार्टी फिर से उबरने की सोच सकती थी, क्योंकि तब भी कांग्रेस को करीब 200 सीटें लोकसभा में मिली थी और विपक्ष में होने के बाद भी वह लोकसभा के अंदर सबसे बड़ी पार्टी थी। 1996 में पहली बार कांग्रेस से ज्यादा भाजपा को लोकसभा सीटें मिल गई थी, लेकिन तब कांग्रेस के नेतृत्व में गांधी परिवार नहीं था। गांधी परिवार पार्टी के नेतृत्व में दुबारा 1999 के चुनाव के समय आया। सोनिया गांधी उस समय कांग्रेस की अध्यक्ष थी और उनके नेतृत्व में ही कांग्रेस ने अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन देखा था। उस समय कांग्रेस को लोकसभा में मात्र 112 सीटें मिली थीं, जो नरसिंहराव के नेतृत्व में 1996 और सीताराम केसरी के नेतृत्व में मिली सीटों से बहुत कम थी।
भाजपा की हार ः कांग्रेस को फायदा
2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी को 140 से ज्यादा सीटें मिलीं, जो सीताराम केसरी और नरसिंहराव के नेतृत्व वाले प्रदर्शन के आसपास की थी, लेकिन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हाथों उत्तर प्रदेश में भाजपा के बुरी तरह पिटने के कारण भाजपा उस चुनाव में दूसरी नंबर की पार्टी बन गई। लोगों को लगा कि सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधार ली है, लेकिन सचाई यही थी कि भाजपा की उत्तर प्रदेश में सपा बसपा के हाथों बुरी हार और कुछ पार्टियों के द्वारा गठबंधन के कारण कांग्रेस सत्ता में आई थी। पहले हमेशा कांग्रेस का विरोध करने वाले वामपंथी दलों ने भी कांग्रेस को सरकार बनाने में सहयोग दे दिया था। कांग्रेस के सत्ता में आने का एक बड़ा कारण वह भी था।
सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस 2009 में 200 का आंकड़ा पार गई। यह एक बड़ी सफलता थी। लेकिन यदि इस आंकड़े से अब यह बहुत नीचे फिसली, तो उसकी पुरानी प्रतिष्ठा मारी जाएगी। भारतीय जनता पार्टी की स्थिति में कोई सुधार तो नहीं हुआ है और उसके बारे में लोगों की धारणा भी नहीं बदली है, लेकिन कांग्रेस की अपनी स्थिति लगातार खराब होती जा रही है जिसे देखते हुए उसके भविष्य के बारे में संदेह होना स्वाभाविक है। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जिस तरह की हार हुई है और भ्रष्टाचार के मामलों में उसके नेता जिस तरह फंसते दिखाई पड़ रहे हैं, उससे तो यही लगता है लोकसभा का अगला चुनाव उसके लिए अब तक का कठिनतम चुनाव होने जा रहा है।
कांग्रेस जिस राजनीति के लिए पहले जानी जाती थी, अब उसमें भी बदलाव आ रहा है। इधर वोटों के खातिर कांग्रेस पहचान की राजनीति करने लगी है। पहले उसने पिछड़े वर्गों के छात्रों को उसने केन्द्रीय संस्थानों में आरक्षण दिया। बाद में मुसलमानों को भी आरक्षण देन की घोषणा कर दी। अब वह अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने की घोषणा कर रही है।
इस सबके कारण कांग्रेस की पहचान एक सिध्दांतवादी पार्टी का नहीं रही, बल्कि जातिवादी क्षेत्रीय पार्टियों की श्रेणी में अब वह शुमार हो रही है। जाहिर है 2014 में हार के बाद कांग्रेस को सोनिया परिवार से बाहर अपना नेतृत्व तलाशना होगा।

jharkhandjobs.com calling all to register and search jobs