चीनी पोलितब्यूरो का चुनाव एक दिखावा
इस वर्ष के अन्त में अमेरिका और चीन के नये सत्ताधारियों का एलान होगा। अमेरिका में नवम्बर महीने में यह पता चल जाएगा कि कौन हुए देश के राष्ट्रपति? नवम्बर या दिसम्बर महीने में ही यह भी मालूम चल जाएगा कि चीन के सशक्त पोलित ब्यूरो की स्टेंडिंग कमेटी के कौन-कौन सदस्य निर्वाचित हुए। सभी साम्यवादी देशों में पोलित ब्यूरो एक शीर्षस्थ संस्था होती है जो यह निर्णय करती है कि कौन देश का राष्ट्रपति होगा, कौन उपराष्ट्रपति, कौन प्रधानमंत्री होगा और कौन उपप्रधानमंत्री होगा। चीन में सरकार से अधिक शक्तिशाली वहां की साम्यवादी पार्टी है। पोलित ब्यूरो ही यह निर्णय करता है कि पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा। इस वर्ष के अन्त में बिजींग के ग्रेट हॉल आफ पीपुल्स में पोलित ब्यूरो के सभी सदस्य एक साथ उपस्थित होंगे जिससे संसार को यह संदेश जाएगा कि आगामी दस वर्षों तक चीन के शासक कौन होंगे?
लोकतंत्र का दमन
हाल में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता ने विदेशी मीडिया को यह बताया कि चीन में पूरी तरह पारदर्शी लोकतंत्र है। कम्युनिस्ट पार्टी के 2270 डेलीगेट 18वीं पार्टी कांग्रेस के लिये पोलित ब्यूरो की स्टेंडिंग कमेटी का चयन करेंगे। यह पूर्णत: लोकतांत्रिक है और जो डेलीगेट चुन जाएंगे वे साधारण खानों के मजदूर होंगे, कारखानों के मजदूर होंगे, बस ड्राईवर होंगे तथा उन महिला संगठनों के प्रतिनिधि होंगे जो गांव देहात में घूम-घूम कर आम लोगों के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिये प्रयासरत हैं। भारत पर एक तरह से व्यंग्य करते हुए इस प्रवक्ता ने कहा कि हमारे यहां कोई खानदानी विरासत नहीं है। अर्थात् यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का लड़का ही राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बने। यह भी जरूरी नहीं है कि किसी शीर्षस्थ नेता का चुनाव जाति या धर्म के आधार पर हो। चीन में सभी बराबर हैं और सरकार या पार्टी में तरजीह उसी को मिलती है जिसने आम जनता की सेवा की हो।
परन्तु सच इससे कोसों दूर है। चीन में माओ-त्से-तुंग के समय से ही सत्ता संघर्ष चलता रहा है। माओ-त्से-तुंग ने अपने प्रतिद्वन्द्वी देंग को कूड़ेदान में डाल दिया था। परन्तु उनकी मृत्यु के बाद देंग एक अत्यन्त ही शक्तिशाली नेता बनकर उभरे और माओ की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों को पलट कर रख दिया। उन्होंने निजी क्षेत्र में उद्योगपतियों को तो पूरी छूट दे दी कि वे नये-नये उद्योग लगावें। परन्तु जब राजनीतिक मामलों में उदार नीतियों का सवाल आया तब देंग ने आंख दिखाना शुरू कर दिया। उन दिनों संसार के सबसे बड़े साम्यवादी देश सोवियत रूस की आर्थिक हालत बहुत ही खराब हो गई थी। वह इस स्थिति में नहीं था कि वह पूर्वी यूरोप के देशों को आर्थिक मदद दे सके। अत: गोर्बाचोव के नेतृत्व में सोवियत रूस ने ग्लासनोस्त के सिध्दान्त का प्रतिपादन किया। इसका अर्थ था राजनीतिक और आर्थिक उदारीकरण। सोवियत रूस के अन्दर तो उदारीकरण का दौर आया ही, पूर्वी यूरोप के सारे देश जो सोवियत रूस के चंगुल में थे, उन्हें गोर्बाच्योव ने आजाद कर दिया। इन सभी देशों में लोकतंत्र की हवा बहने लगी। इसको देखते हुए चीन में युवकों ने सन् 1989 में टिनामेन चौक पर भारी प्रदर्शन किया और चीन की सरकार से यह मांग की कि चीन में लोकतंत्र की स्थापना हो। देंग किसी भी हालत में यह बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे कि चीन में लोकतंत्र की स्थापना हो। इसलिये उन्होंने प्रदर्शनकारी युवकों पर निर्दयतापूर्वक फौजी टैंक चलवा दिया जिसमें हजारों युवक मारे गये। इस घटना के बाद लोकतंत्र के अधिकतर समर्थक चीन से भाग कर पश्चिम के देशों में चले गये और जो बच गये उन्होंने अपने नाम बदल लिये और वे सुदूर देहात में जाकर छिप गये।
देंग की मृत्यु के बाद भी चीन की पोलित ब्यूरो और केन्द्रीय सरकार ने शासन पर अपना शिकंजा कसना जारी रखा और जिन लोगों ने भी केन्द्रीय साम्यवादी सरकार को थोड़ा भी विरोध किया उसे कोई न कोई बहाना बना कर उनके पद से हटा दिया और अधिकतर ऐसे लोगों का जेल में डाल दिया गया।
1995 में ‘चेन सी टोंग’ जो पोलित ब्यूरो के प्रमुख सदस्य थे और बिजींग में पार्टी के प्रधान थे, उन पर भ्रष्टाचार का झूठा आरोप लगा कर उन्हें पद से हटा कर जेल में डाल दिया गया। उनका कसूर यही था कि वे लोकतंत्र के समर्थक थे। उसी तरह सन् 2006 में ‘चेनलियांग यू’ जो चीन के एक प्रमुख प्रान्त संघाई में पार्टी के प्रधान थे, उनके बारे में जब शीर्षस्थ नेतृत्व को यह पता चला कि वे लोकतंत्र के समर्थक हैं तो कोई बहाना बना कर उन्हें उनके पद से हटा दिया गया और जेल में डाल दिया गया। यह अन्य नेताओं को एक चेतावनी थी कि वे चीन में लोकतंत्र की बात नहीं करें। ये घटनओं केवल यही दर्शीती हैं कि माओ-त्से-तुंग के जमाने से आज ततक चीन में सत्ता संघर्ष होता रहा है। फर्क इतना है कि इस सत्ता संघर्ष की कहानी चीन से बाहर कभी नहीं जा सकती है।
विरोध सभाएं जारी
चीन में लोकतंत्र के समर्थकों को अभी भी सजा दी जा रही है। ‘बो शी लाई’ चीन के एक अत्यन्त ही प्रतिष्ठित शीर्षस्थ नेताओं में से एक थे। वे पोलित ब्यूरो के भी सदस्य थे और देश के दक्षिण पश्चिमी प्रान्त ‘चौगकिंग’ के पार्टी और सरकार के प्रमुथ थे और आशा की जा रही थी कि वे शीघ्र ही देश के उप-प्रधानमंत्री बनेेंगे। परन्तु चीन की सरकार ने उन पर यह आरोप लगाया कि वे चीन की जनता के हित के विरुध्द काम कर रहे हैं। उन्हें उनके पद से हटा दिया गया और यह आशा की जा रही है कि बो को बहुत जल्द जेल में डाल दिया जाएगा। बो को जिस तरह अपमानित कर उनके पद से हटाया गया और जिस तरह कारावास की तलवार उनके ऊपर लटक रही है उससे चीन में दहशत फैल गई है। चीन के प्रधानमंत्री बेन झियाबो ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि बो की तरह की गैर जिम्मेदाराना हरकत सरकार कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। उधर बो की पत्नी के खिलाफ एक ब्रिटिश व्यापारी की हत्या का मुकदमा चल रहा है और ऐसी आशा की जा रही है कि उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिलेगी।
देंग की मृत्यु की बाद पूर्व राष्ट्रपति झियांग और वर्तमान राष्ट्रपति हू जिन्ताओ के बीच सत्ता का भयानक संघर्ष हुआ। हू चाहते थे कि उनके रिटायर होने के बाद उनके चहेते ‘ली के क्विंयाग’ देश के राष्ट्रपति बनें। परन्तु पूर्व राष्ट्रपति झियांग ने पासा पलट दिया। उन्होंने पोलित ब्यूरो के अधिकतर सदस्यों को अपनी ओर मिला लिया। पोलित ब्यूरो में यह निर्णय हुआ कि झियांग के समर्थक ‘शी जिनपींग’ पहले उपराष्ट्रपति बनेंगे और हू के रिटायर होने पर वही देश के राष्ट्रपति और पार्टी के प्रधान होंगे। कहने का अर्थ है कि चीन में पोलित ब्यूरो के सदस्यों का चयन पारदर्शी नहीं है और जो भी नेता लोकतंत्र की मांग करते हैं उन्हें कोई बहाना बना कर सत्ता से हटा दिया जाता है और जेल में डाल दिया जाता है। इस वर्ष के अन्त में जब बोलित ब्यूरो के नये सदस्य बिजींग के ग्रेट हॉल में एक साथ उपस्थित होंगे तब पहली बार सारी दुनिया जानेगी कि आगामी दस वर्षों तक चीन के शासन की बागडोर किन नेताओं के हाथों में रहेगी। जो भी नेता सत्ता में आएं, एक बात तो तय है कि चीन में शीर्षस्थ नेताओं का चुनाव पारदर्शी नहीं है और लोकतंत्र की आहट तो वहां दूर-दूर तक नहीं है।


