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बहस में ‘रांची एक्सप्रेस’ की चर्चा

1980 के दशक की बात है। उस समय ‘रांची एक्सप्रेस’ बिहार की एक पहचान था उस समय मेरा कालेज का जमाना था। सुबह सबेरे ही ‘रांची एक्सप्रेस’ की खोज शुरू हो जाती थी। अखबार की विश्वसनीयता इतनी थी कि हम छात्र नौकरी के विज्ञापन या राजनीतिक बहस में ‘रांची एक्सप्रेस’ का हवाला देते थे। ‘रांची एक्सप्रेस’ की लोकप्रियता देख मैं ‘लोकवाणी’ (संपादक के नाम पत्र) स्तंभ के माध्यम से जनसमस्याओं को रखता था। क्योंकि उस समय पाठकों का सशक्त माध्यम ‘लोकवाणी’ कालम था। ‘रांची एक्सप्रेस’ में प्रकाशित खबरों में अन्य खबरों के अलावा जिले की खबरों को प्रमुखता दी जाती थी। रांची के अलावा आसपास के गांवों की खबरें पढ़ने पर दिली सुकून मिलता था।
एक समय ऐसा भी आया कि उर्दू अखबारों की खबरों और उनके विचारों की पूरी जानकारी हमें ‘उर्दू अखबारों की दुनिया’ कालम से मिलने लगी। शुक्रवार के दिन हमें इस कालम को पढ़ने का बेसब्री से इंतजार रहता था। यह कालम (स्व.) शमीम अहमद द्वारा लिखा जाता था। उस समय ‘रांची एक्सप्रेस’ पढ़कर बहुत संतुष्टि मिलती थी। ‘रांची एक्सप्रेस’ पत्रकारिता की पाठशाला रहा जिसने कई युवाओं को पत्रकार बनाया। यहां पाठकों की मौलिक रचनाओं के प्रकाशन से कई नये लेखक तैयार हुए। आज रांची में अनेक समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं परन्तु आज के अनेक पत्रकारों की प्रथम पाठशाला ‘रांची एक्सप्रेस’ ही थी।
मैं ‘रांची एक्सप्रेस’ की पचासवीं वर्षगांठ पर दुआ करता हूं कि यह अखबार पत्रकारिता जगत में सदा रौशन रहे।

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