भारत बंद, जनाक्रोश व राजनीति
विपक्षी दलों के भारत बंद के आह्वान पर देश भर के लोगों की भागीदारी का एक बड़ा संदेश यह है कि जनमानस मनमोहन सरकार को उसके हाल के कार्यकलापों और निर्णयों के कारण देश के लिए हितकर नहीं मानताहै। डीजल के मूल्यों में वृध्दि, रियायती रसोई गैस में कटौती, देसी खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश तथा कोल ब्लॉक आवंटन में घोटाला जैसे अहम मुद्दे पूरे देश को मथ रहे हैं। इस बेचैनी का ही नतीजा है कि लोग सड़कों पर उमड़ पड़े। बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार से लोग तबाह हैं। रियायती रसोई गैस में कटौती और उसके महंगा होने से गृहिणियां ज्यादा आक्रोशित हैं। तृणमूल कांग्रेस ने तो सत्ताधारी गठबंधन से अपना समर्थन वापस ले ही लिया है, जनाक्रोश के कारण गठबंधन के सहयोगी दल सपा और द्रमुक भी बंद में शामिल हो गये हैं। यह एक विचित्र स्थिति है। बंद के समर्थन में निकली भीड़ द्वारा प्रदर्शित उत्साह में इतिहास के आईने में वर्तमान की आलोचना करने और देश की पूरी व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन के उद्देश्य से कुछ कर गुजरने की ललक देखी गयी, जिसे स्थायी बनाने की जरूरत है। बंद में युवा वर्ग की सबसे अधिक भागीदारी रही। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे युवा, जो बाजार में अपनी कामयाबी के अवसर तलाशने से नहीं चूकते और जीवन को मस्ती से जीने के आदी हो चुके हैं, वास्तव में स्वार्थी नहीं हुए हैं। वे अपने देश तथा समाज में कुछ गलत हो रहा है तो उसके प्रतिकार के लिए सड़कों पर भी उतर सकते हैं। लेकिन प्रश्न है एक दिन के बंद के बाद क्या होगा? क्या देश की राजनीति में इससे कोई अंतर पड़ेगा? सरकार के जो सहयोगी दल बंद के समर्थन में उतरे वे कब तक सरकार को अपना समर्थन प्रदान करते रहेंगे? इस दोहरेपन का तात्पर्य क्या है? आखिर वे क्या प्रदर्शित करना चाहते हैं? सामान्यतः बंद के आयोजन का समर्थन नहीं किया जा सकता। इससे जनजीवन अस्तव्यस्त हो जाता है। सर्वाधिक परेशानी आम आदमी को होती है जिसके हित लाभ के लिए बंद का आह्वान किया जाता है। तो भी किसी संवेदनशील सरकार को जनाक्रोश के इस प्रतीक का गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। हालांकि यह इस पर निर्भर करता है कि सरकार कितनी संवेदनशील है। वस्तुतः केंद्र सरकार एक राजनीतिक खेल खेल रही है। मसलन, उसने कहा है कि कांग्रेस-शासित राज्यों की सरकारें रसोई गैस सिलिंडरों पर सब्सिडी देंगी। प्रश्न है यदि सभी राज्य सरकारें सब्सिडी दे सकती हैं तो केंद्र सरकार क्यों नहीं। राज्य सरकारों की आय के स्रोत बहुत कम हैं। ज्यादातर राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति दयनीय है, जबकि केंद्र सरकार राज्यों के प्राकृतिक व खनिज साधन-स्रोतों वसूले गये शुल्कों और करों से अपना खजाना भरती है। केंद्र सरकार पर कल के बंद का कोई सीधा असर पड़ने वाला नहीं है। उसमें जमीनी हकीकत का सामना करने की कोई सूझबूझ व इच्छाशक्ति नहीं दीखती। लेकिन उसकी छवि में गिरावट साफ नजर आ रही है।


