नैनो कार और टाटा की कसक
लगता है टाटा सन्स और टाटा ग्लोबल बेबरिज के चेयरमैन रतन टाटा के मन से पश्चिम बंगाल में नैनो संयंत्र स्थापित कर पाने में असफल होने की कसक बनी हुई है और यह जब तब उन्हें बेचैन करती रहती है। यही कारण है कि वह शेयर धारकों की बैठक में रतन टाटा का भावुक मन छलक गया और उन्हें कहना पड़ा कि कौन जानता है कि एक दिन टाटा मोटर्स का कारखाना पश्चिम बंगाल में कहीं लगे और हम सब इस कदम का स्वागत करें। रतन टाटा कितने पहुंचे हुए व्यापारी और उद्योगपति हैं, यह सब जानते हैं। उन्होंने अपने प्रबंध कौशल से एक नहीं अनेक प्रतिमान स्थापित किये हैं, लेकिन यह कम लोग ही जानते हैं कि वह अपने कठोर वाह्य व्यापारी आवरण के भीतर भावुकता से भरा दिल भी रखते हैं। नैनो उनकी विभिन्न महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में एक है। आम आदमी को कार सुलभ कराने की इस परियोजना की शुरूआत उन्होंने पश्चिम बंगाल के सिंगुर में की थी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के कठोर रुख और ग्रामीणों के व्यापक प्रतिरोध के कारण टाटा मोटर्स को अपना संयंत्र सिंगुर से हटाकर गुजरात के सांणद ले जाना पड़ा। गुजरात में नैनो का उत्पादन तो शुरू हो गया, लेकिन रतन टाटा के मन में सिंगुर में संयंत्र नहीं लगा पाने का दर्द कभी खत्म नहीं हुआ। इस संदर्भ में उनका यह कथन ‘यह कुछ ऐसी चीजें हैं जिनपर मुझे गुस्सा नहीं आता बल्कि दुःख होता है कि हम सिंगुर में कारखाना नहीं लगा पाये’, उनके सम्पूर्ण मनोभाव का आईना है। रतन टाटा को भरोसा है कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जब पश्चिम बंगाल में दोस्ताना माहौल निर्मित होगा और तब टाटा कम्पनी वहां अपना संयंत्र लगा पायेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वर्षों में रतन टाटा की मनोकामना पूरी होगी और वह अपने मन में चुभी कसक की कील निकाल पायेंगे।


