छोटे पर्दे की सदाबहार यूएसपी
अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए चैनलों ने एक नया तरीका अपना लिया है। सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाओं को नाट्य रूपांतर के साथ प्रस्तुत करना। जहां 2010 तक केवल ‘क्राइम पेट्रोल’ का प्रसारण हो रहा था और न्यूज चैनलों पर अपराध की खबरों को अलग से समय दिया जा रहा था, वहीं आज 2012 में लगभग हर चैनल पर आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए अपराध-आधारित रियलिटी शो मौजूद है।
आज स्थिति यह है कि जब आप रात को खबर सुनने के बाद, तनाव मुक्त होने के लिए किसी मनोरंजन चैनल को ट्यून करते हैं तो आपके होश उड़ जाते हैं, कि उस पर मनोरंजन की बजाए दिखाया जा रहा है कि किस तरह एक आक्रामक टीनएजर ने अपनी मां को चाकू घोंपकर मार दिया। आप फौरन चैनल बदल देते हैं, युवाओं के चैनल को आन करते हैं, हिप-हॉप म्यूजिक सुनने की उम्मीद में, लेकिन वहां भी एंकर इस तथ्य पर बल देता नजर आता है- ‘यह कत्ल/बलात्कार/सेक्सुअल/ उत्पीड़न आपके साथ भी हो सकता है।’
अपराधकथाएं मुख्यधारा में
केवल न्यूज चैनल ही अपराध की घटनाओं को मुख्य खबर नहीं बना रहे हैं। पिछले कुछ माह के दौरान सत्य कथाओं पर आधारित कार्यक्रमों ने मुख्यधारा के मनोरंजन चैनलों के प्राइम टाइम पर भी कब्जा कर लिया है। सोनी के ‘क्राइम पेट्रोल दस्तक’ को बहुत ऊंची टीआरपी मिल रही है। इसी तरह टीएनएज क्राइम पर आधारित चैनल वी के कार्यक्रम ‘गुमराह’ को किशोर व उनके पैरेंट्स बहुतपसंद कर रहे हैं। लाइफ ओके का अपराध-आधारित शो ‘सावधान इंडिया’ को भी दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।
एक समय था जब अपराध से संबंधित खबरें न्यूज चैनलों का क्षेत्र समझी जाती थीं। स्टार न्यूज पर ‘सनसनी’, इंडिया टीवी पर ‘एसीपी अर्जुन’ व आज तक पर ‘वारदात’ को विशेष रूप से पसंद किया जाता था। लेकिन आज अपराध कथाएं न्यूज चैनलों तक सीमित नहीं रही हैं। मुख्यधारा का हर चैनल इन्हें दिखा रहा है।
सवाल यह है कि अचानक अपराध कथाओं में चैनलों व दर्शकों की दिलचस्पी क्यों बढ़ रहे हैं? दरअसल, यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ है। अगर आप प्रिंट मीडिया को देखेंगे तो राजनीतिक, सामाजिक, खेल व महिला पत्रिकाओं से ज्यादा हमेशा ही अपने देश में अपराध से संबंधित पत्रिकाएं बिकती रही हैं। मनोहर कहानियों का एक समय में सर्क्यूलेशन 7 लाख से ऊपर पहुंच गया था, जबकि उसी दौरान ‘इंडिया टुडे’ व ‘माया’ जैसी राजनीतिक पत्रिकाएं 3-4 लाख के आसपास बिकती थीं। आज भी सच्ची कहानियां, नूतन कहानियां, मधुर कथाएं, आदि का सर्क्यूलेशन अच्छा खासा है। इसके अतिरिक्त डिस्कवरी या नेशनल ज्योग्राफिक चैनलों पर जो अपराध से संबंधित डाक्यूमेंट्री प्रसारित की जाती थी उन्हें भी दर्शक विशेषरूप से देखा करते थे। इस आधार पर यह कहना गलत न होगा कि अपने देश के मनोरंजन चैनलों ने अपराध कथाओं पर आधारित कार्यक्रमों की क्षमता को देर से पहचाना है।
बहरहाल, इस कड़ी प्रतिस्पर्धा के दौर में हर कोई जल्दी से अमीर बनना चाहता है और लोगों में बर्दाश्त का जज्बा भी कम हुआ है, इसलिए अपराध घटनाओं में निरंतर वृध्दि होती जा रही है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर अपराध क्यों बढ़ रहे हैं और उनसे किस तरह बचा जा सकता है? इसलिए इन पहलुओं को छूता हुआ जो भी कार्यक्रम आयेगा उसकी अपील काल्पनिक कार्यक्रमों से अधिक होगी।
सच्ची घटनाओं पर आधारित अपराध कार्यक्रमों में लोगों की दिलचस्पी इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि इन कार्यक्रमों में दर्शकों को यह भी बताया जाता है कि वह अपनी बेटियों, बहनों, परिवार के सदस्यों आदि को किस तरह सुरक्षित रख सकते हैं। इस तरह दर्शकों को एक बुनियादी सुझाव मिल जाता है हत्यारे/बलात्कारी को पहचानने के लिए।
हालांकि यह कार्यक्रम सच्ची घटनाओं पर आधारित होते हैं, लेकिन अक्सर इनमें घटना से संबंधित लोगों व स्थानों के नाम बदल दिए जाते हैं। लेकिन जहां निर्माताओं को पीड़ित परिवारों के सदस्यों से बात करने का अवसर मिल जाता है तो उनके दृष्टिकोण को भी पेश कर दिया जाता है। इन कार्यक्रमों का ज्यादा जोर इस बात होता है कि अगर पीड़ित या परिवार प्रारंभिक लक्षणों पर ध्यान देते तो अपराध को घटित होने से रोका जाना संभव था।
दिल दहला देनेवाली घटनाएं
लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अधिकतर चैनल दिल को दहला देने वाले उन मामलों को फिल्माते हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे और अब तक दर्शकों की यादों में ताजा है। मसलन, 2004 के डीपीएस एमएमएस स्कैंडल, प्रियदर्शिनी मट्टू मामला, नीरज ग्रोवर हत्याकांड, बेबी फलक मामला आदि को लगभग सभी चैनलों में दिखाया है। लगता यह है कि सभी चैनल एक सी योजना अपनाए हुए हैं। इसलिए यह कहना कठिन है कि किस चैनल पर अपराध कार्यक्रम सबसे अच्छा आ रहा है। चैनलों की कुछ समान रणनीति इस प्रकार से है-
- सच्ची कथाओं पर आधारित कार्यक्रम को प्रसारण के लिए महत्वपूर्ण समय दिया गया है।
- उस घटना या अपराध को प्राथमिकता दी जाती है जिसने अखबारों में सुर्खियों बटोरी हों और जो जनता की यादों में ताजा हो।
- कार्यक्रम का एक पुरुष एंकर होता है, जिसके चेहरे पर गंभीरता बिखरी होती है। वह स्क्रीन के सामने खड़ा होकर सावधान (बल्कि डराता) करता है कि आप शिकार होने से बचें।
- सत्यकथा का नाट्य रूपांतर ऐसे कलाकारों के सहारे किया जाता है जिनको पहचानना कठिन है या जो कम चर्चित हैं।
- कार्यक्रम में नाटकपन अधिक होता है।
- पृष्ठभूमि में संगीत बॉलीवुड फिल्मों जैसा होता है।
- इन सभी कार्यक्रमों की एक खास बात यह है कि अब तक इनमेंक सी सुंदर महिला एंकर को नहीं लिया गया है।


