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‘हो’ जनजाति के जांबाज शहीदों की प्रेरक यादें

जो समाज अपने पुरखों को, उनका यश:कीर्ति को भूल जाता है उसे लोग भूल जाते हैं। यह अच्छी बात है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ आदिवास समुदाय में अपने बहादुर पुरखों की स्मृति को जुगाने की सक्रियता दिख रही है।

डा. दमयंती सिंकू ने अपने हो समाज के ज्ञात-अज्ञात शहीदों की याद को 32 आलेखों का संकलन-संपादन, और आवश्यक हुआ तो लेखन, कर सिंहभूम के शहीद लड़ाका हो, के माध्यम से जुगाने का प्रयास श्लाध्य प्रयास किया है। मेरे देखे ऐसी किताबों की रचना के तीन कीम होते हैं। एक तो यह कि झारखंड का इतिहास लिखनेवालों (जो अबतक कायदे से लिखा नहीं गया) के लिए आधार सामग्री उपलब्ध कराना दूसरा अपने समाज के गौरव-बोध को बल देना कि यहां ऐसे-ऐसे जांबाज हुए जिन्होंने अपनी माय-माटी की प्रतिष्ठा की रक्षा और शोषण के प्रतिकार के लिए जान की बाजी लगा दी। तीसरा काम यह कि इतर समुदाय के लोगों की जानकारी में यह बात लाई जाए कि इस वन्य प्रदेश के सपूतों ने अपनी जान हथेली पर रखकर बाहरी और घर के दुश्मनों से सदैव लोहा लिया है। इस तीसरे काम के लिए आलेखों की भाषा-शुध्दता पर थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है अन्यथा हमारी वह छवि नहीं बन जाएगी जो हमारा प्राप्य है।

संपादिका/लेखिका ने अपनी आंखें खुली रखी हैं और अखबारों, पत्रिकारों में प्रकाशित छोटी से छोटी सामग्री का उपयोग किया है, मसलन सांध्य अखबार ‘झारखंड न्यूज लाइन’, ‘प्रभात खबर’ ‘झारखंड एक्सप्रेस’, ‘देशज अधिकार’, ‘हिन्दुस्तान’ एवं अन्य दैनिकों से सामग्री जुटाने के अलावा रांची विश्वविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों के लघु शोध-आलेखों का उपयोग किया गया है और कई आलेख जनजातीय समाज के वरिष्ठ-विशिष्ट जनों से लिखाए हैं। ‘पुस्तक-परिचय’ का यह दावा सही है कि यह किताब सिंहभूम के स्वतंत्रता-सेनानियों/शहीदों के संदर्भ में हमें जानकारी उपलब्ध कराती है और झारखंड के युवाओं, शोधार्थियों, जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। ‘खरसावां गोली कांड’ पर राग मागे में रचित हो भाषा का एक गीत इस पुस्तक का आकर्षण बढ़ाता है।

सोबोन मुण्डा (सरदार), सेगा मुण्ड के बेटे बागुन पलटोन, छात्र-आंदोलन की उपज विजय सिंह सोय, माधो और अच्छी के बड़े बेटे मांडो बागे (सरदार), जोरों जितिकारगंगाराम जिनकी शहादत की कीमत उनकी इकलौटी बेटी को चतुर्थवर्गीय पद देकर लगाई गई), नारायण नोंको, पोटो नारा और बड़ाय की शहादत, घासी सिंह (कोल विद्रोह), रितुई गोन्डाई की रक्षा के लिए शहादत, कलिया नगर के 12 शहीद, डोमिसाइल का संदर्भ, कोल विद्रोह, सेरेंगसिया घाटी की व्यथा-कथा, खरसावां गोलीकांड की वेदना (दशरथ मांझी और साधुचरण विष्या की कथा), गुवा गोलीकांड इस शहीद), सुवर्णरेखा के शहीद गंगाराम कालुंगिया, जंगल के ठेकेदारों से लोहा लेने के क्रम में प्राण निछावर करनेवाले महुआ गागराई, दिऊं कोड़ा की मृत्यु का सच, पूर्व सैनिक बीदर नाग, सेरेंगरा गोलीकाण्ड, राधे सुम्बरूई, जंगाल आंदोलन के नायक देवेन्द्र मांझी, निर्मल महतो की शहादत धरती आबा की शौर्यगाथा, राजा अर्जुन सिंह, मंगल होनहाया और सांमा गुड़िया- ये सारी जाने और अनजाने वीरों की गाथाएं पुरखों को तर्पण भी हैं और इतिहासकारों के लिए खाद-पानी भी। अंत में स्वशासनके लिए झारखंड संघर्ष का तिथिक्रम भी उपस्थित किया गया है।

दुहराता हूं, ऐसी किताबें झारखंड के लेखन में सहायक होंगी और इन प्रसंगों को पढ़ता उद्वेलित तथा रोमांचित करता है। लेकिन पुस्तक के रूप में सामग्रियां उपलब्ध कराते समय थोड़ी भाषाई शुध्दता का ध्यान तो रखना ही चाहिए।

 

प सिंहभूम के शहीद लड़ाका ‘हो’, प दमयन्ती सिंकू, प के.के. पब्लिकेशंस, ह्रास, कटरा, इलाहाबाद- 02, प मूल्य, सामान्य रू. 100ृ00, पुस्तकालय संस्करण-रु. 150ृ00, प संस्करण- 2011 (पेपरबैक, डिमाई, 116 पृष्ठ)

- अशोक प्रियदर्शी

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