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Home » Jharkhand » 9 February 2010 »

न खाने का ठिकाना, न पानी और आवास का

भारत वर्ष को आजाद हुए लगभग 63 वर्ष बीत गए। कई पार्टियों की सरकारें बदलीं, नेता मंत्री बदले, लेकिन पांकी प्रखंड अंतर्गत पंचायत केकरगढ़ गांव जोतांग के तितही टोला में लोगों की तकदीर व तस्वीर नहीं बदली। सिर्फ बदली तो नेताओं और मंत्रियों की, जो आज खाकपति थे कल खरबपति हो गए। इस टोले के लोगों को शुध्द भोजन तो क्या मुप्त में मिलने वाला शुध्द पानी भी नसीब नहीं है। आज भी इस टोले के लोग नदी- नाले व अंग्रेजों के जमाने के एक खंडहरनुमा कुएं का पानी पीने के लिए मजबूर हैं। इनका मुख्य भोजन कंदा गेठी है, जिसे लोग जंगलों से कोड़कर फिर उसे काटते हैं और उबालने के बाद नमक मिलाकर खाते हैं।
यह व्यथा है पांकी प्रखंड मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर जंगलों और पहाड़ों के बीच बसे हुए तीतही टोले की। इस टोले में यादव व हरिजन परिवार के लोग बसते हैं। इस टोले की आबादी लगभग चार- पांच सौ के करीब है। यहां के लोग भगवान भरोसे अपना जीवन बसर करते हैं। ना खाने के लिए स्वच्छ भोजन न पीने के लिए शुध्द पानी इनको नसीब है। अधिकतर लोग कंदा गेठी खाकर ही अपना समय व्यतीत करते हैं। आम सुविधाओं से दूर यहां के लोग आज भी पगडंडी के सहारे अपना सफर तय कर टोला तक पहुंचते हैं। इसी टोले के रहने वाले साठ वर्षीय युगेश्वर भुईयां, सुधन यादव, फूलवा देवी, सोमतीया देवी, बुधराम भुईयां, नागेश्वर भुईयां आदि लोगों ने संवाददाताओं को बताया कि हमलोग को रहने के लिए सरकार द्वारा न इंदिरा आवास मिला है और ना ही पानी पीने के लिए चापाकल। हमलोग नाला और अर्ध्दध्वस्त कुएं का गंदा पानी पीते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि इक्का- दुक्का लोगों को लालकार्ड मिला है किन्तु डीलर समय पर कभी राशन नहीं देता है। इन लोगों को राशन और किरासन के लिए 15 किलोमीटर की दूरी तय कर पांकी आना पड़ता है। क्योंकि गांव में कोई डीलर है नहीं। काफी मशक्कत के बाद अगर राशन मिला भी तो सरकार द्वारा निर्धारित मात्रा से काफी कम। यहां के बच्चे सुबह से शाम तक बकरी व भैंस लेकर जंगलों की खाक छानते फिरते हैं।

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