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अल्सर : खाली पेट रहना खतरनाक

जब पेट के अंदर स्थित आमाशय के अंदर की दीवार में घाव बन जाता है, तो उसे पेप्टिक अलसर कहा जाता है। और जब यही घाव अग्रणी के अंदर की दीवार में बन जाता है, तो उसे ड्यूडीनल अल्सर कहा जाता है। जब आमाशय एवं अग्रणी दोनों में एक ही साथ घाव बन जाते हैं तब उसे गेस्टो ड्यूडीनल अल्सर कहा जाता है। आज के समय में अल्सर एक आम रोग बन गया है। पेप्टिक अल्सर की तुलना में लोगों में ड्यूडीनल अल्सर 4 से 6 गुण अधिक देखने को मिलता है। पेप्टिक अल्सर प्रायः प्रीढ़ व्यक्तियों में ही पाया जाता है जबकि डयूडीनल अल्सर युवा पीढ़ी में अधिक मिलता है। पेप्टिक अल्सर क्यों होता है, इसका मुख्य कारण अभी तक ठीक-ठाक पता नहीं लग सका है लेकिन रोग की उत्पति में प्रमुख भूमिका आमाशय में उत्पन्न अम्ल की सक्रियता पर अवश्य ही निर्भर करती है। ऐसा माना जाता है कि यह गुण किसी विष के प्रभाव से होता है। इस विष के असर से आमाशय तथा ग्रहणी के श्लैष्मिक कला में आघात होता है। इस आघात युक्त स्थान पर ‘पेप्टिन’ नामक एंजाइम जो आमाशय में निकलता है, द्वारा श्लैष्मिक कला का पाचन होने लगता है और घाव बन जाता है। पेप्टिन के कारण उत्पन्न होने से इसे पेप्टिक अल्सर कहा जाता है। अल्सर की उत्पति का कुछ न कुछ संबंध आनुवांशिक भी होता है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाइयों एस्प्रिन, एनलजीन, डाइक्लोफेनिक, फिनाइल पूराजोक, एण्डोमेथासिन के निरंतर सेवन से भी अल्सर हो सकता है। आपरेशन या चोट आदि से अनेक रोगाणुओं के संक्रमण से रक्त विकार, अमाशय से पेस्टि्रन नामक हार्मोन का अत्यधिक स्राव, कुछ अन्य ग्रंथियों का स्राव बढ़ या घट जाना अत्याधिक चिंता, मानसिक तनाव बेचैनी, अवसाद आदि पेप्टिक एवं ड्यूडीनल अल्सर को उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।
आमाशय के खाली रहने पर जलन के साथ पेट में दर्द रहना तथा कुछ खाना खाने के बाद दर्द में आराम मिलना, इसके लक्षणों में आता है। अगर अल्सर आमाशय में है तो खाना खाने के आधे घंटे के बाद दर्द शुरू हो जाता है। जब अल्सर ग्रहणी में होता है तो दर्द खाना-खाने के तीन-चार घंटे बाद शुरू होता है। तेज भूख लगना, दर्द के बाद वमन(उल्टी) होना, दर्द एक निश्चित स्थान पर होना, अधिकांशतः मध्यरात्रि में दर्द होना आदि इसके मुख्य लक्षण होते है। इसके अलावा पेप्टिक अल्सर में दर्द पेट के ऊपरी भाग में बाई तरफ होता है। यह दर्द एक निश्चित स्थान पर होता है। ड्यूडीनल अल्सर का दर्द पेट के ऊपरी भाग के बायीं तरफ होता है। सेक्स, चिंता, अधिक काम, तनाव तथा मौसम के प्रभाव से दर्द बढ़ जाता है। आधुनिक चिकित्सा के अतिरिक्त इसका आयुर्वेदिक उपचार भी है जो इससे मुक्त कराता है। छोटी पीपर, निकोध एवं हरड़ के छात्र का चूर्ण बराबर-बराबर मात्रा में लेकर एक-एक चम्मच सुबह शाम लेते रहने से अल्सर में लाभ होती है। छोटी इलायची, तेजपता, दालचीनी, वंशलोचन, छोटी हरड, छोटी पीपल, हरड़, धनिया, आंवला, सफेद चंदन एवं गुलाब की सूखी पंखुडियां बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बनाकर, इसमें मिश्री मिलाकर एक-एक चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ लेने से लाभ होता है। अल्सर के रोगी को गाया का या बकरी का दूध मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। नींबू-पानी एवं सोड़ा रोज ेलेना चाहिए। खाली पेट बिल्कुल न रह कर थोड़ी थोड़ी देर पर हल्का एवं सुपाचय भोजन लेते रहना चाहिए। हरी सब्जियां, खिचड़ी, दलिया आदि का तरल आहार लेते रहना चाहिए। गाजर, लौकी, तुरई, कद्दू, सहिजन, परमल, पेठा, बथुआ आदि का प्रयोग हितकर होता है।
मूंग तथा मसूर की दाल अल्सर के रोगी के लिए सर्वोंत्तम मानी जाती है। मांस, अण्डा, शराब, तंबाकू, गुटका, चावल, चाय, उड़द, अरहर, ठंडा एवं बासी भोजन से रोगी को परहेज करना चाहिए।

 

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