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सरकारी उपेक्षा से मर्माहत है वर्ल्ड रिकॉर्डधारी

पांच सितम्बर, 2004 को बोकारो स्थित संत जेवियर्स स्कूल के कला शिक्षक मोहन आजाद ने इस आस के साथ महज 11 घंटे में दुनिया की सबसे लम्बी पेंटिंग (101 गुना 4 मीटर) बनाकर पूरे विश्व में एक कीर्तिमान स्थापित किया कि इससे उनके शहर व राष्ट्र का नाम गौरवान्वित होगा और अपने लोग उन्हें शाबाशी देंगे। परंतु स्थिति आज पूरी तरह से विपरीत है। ‘लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में उक्त उपलब्धि के लिये नामांकित श्री आजाद को अब ‘गिनीज बुक’ में जगह मिलने वाली है। उन्होंने इसके लिये हाल ही में अपना साक्षात्कार दिया है। इन सबके बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि आज तक अपने लोगों यानि कि स्थानीय प्रशासन, राज्य सरकार और न ही झारखंड सरकार ने उनकी सुध ली। उन्हें केवल कोरे आश्वासन ही मिलते आ रहे हैं। घोर आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे यह वर्ल्ड रिकॉर्डधारी आज सरकारी उपेक्षा से मर्माहत हैं।
‘रांची एक्सप्रेस’ से आज विशेष वार्ता के क्रम में श्री आजाद ने रुंधे गले और नम आंखों से कहा कि ‘सरकार मुझे या तो सम्मानस्वरूप आर्थिक सहायता दे अन्यथा इच्छामृत्यु की इजाजत दे। इतना कुछ करने के बाद भी जब अपने ही अपने नहीं रहेंगे, तो लाचारी भरी ऐसी जिंदगी का क्या फायदा? शायद मुझे मेरी गरीबी व ईमानदारी तथा पैरवी के अभाव के कारण ही अबतक उपेक्षित किया गया है।’ उल्लेखनीय है कि 54 वर्षीय श्री आजाद ने अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई और बैंक से लिये ऋण की राशि उक्त पेंटिंग बनाने में लगा दी थी। इसमें लगभग आठ लाख रुपये का खर्च उन्हें हुआ था। परंतु अब उन्हें दो वक्त की रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिल पा रही है और वह भिक्षाटन के लिए विवश हैं। उन्होंने प्रत्येक देशवासी से महज एक रुपये की वित्तीय सहायता की गुहार लगाते हुए अपना खाता संख्या (2430110010983, यूको बैंक, सिटी सेन्टर, बोकारो) भी जारी किया है।
मालूम हो कि स्थानीय संत जेवियर्स स्कूल में उन्होेंने बतौर वरीय शिक्षक 20 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं, जिसका 60- 70 प्रतिशत बैंक ऋण चुकाने में खर्च हो जाता है और शेष राशि से बमुश्किल उनका गुजर- बसर हो रहा है। श्री आजाद के परिवार में उनके अलावा उनकी पत्नी, 12वीं कक्षा मेें अध्ययनरत एक पुत्र, गोद ली गयी एक बच्ची और बीमार मां हैं। सम्मानस्वरूप आर्थिक मदद की उम्मीद लिये उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, गृहमंत्री, झारखंड सरकार सहित कई लोगों के दरवाजे खटखटाये, लेकिन आजतक उन्हें खोखले आश्वासन ही मिले हैं। उनके पत्र के आलोक में प्रधानमंत्री कार्यालय के पत्रांक 2.3. 2009/ पीएमपी3/ 704, दिनांक 23.07.09 के तहत सेक्शन आफिसर एम के जायसवाल ने झारखंड के मुख्य सचिव को यथाशीघ्र कार्रवाई के लिए लिखा था, लेकिन आज तक इसमें कुछ भी नहीं हो सका है।
श्री आजाद ने इस बारे में जब एक वरीय विभागीय अधिकारी से बात की, तो उन्हें स्पष्ट कहा गया कि उनके पास इस प्रकार के सम्मान का कोई प्रावधान नहीं है, फिर भी वह कोशिश करेंगे। बोकारो के उपायुक्त सतेन्द्र सिंह ने भी राज्य के कला, संस्कृति एवं खेलकूद विभाग के निदेशक के पास श्री आजाद को वित्तीय सहायता देने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन इसमें भी अबतक की कार्रवाई बिल्कुल शून्य है। यही नहीं, श्री आजाद मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के पास तीन- चार बार गये, लेकिन उन्हें गुरुजी का दीदार तक नहीं करने दिया गया। मालूम हो कि श्री आजाद ने श्री सोरेन की पोतियों को पढ़ाया भी है। श्री सोरेन का रवैया देखकर वह काफी व्यथित हैं। उन्होंने कहा कि सीएम बनने के बाद गुरुजी पूरी तरह बदल गये, मैं उनकी ‘महानता’ की दाद देता हूं।
14 अगस्त, 2009 को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष आलमगीर आलम ने श्री आजाद को सम्मानित जरूर किया था, लेकिन उन्हें एक पैसे की वित्तीय सहायता नहीं दी गयी थी।

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