सफलता का आधार प्राथमिक शिक्षा
भारत प्राचीनकाल से ही शिक्षा के क्षेत्र में धनी रहा है। बनारस से लेकर नालंदा तक और तक्षशिला से नागार्जुन कोंडा तक भारत में ज्ञान का प्रचार-प्रसार होता रहा है। भारत में प्राचीन काल और मध्यकालीन युग में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा की अमिट छाप देखने को मिलती है। देश में फिरंगियों के आगमन के साथ शिक्षा के क्षेत्र में भारी बदलाव का दौर आया, जिसके अन्तर्गत भारत में आए मिशनरियों द्वारा विभिन्न स्थानों पर स्कूल और कॉलेज खुलवाए जाने लगे।
गौरतलब है कि आजादी के बाद देश में बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया। इसी के साथ देश में शिक्षा जगत में नया सवेरा हुआ और शिक्षा के क्षेत्र ने नये आयाम कायम किए। दक्षिण में खासतौर पर केरल में शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई, जिसकी बदौलत आज केरल को पूर्ण साक्षर राज्य का दर्जा प्राप्त है। उत्तर भारत की बात करें, तो शिक्षा के क्षेत्र में विकास की चाल यहां अपेक्षाकृत धीमी रही है। आज यहां भारत सरकार द्वारा स्थापित स्कूलों के अलावा आर्मी स्कूल, कॉन्वेंट, पब्लिक स्कूल और तमाम निजी स्कूल्स भी हैं। देश में भारी तादाद में गुरुकुल की तर्ज पर आवासीय स्कूलों का भी चलन है, जो निस्संदेह स्टूडेंट्स के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं। अपने पूर्व छात्रों के माध्यम से अपनी छवि सुधारने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का अर्थ केवल शब्द मात्र से नहीं है, बल्कि यहां छात्र के व्यक्तित्व और उसकी छवि को आदर्श रूप में उकेरा जाता है। यहां छात्रों के आचार-व्यवहार और तौर-तरीकों को इस प्रकार निखारा जाता है कि उनके व्यक्तित्व, सोच और भाव में परिपक्वता झलकती है।
बीते कुछ सालों में उत्तर भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति की है। आज यहां बेहतर स्कूलिंग के लिए तमाम विकल्प मौजूद हैं। अभिभावकों को रिझाने की दौड़ में तमाम स्कूल एक से बढ़कर एक सुविधाएं जुटा रहे हैं। हालांकि इन स्कूलों में पढ़ाने के तौर-तरीकों में खासी खामियां भी उजागर हुई हैं, लेकिन इनके महत्व से भी इनकार नहीं किया जा सकता। कॉन्वेंट स्कूलों में अधिकतर आईसीएसई और आईएससी बोर्ड आधारित पाठ्यक्रम हैं, जबकि निजी स्कूलों में प्रमुखता से सीबीएसई बोर्ड के तहत पढ़ाई कराई जाती है।
निजी बनाम कॉन्वेंट की जंग को जरा और आगे ले जाएं, तो पता चलता है कि अधिकांश कॉन्वेंट स्कूलों में को-एजुकेशन नहीं है जबकि निजी स्कूल लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग ब्रांचें भी खोल रहे हैं। रिहायशी स्कूलों की मांग में इजाफे के साथ बोर्डिंग स्कूलों के प्रचलन में कमी दर्ज हुई है। इसमें कोई शक नहीं है कि उत्कृष्टता को आसानी से हर कोई हासिल नहीं कर सकता, लेकिन कोशिश की जाए तो हर कोई उत्कृष्टता के क्षेत्र में नए आयाम कायम कर सकता है (क्लास उतने ही छात्रों से भरी हो, जिसे शिक्षक कंट्रोल कर सके)। उत्कृष्टता के पैमाने पर कुछ स्कूलों के पास बेहतर बुनियादी सुविधाएं हैं, तो कुछ अन्य स्कूल लग्जरी सुविधाएं मुहैया करवाने पर रौब गालिब करते हैं।
प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भले ही पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर ने पिछले कुछ दशकों में काफी विकास किया है। विशेषकर उत्तर भारत के पहाड़ी इलाके क्वॉलिटी एजुकेशन का हब बन गए हैं। इनमे देहरादून (कॉन्वेंट आफ जीजस एंड मैरी, द आरआईएमसी व कई अन्य) व नैनीताल (शेरवूड, सेंट जॉसेफ और आल सेंट्स) अभिभावकों की पहली पसंद होते हैं। यहां अधिकतर रिहायशी स्कूल हैं। हापुड़, बुलंदशहर, इलाहाबाद, कानपुर, मुरादाबाद, बरेली, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, रूद्रपुर, काशीपुर, हरियाणा और जम्मू के कस्बों और गांवों के अलावा दिल्ली में फैले रिहायशी स्कूल शिक्षा के प्रचार-प्रसार के माध्यम से छात्रों के विकास में जुटे हैं।


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