रांची के रीयल एस्टेट को चाहिये कनेक्टिविटी
यल एस्टेट को हाट करने में कनेक्टिविटी सबसे बड़ा फैक्टर है। इसी पर इस सेक्टर की ग्रोथ निर्भर है। महानगरों के रीयल एस्टेट ने कनेक्टिविटी के सहयोग से भारी कामयाबी हासिल की है। बदकिस्मति से रांची में कनेक्टिविटी का भारी अभाव है। जो रफ्तार इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की होनी चाहिय थी, वह नहीं है। कनेक्टिविटी यानी लम्बी और चौड़ी सड़के, जो शहर के सर्किल को तो घेरे ही, आसपास के उपनगरीय क्षेत्रों में पहुंच को भी आसान बनाये। बड़े तामझाम के साथ 83 किलोमीटर सर्किल के रिंग रोड की घोषणा हुई। अगर रिंग रोड निर्धारित अवधि में पूरा होता तो आज रांची के रीयल एस्टेट सेक्टर की तस्वीर कुछ और होती। रांची भी अन्य राज्यों की राजधानियों के मुकाबले अपने विस्तार और अपनी खूबसूरती पर इठलाती। सरकार में इच्छा शक्ति का अभाव, नौकरशाही की उदासिनता, लोगों में सहन करने की आदत ने मिलकर रांची के विस्तार और विकास के सामने बेरियर लगा दिया।
दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बेंगलूर, सूरत, चेन्नई, कोलकाता, जयपुर, गुड़गांव, गाजियाबाद, फरीदाबाद, ग्रेटर नोएडा, मेरठ, राजनगर के विस्तार को पूरा देश देख रहा है। ऐसे शहर जहां कम समय में पहुंचा जा सकता है, वहां डेवलपर सबसे पहले पहुंचते हैं। इनके पीछे बायर्स और साथ देते हैं फायनांसर्स। यानी सबकी अंडरस्टैंडिंग है। दिल्ली का फैलाव बार्डर से सटे इलाकों से शुरू हुआ। मसलन गाजियाबाद का कौशांबी और हरियाणा के गुड़गांव तथा फरीदाबाद। अब तो अच्छी कनेक्टिविटी के कारण हापुड़ सोनीपत मेरठ तक रीयल स्टेट पहुंच गया है। राजनगर एक्सटेंशन (एनएच58) पर 16 बिल्डर्स गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के साथ मिलकर इस इलाके को गुलजार कर रहे हैं। एनसीआर का इलाका नये ग्राहकों की पसंद बन गया है। दूसरी तरफ 164 कि.मी. लम्बे ताज एकप्रेस वे, जो 2013 तक पूरा होना है, इसके किनारे प्राइवेट बिल्डर्स एवं डेवलपर्स बड़े-बड़े प्रोजेक्टस ला रहे हैं।
रांची में कनेक्टिविटी की बात फिलवक्त करना बेमानी होगी, क्योंकि सरकारी कार्य संस्कृति में कोई चमत्कार नहीं होने वाला है। वैसे भी चमत्कार होते नहीं, किये जाते हैं। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और जिम्मेदारी के प्रति समर्पण से ही चमत्कार यानी बदलाव यानी विकास होगा। झारखंड की सरकार और उसके नौकरशाह देश-विदेश भ्रमण कर विकास देखने जाते हैं, वापस आते ही सब भूल भी जाते हैं। आरआरडीए और रांची नगर निगम की चक्की में रीयल एस्टेट पीस रहा है। मल्टीस्टोरी और रेसिडेंशियल कालोनी की बात तो छोड़िये, एक आम आदमी अपने लिये दो-तीन कमरों के मकान का नक्शा भी पास नहीं करा पा रहा है।


The development of ranchi is nil only due to politician,because first they make own fund.aur agar kabhi inhe fursat mili to do-char logon ko kambal baant di,ek time ke bhojan ke naam par raily nikal di,koi imandar afsar agar kahi accha kaam kar raha hai to uska transfer kar diya,ye to haal hai jharkhan aur uski rajdhani ranchi ka.janta bhi udasin ho gayee hai,naa koi ummeed na koi aash,kare to kya kare,yahan to abhi kha liya ab kal ki sochna hai- ka hisab-kitab hai,neta apni rishtedari nibhate hain, falana tender falane ko hi milni chahiye,chahe khoon hi kyun na karni pare,jiski tiski zameen kabza kar li,ho gayee balle-balle,bhai aam admi kya kar sakta?udyogpati aana nahi chahte hain yahan ke rangdari aur ku-sashan ki vayavastha dekh kar.is shahar ko aag lagi ghar ke chiraagh se…..
bhai hamari apni ray hai ki is state ko agar tarakki ki raah par lana hai to band karo yeh loot-khasot,aur logon ke andar koi umang paida karo taki woh bhi kuchh mehnat kar sake,is shahar ki tarakki ke liye,woh bhi kuchh yogdan kar sake.kya kuchh nahi hai hamare is state mein, bus sahi planning aur sahi implimentation ki zaroorat hai, achha bhai waqt ki kami ke wajah se cont nahi kar raha hoon.saar-soyee hui janta ko jagana hoga bas……
3 May 2010 at 14:57