पहले समझ लें होम लोन की प्रक्रिया
आजकल लोग छोटे के बजाय बड़े घरों में इनवेस्ट करने लगे हैं। भले ही इन्हें खरीदना उनके बजट के लिहाज से काफी भारी पड़ता हो, लेकिन फिर भी इसका चलन बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण है इन घरों में किसी रिसोर्ट जैसी सुविधाओं का होना और इनकी कीमत का आसमान छूना। ये और बात है कि ऐसे फ्लैट्स भी बनने से पहले ही बिक जाते हैं।
इन दिनों सपनों का सुंदर घर या कहें कि ड्रीम हाउस को लेकर यूथ कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट दिखा रहे हैं। घर खरीदने वाले परमानेंट नौकरी और अच्छी सैलरी पाने वाले लोग हैं, जो होम लोन की अदायगी में कोताही नहीं बरतते। इन्हीं लोगों को होम लोन भी आसानी से मिल जाता है। सैलरी को टैक्स के कुंए में डालने से बेहतर है कि उसे घर बनाने में इनवेस्ट किया जाय। हमारे देश का एक आम आदमी या फिर एनआरआई अथवा भारतीय मूल का कोई नागरिक भी होम लोन के लिये आवेदन कर सकता है। बशर्ते कि वे 21 साल की उम्र पूरी कर चुके हों और लोन को लौटाने के मामले में यानी लोन की मैच्योरिटी तक 65 साल या उससे छोटी उम्र के हों।
ज्यादातर होम लोन कंपनियां भी भारत के किसी भी क्षेत्र में स्थित प्रापर्टी के लिये लोन देने की इच्छुक रहती हैं। खासतौर से उन लोगों को जो बिजनेस करते हों या किसी नौकरी में हों। कहने का मतलब यह है कि लोन लेने वालों के पास लोन की मासिक किश्त अदायगी का इंतजाम हो। लोन लेने की शुरुआत होम लोन की ऐप्लिकेशन से होती है। कंपनियां इन ऐप्लिकेशंस की छंटनी करती हैं। इसके बाद होम लोन अप्लाई करने वाले कैडिडेट से इंटरव्यू के दौरान यह पता लगाने की कोशिश करती हैं कि संबंधित व्यक्ति लोन की काबिलियत रखता भी है या नहीं। अगर आप उन खुशकिस्मत लोगों में से एक हैं, जिनको लोन मिल रहा है, तो समझ लीजिए कि आपके घर बनाने के सपने को साकार करने की शुरुआत तो हो गयी।
आप सोच रहे होंगे कि लोन देने वाली कंपनियां आपसे कैसे कमाएंगी? आपसे वो किश्त तो लेंगी ही, लेकिन इससे पहले आप जितनी राशि का लोन ले रहे हैं, उसके लिये प्रोसेसिंग फीस भी लेती हैं। यह राशि नॉन रिफंडेबल फीस के रूप में ली जाती है। अब बारी आती है आपकी एलिजिबिलिटी और कंपनी की तरफ से होने वाली जांच की। इसका आधार होगा आनकी इनकम, फाइनेंशल स्टेटस, आपके बैंक बैलेंस और आपके द्वारा दिये गये डाक्युमेंट्स का वेरिफिकेशन। आजकल कंपनियां उस प्रॉपर्टी को भी वेरिफाई करती हैं, जिसके लिये आवेदन किया गया है। यही नहीं, प्रापर्टी के वेरिफिकेशन और वैल्यूएशन के लीगल डाक्युमेंट्स बैंक ही तैयार करते हैं।
दरअसल, लोन लेने के लिये कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। कुछ नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट देने होते हैं, जिसके लिये कई आफिसों के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं। किसी भी कंपनी के लिये लोन देना रिस्की काम होता है। धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के कारण बैंक व अन्य फाइनेंस कंपनियां ज्यादा सतर्कता से काम लेने लगी हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि तिना लोन आप चाह रहे हैं, उतना आपको मिल ही जाय।
लोन देने के लिये धन की सीमा बैंक तय करते हैं। बैंक इसके लिये लोन लेने वाले व्यक्ति की लोन चुकाने की सीमा, उसकी उम्र, एजुकेशन क्वालिफिकेशन, इनकम की स्टेबिलिटी और कंटीन्यूटी, उसकी एसेट्स, देनदारियां, बचत और उस पर निर्भर आश्रितों की संख्या आदि को आधार बनाते हैं।
आजकल बैंक लोन अप्लाई करने वालों के लिए फास्ट प्रोसेस अपनाने लगे हैं। कुछ मामलों में तो कंपनियों एजेंट्स से लोन अप्लाई करने वालों के घर जाकर पूछताछ करवाती हैं। एक हफ्ते या 15 दिनों के अंदर लोन ऐप्लिकेशन के लिये प्रोसेसिंग शुरू हो जाती है। इसके बाद बैंक हफ्ते भर के भीतर प्रापर्टी के पेपर्स भी वेरिफाई कर यह तय कर लेते हैं कि अप्लाई करने वाले व्यक्ति को लोन देना है या नहीं। अगर किसी की लोन ऐप्लिकेशन रिजेक्ट हो जाती है, तो आपको 0.5 फीसदी फीस (नॉन रिफेंडेबल) नहीं देनी पड़ती, जबकि कई कंपनियां इसे बतौर वेरिफिकेशन फीस वसूल लेती हैं। दी गयी सयम सीमा के अनुसार आप लोन की किश्त ले सकते हैं, बाकी आमाउंट साल भर के भीतर या इससे कुछ ज्यादा समय में उठा सकते हैं। यह अमाउंट किश्तों में या एक साथ भी लिया जा सकता है, जो आपकी जरूरत पर निर्भर करता है।
लोन एप्लिकेशन रिजेक्ट होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे हो सकता है कि प्रापर्टी को लेकर व्यक्ति विशेष का मन बदल गया हो या लोन रिटर्न के लिए व्यक्ति की इनकम नाकाफी हो। कोशिश यह करें कि पहले आप सही और अपनी पसंद की प्रापर्टी का चयन कर लें। फिर किसी अच्छी कंपनी में लोन के लिये अप्लाई करें, जो मार्केट के अनुसार सबसे कम इंटरेस्ट रेट आफर करे। यही नहीं, जरा अपनी जेब भी टटोल लें कि आप इस लोन को चुकाने में सक्षम हैं भी या नहीं।


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