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Home » Health » 29 July 2010 »

लाइलाज नहीं ‘हकलाहट’

स्पष्ट और धाराप्रवाह बोलने के लिए जरूरी है कि हमारे मस्तिष्क का दायां और बायां भाग, जिनसे क्रमशः हमारी भावनाएं और भाषा निर्देश जुड़े हैं, तालमेल से चलें। जरा सी भी गड़बड़ होने से हकलाहट की समस्या पैदा हो सकती है।
हकलाहट के इलाज के लिए कोई रामबाण दवा उपलब्ध नहीं है लेकिन फिर भी ‘स्पीच थैरेपी’ से यह दोष काफी हद तक दूर किया जा सकता है। इसमें आत्मविश्वास का रोल बहुत अहम है। आत्मविश्वास की कमी होने पर तो अच्छा खासा बोलने वाला भी हकलाकर रूक-रूककर बोलने लगता है।
10 वर्षीय पंखुरी कुछ समय काफी बीमार रही। फिर जाने क्या हुआ कि उसकी बीमारी तो ठीक हो गई लेकिन उसके बोलने में फर्क आ गया। वह बामुश्किल कुछ कह पाती थी। लगता था उसे अपने मन की बात कहने के लिए बहुत जोर लगाना पड़ रहा है। बोलते समय उसकी गले की नसे तन जाती और मुंह अचानक बोलते हुए बंद हो जाता है। जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाले सुमित को याद नहीं पड़ता कि वह कब से हकलाने लगा था। ताज्जुब की बात ये थी कि सुमित गाना बहुत ही बढ़िया गाता था। उसकी आवाज का जादू लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता। हर तरह से योग्य और इंटेलीजेंट सुमित अपनी इस कमजोरी की वजह से हमेशा शार्मिन्दा महसूस करता।
पंखुरी और सुमित जैसे न जाने कितने लोग हमारे देश में है, जो इसी तरह से हकलाहट की समस्या के शिकार हैं। इस समय देशभर में एक करोड़ से अधिक लोग ऐसे हैं जो हकलाहट के शिकार हैं। यह बीमारी उपेक्षा की शिकार बनकर रह गई है क्योंकि लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते बल्कि यह सबके लिए हंसने का सामान बन गई है। हिन्दी मूवीज और टीवी सीरियलों में हकलाने को बतौर कॉमेडी पेश किया जाता है। जबकि वास्तविक जीवन में हकलाने वाले के साथ लोगों को धैर्य नहीं रहता। ऐसे व्यक्तियों से वे कहते मिलेंगे, ‘अब आगे भी कुछ बोलोगे’ या ब ..ब.. ह करते रहोगे’ अथवा ऐसे लोगों का मजाक उड़ाते हुए अपने दोस्तों से कहेंगे। ‘भई इसका तो गियर अटक गया लगता है।’ यह सब सुनकर बेचारा इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति चुप हो जाता है।
यह जीवन का करूण पक्ष है। पीड़ित व्यक्ति की त्रासदी यह होती है कि उसके मन में तो बहुत कुछ भरा होता है लेकिन अपमानित होने के डर से वो बोल नहीं पाता। अक्सर यह देखा गया है कि पुरूषों के मुकाबले स्त्रियां कम हकलाती है। इसका संबंध उनकी मानसिक संरचना से हो सकता है।
कई बार इंसान क्रोध के अतिरेक में भी हकलाने की स्थिति में आ जाता है या जल्दी-जल्दी ढ़ेर सी बातें एक ही सांस में कहना चाहे और उसके लिए उसे शब्द न मिले, तब भी हकलाहट की समस्या आ जाएगी।
अंधविश्वास के तहत रामेश्वरी देवी ने अपने लल्ला की जीभ पर दहकता अंगारा रख दिया, यह सोचकर कि उसके बेटे की हकलाहट का ये कारगर इलाज है। अब इस इलाज से उसके लल्ला का हकलाना तो क्या बंद होता, उल्टे उसका खाना-पीना और बोलना तक बंद हो गया। शिक्षा के अभाव में उठाए जाने वाले इस तरह के मूर्खतापूर्ण कदम कई बार जान का जोखिम भी बन जाते हैं। हालांकि कुछ देशी इलाज जो नुकसान रहित हो, उन्हें आजमाने में कोई हर्ज नहीं, जैसे समुद्र के किनारे एकांत में जोर-जोर से चिल्लाना या गाने की प्रैक्टिस करना लेकिन अंधविश्वासों का इलाज की प्रक्रिया में कोई स्थान नहीं हो सकता।
हकलाना अन्य शारीरिक दोषों की तरह ही है, जिसके लिए व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार नहीं। इसलिए इस बात को लेकर अपने भीतर हीन भावना कभी न पनपने दें। कम बोलना वैसे भी बुध्दिमान की निशानी होता है, इसलिए ज्यादा बोलने की जरूरत ही क्या है? कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें बगैर बोल आप निपुणता प्राप्त कर सकते हैं। यह न सोचें कि किस्मत के सब दरवाजे बंद हो गए।
हकलाहट दूर करने में ‘बिल पावर’ अर्थात इच्छाशक्ति का रोल बहुत अहम है। कई प्रसिध्द हस्तियां यहां तक कि शाहरूख खान जैसे हर दिल अजीज कलाकार ने अपनी हकलाहट को अभ्यास के जरिये अपना स्टाइल बना लिया पूजा भट्ट भी ऐसी ही कलाकार है, जिसने हकलाहट को अपने फिल्मी कैरियर में बाधा नहीं बनने दिया, न ही अपनी डबिंग कभी किसी और से कराई।
बच्चे में जब यह दोष उजागर हो तो उसे इसके लिए डांटे-फटकारें या सजा न दें बल्कि उसे सीधे किसी अच्छे स्पीच थैरेपिस्ट के पास ले जाएं और उसकी सलाहनुसार बच्चे का इलाज करें। बच्चे को मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूती प्रदान करें। उसे मॉरल स्पोर्ट देकर उसमें आत्मविश्वास बढ़ाएं और उसमें अपने को ठीक करने का जज्बा पैदा करें। ‘सेल्फ हैल्प’ यहां अधिक कारगर होती है।

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