रायसेन,। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित यूनेस्को विश्व
धरोहर सांची में मप्र शासन संस्कृति विभाग द्वारा आज शनिवार से कलाओं में
बौद्ध विचार पर एकाग्र दो दिवसीय महाबोधि महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा
रहा है। बुद्ध जम्बूद्वीप पार्क (पुराना विश्राम भवन परिसर) सांची में
आयोजित इस महोत्सव में अंतरराष्ट्रीय स्तर के मेहमान और कलाकार शिरकत
करेंगे। इस धार्मिक उत्सव में श्रीलंका, जापान, थाईलैंड और वियतनाम सहित कई
देशों के बौद्ध अनुयायी शामिल होंगे। जिला प्रशासन रायसेन एवं महाबोधि
सोसायटी ऑफ श्रीलंका के सहयोग से आयोजित समारोह में प्रतिदिन सायं 6.30 बजे
से प्रस्तुतियाँ संयोजित की जाएंगी।
संस्कृति विभाग के संचालक एनपी
नामदेव ने बताया कि ज्ञान, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर जीवन में
शांति, समृद्धि तथा विश्व के लिए बंधुता का संदेश देने वाले इस समारोह में
श्रीलंका के कलाकार लोकनृत्य एवं गायन की प्रस्तुति देंगे तो नृत्य नाटिका
के माध्यम से कलाकार भगवान बुद्ध की जीवन कथा एवं आदर्शों को मंच पर जीवंत
करते नजर आएंगे। उन्होंने बताया कि समारोह का शुभारंभ आज सायं 6.30 बजे
होगा, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री
धर्मेन्द्र सिंह लोधी मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मछुआ कल्याण
एवं मत्स्य राज्यमंत्री नारायण सिंह पंवार करेंगे। विशेष अतिथि के रूप में
लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री नरेन्द्र शिवाजी पटेल,
विधायकगण डॉ. प्रभुराम चौधरी व सुरेन्द्र पटवा एवं जिला पंचायत अध्यक्ष
यशवंत सिंह उपस्थित रहेंगे।
संस्कृति संचालक नामदेव ने बताया कि
समारोह के पहले दिन श्रीलंका की ललिता गोमरा एवं दल द्वारा श्रीलंका के
लोकनृत्य एवं गायन की प्रस्तुति दी जाएगी। इसके पश्चात भोपाल के पंचशील
सांस्कृतिक मंच द्वारा नृत्य एवं गायन की प्रस्तुतियाँ होंगी। शाम की ठंडी
बयार में भोपाल की संघरत्ना बनकर एवं साथी भगवान बुद्ध की जीवन कथा पर
केंद्रित नृत्य नाटिका की प्रस्तुति देकर भगवान बुद्ध के जीवन आदर्शों को
जन-जन तक सम्प्रेषित करते नजर आएंगे। भोपाल का द साया बैंड के कलाकार भक्ति
संगीत से श्रोताओं को आह्लादित करते नजर आएंगे।
समारोह के दूसरे
दिन 30 नवंबर को श्रीलंका की ललिता गोमरा एवं साथी कलाकार लोकनृत्य एवं
गायन के माध्यम से श्रीलंका की संस्कृति को मंच पर आविर्भूत करेंगे। समारोह
की अंतिम सभा अखिल भारतीय कवि सम्मेलन की होगी, जहाँ सूर्यकुमार पाण्डेय
(लखनऊ), स्वयं श्रीवास्तव(उन्नाव), सुमित मिश्रा(ओरछा), अभिसार
शुक्ला(दिल्ली), हिमांशी बाबरा(मेरठ), मनु वैशाली(दिल्ली), दीपक
शुक्ला(भोपाल) एवं चेतन चर्तित(इंदौर) कविता पाठ करेंगे।
गौरतलब है
कि सांची स्तूप अपनी स्थापत्य कला के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यह बौद्ध धर्म
की गहरी आध्यात्मिक विरासत का भी प्रतीक है। इस पवित्र स्थल में भगवान
बुद्ध के दो प्रिय शिष्य सारिपुत्र और महामोदग्लायन की अस्थियां सुरक्षित
रखी गई हैं। इन पवित्र अस्थियों को देखने का सौभाग्य श्रद्धालुओं को साल
में सिर्फ एक बार महाबोधि महोत्सव के दौरान मिलता है। यह आयोजित नवंबर माह
के आखिरी शनिवार और रविवार को होता है। इस दौरान सांची स्तूप परिसर के
मंदिर के तलघर में रखे इन अस्थि कलशों को बाहर निकाला जाता है। दो दिन
सूर्योदय से सूर्यास्त तक श्रद्धालुओं इन कलशों के दर्शन कर सकते हैं। इस
दौरान सांची में आस्था और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। बौद्ध
धर्म के अनुयायियों के लिए यह सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है। थाईलैंड,
श्रीलंका, भूटान, वियतनाम, मलेशिया और जापान जैसे देशों से हजारों बौद्ध
अनुयायी यहां पहुंचते हैं।
सांची में इन अस्थियों को 1952 में पहली
बार स्थापित किया गया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू
स्वयं यहां पहुंचे थे। उन्होंने उस समय इस आयोजन की नींव रखी और एक दिवसीय
मेले की शुरुआत की थी। बाद में वर्ष 2010 में मध्य प्रदेश सरकार ने इसे तीन
दिवसीय उत्सव का रूप दिया। हालांकि, पिछले चार वर्षों से यह आयोजन दो
दिनों तक सीमित कर दिया गया है।
सांची स्तूप का गौरवशाली
इतिहाससांची की इस ऐतिहासिक धरोहर का निर्माण सम्राट अशोक महान ने तीसरी
शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यह भारत के सबसे प्राचीन बौद्ध स्मारकों
में से एक है। बाद में शुंग और सातवाहन शासकों ने इसका विस्तार किया और
पहली शताब्दी ईसा पूर्व में यहां के चार भव्य तोरण द्वार (प्रवेश द्वार)
बनाए गए, जिन पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं से जुड़ी विस्तृत नक्काशी है।
सांची का यह महान स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और साहस का प्रतीक है और
यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल है।