झारखंड में सामाजिक न्याय, पहचान और आरक्षण से जुड़े कुर्मी समुदाय की अनुसूचित जनजाति (ST) सूची में शामिल होने की मांग को लेकर विवाद गहराता जा रहा है, जिससे सामाजिक संतुलन तथा समुदायों के मध्य तनाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों और आंदोलनों के अनुसार यह बहस केवल जातिगत दर्जे का मामला नहीं रह गई बल्कि राजनीतिक और सामाजिक हलचल का विषय बन चुकी है। हाल के वर्षों में कुर्मी समाज ने इस मांग को लेकर केंद्र सरकार से एसटी दर्जे की राजनीतिक व संवैधानिक मान्यता की उम्मीद जताई है, जिसमें वह सामाजिक–सांस्कृतिक समानताओं का हवाला देते हुए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आदिवासी समाज का कहना है कि एसटी दर्जा मिलने से मौजूदा अनुसूचित जनजाति समुदायों के आरक्षण, रोजगार और संसाधनों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे उनके अधिकारों में कमी आ सकती है। इस बीच हजारीबाग में आयोजित “उलगुलान जन आक्रोश रैली” में आदिवासी संगठनों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर कुर्मी समाज को एसटी दर्जा देने के प्रयासों का विरोध किया। दशकों पुरानी परंपराओं और पहचान की रक्षा की चेतावनी देते हुए रैली में प्रतिभागियों ने पारंपरिक वेशभूषा और प्रतीकों के साथ शांतिपूर्ण विरोध किया। इसी प्रकार धनबाद में भी हजारों आदिवासी लोगों ने जनजातीय अधिकारों की रक्षा को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन किया और कुर्मी समुदाय की एसटी मांग का विरोध किया। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, एसटी दर्जे की मांग आदिवासी समुदाय के मौलिक अधिकारों पर खतरा बन सकती है, जिसे वे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे। विश्लेषकों के मुताबिक यह बहस झारखंड जैसे विविध सामाजिक-नस्ली और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले राज्य में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक असमानताओं को उजागर कर रही है, और संघीय नीतियों, संवैधानिक नियमों और आरक्षण प्रणाली की समीक्षा को भी प्रभावित कर सकती है।
सामाजिक संतुलन को लेकर “कुरमी–एसटी बहस” झारखंड में तेज, आदिवासी संगठनों में उलगुलान और विरोध खड़ा




