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ब्लैक होल के शक्तिशाली जेट आकाशगंगाओं के भविष्य को कैसे प्रभावित करते हैं? भारतीय वैज्ञानिकों की नई खोज


नई दिल्ली। अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में भारतीय वैज्ञानिकों से जुड़ा एक नया अध्ययन सामने आया है, जिसने ब्लैक होल और आकाशगंगाओं के बीच संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। शोधकर्ताओं ने ऐसी प्रक्रिया के प्रमाण खोजे हैं, जिसमें आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद विशालकाय ब्लैक होल से निकलने वाले बेहद शक्तिशाली जेट उसके आसपास फैले गैस के विशाल भंडार को प्रभावित कर सकते हैं। इसका सीधा संबंध भविष्य में तारों के निर्माण और पूरी आकाशगंगा के विकास से हो सकता है।

ब्लैक होल सिर्फ पदार्थ निगलते ही नहीं

ब्लैक होल को आमतौर पर ऐसी खगोलीय वस्तु के रूप में देखा जाता है जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाला पदार्थ बाहर नहीं निकल पाता। लेकिन सुपरमैसिव ब्लैक होल के मामले में तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है।

आकाशगंगाओं के केंद्र में मौजूद ये विशाल ब्लैक होल जब आसपास की गैस और पदार्थ को आकर्षित करते हैं, तो उसके चारों ओर अत्यधिक गर्म क्षेत्र बन सकता है। इसी प्रक्रिया के दौरान ब्लैक होल के आसपास से बहुत तेज गति वाले आवेशित कणों के जेट अंतरिक्ष में दूर तक निकल सकते हैं।

वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन जेट का असर केवल ब्लैक होल के आसपास के छोटे क्षेत्र तक सीमित रहता है या पूरी आकाशगंगा के वातावरण पर भी पड़ सकता है।

आकाशगंगा के बाहर फैला है गैस का विशाल क्षेत्र

शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Circumgalactic Medium यानी CGM है। यह आकाशगंगा के दिखाई देने वाले हिस्से के बाहर फैला बेहद विरल गैसीय क्षेत्र है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गैस आकाशगंगा के आकार से कई गुना बड़े क्षेत्र में फैल सकती है और लगभग 10 से 20 गुना तक के पैमाने पर मौजूद हो सकती है। यही गैस भविष्य में ठंडी होकर एकत्रित होती है और नए तारों के निर्माण के लिए कच्चा माल उपलब्ध करा सकती है।

यानी किसी आकाशगंगा में कितने नए तारे बनेंगे, इसे समझने के लिए केवल उसके दिखाई देने वाले तारों और गैस को देखना पर्याप्त नहीं है। उसके आसपास मौजूद इस विशाल गैसीय वातावरण को समझना भी जरूरी है।

जेट जब गैस से टकराता है तो क्या होता है?

भारतीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों की टीम ने इसी सवाल पर ध्यान केंद्रित किया। शोध के अनुसार, जब ब्लैक होल से निकलने वाला शक्तिशाली जेट आसपास के CGM तक पहुंचता है, तो वह वहां मौजूद गैस के साथ परस्पर क्रिया करता है।

इस प्रक्रिया में गैस ऊर्जावान और गर्म हो सकती है। साथ ही उसके आयनीकरण की स्थिति बदल सकती है। गर्म और ऊर्जावान गैस के कारण उसके ठंडा होकर एक जगह जमा होने और नए तारों के निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

इस तरह ब्लैक होल का प्रभाव उसके बेहद छोटे केंद्रीय क्षेत्र से निकलकर आकाशगंगा के कहीं बड़े हिस्से तक पहुंच सकता है।

वैज्ञानिकों को सबसे महत्वपूर्ण संकेत कहां मिला?

इस अध्ययन की खास बात यह रही कि वैज्ञानिकों ने गैस से निकलने वाली विशेष चमक के संकेतों को अलग-अलग दिशाओं में देखा।

जब आकाशगंगा के चारों ओर सभी दिशाओं से प्राप्त संकेतों को एक साथ औसत किया गया, तो कोई बहुत स्पष्ट संकेत नहीं मिला। लेकिन जब शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों का अध्ययन किया जो ब्लैक होल के जेट की दिशा में थे, तो वहां मजबूत संकेत दिखाई दिया।

इससे यह संभावना मजबूत हुई कि जेट गैस को हर दिशा में समान रूप से प्रभावित नहीं कर रहा है, बल्कि उसका प्रभाव मुख्य रूप से उसके रास्ते में आने वाले गैसीय क्षेत्र में अधिक दिखाई देता है।

तारों के निर्माण पर पड़ सकता है असर

आकाशगंगाओं में नए तारों के निर्माण के लिए अपेक्षाकृत ठंडी गैस का एकत्रित होना महत्वपूर्ण है। यदि यह गैस अत्यधिक गर्म या ऊर्जावान हो जाए और आसानी से एकत्रित न हो सके, तो तारों के निर्माण की दर कम हो सकती है।

यही कारण है कि ब्लैक होल के जेट को केवल अंतरिक्ष में निकलने वाली ऊर्जा की धारा के रूप में नहीं देखा जा रहा है। यह आकाशगंगा के विकास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला तंत्र हो सकता है।

हालांकि, वैज्ञानिक अभी इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए आगे के अध्ययन की आवश्यकता पर जोर देते हैं। नए परिणाम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत देते हैं, लेकिन इन्हें आकाशगंगाओं के विकास की पूरी कहानी का अंतिम उत्तर नहीं माना जा सकता।

भारतीय शोध की भूमिका

इस अध्ययन में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) और अमेरिका की Arizona State University से जुड़े वैज्ञानिक शामिल थे। RRI भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से संबद्ध स्वायत्त संस्थान है। शोधपत्र The Astrophysical Journal Letters में प्रकाशित हुआ है।

शोध की प्रमुख लेखिका RRI की खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी विशेषज्ञ नम्रता रॉय हैं, जबकि Arizona State University की संचिता बोर्थाकुर अध्ययन की सह-लेखिकाओं में शामिल हैं।

सक्रिय आकाशगंगाओं को समझने में क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?

कुछ आकाशगंगाओं के केंद्र बेहद सक्रिय होते हैं। वहां मौजूद सुपरमैसिव ब्लैक होल आसपास के पदार्थ को आकर्षित करते हैं और भारी मात्रा में ऊर्जा छोड़ सकते हैं। ऐसी प्रणालियों को समझना यह जानने के लिए महत्वपूर्ण है कि आकाशगंगाएं समय के साथ कैसे विकसित होती हैं।

नया अध्ययन इस संभावना को मजबूत करता है कि आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैक होल और उसके बाहरी गैसीय वातावरण के बीच संबंध काफी व्यापक हो सकता है।

दूसरे शब्दों में, करोड़ों-करोड़ों प्रकाश-वर्ष दूर मौजूद किसी आकाशगंगा के विकास को समझने के लिए उसके केंद्र के ब्लैक होल और उससे निकलने वाले जेट की गतिविधि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आगे की रिसर्च का रास्ता

अब वैज्ञानिकों के सामने कई सवाल हैं—अलग-अलग प्रकार की आकाशगंगाओं में इन जेट का प्रभाव कितना अलग होता है, गैस कितनी देर तक गर्म रहती है, जेट कितनी ऊर्जा स्थानांतरित करता है और इसका तारों के निर्माण की दर पर वास्तविक प्रभाव कितना बड़ा है।

इन सवालों के जवाब भविष्य के बहु-तरंगदैर्ध्य यानी अलग-अलग प्रकार की खगोलीय विकिरणों से किए जाने वाले अवलोकनों से बेहतर तरीके से मिल सकते हैं।

निष्कर्ष

भारतीय वैज्ञानिकों से जुड़े इस नए अध्ययन ने ब्लैक होल और उसकी मेजबान आकाशगंगा के बीच संबंध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने रखी है। शोध से संकेत मिलता है कि ब्लैक होल से निकलने वाले शक्तिशाली जेट अपने आसपास के विशाल गैसीय वातावरण को गर्म और ऊर्जावान बनाकर तारों के निर्माण की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं।

यह खोज इस बात को समझने में मदद करती है कि आकाशगंगाओं का भविष्य केवल उनके तारों और ग्रहों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि उनके केंद्र में मौजूद सुपरमैसिव ब्लैक होल और उससे निकलने वाली ऊर्जा भी लंबे समय तक उनकी संरचना और विकास को प्रभावित कर सकती है।