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UN में भारत और लाइबेरिया की नई समुद्री सुरक्षा पहल, जहाजों और नाविकों की सुरक्षा पर जोर


नई दिल्ली/न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान भारत ने समुद्री सुरक्षा को लेकर एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल शुरू की है। भारत और लाइबेरिया ने मिलकर ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स ऑन सेफ्टी एंड सिक्योरिटी ऑफ शिपिंग एंड सीफेरर्स’ की शुरुआत की है। इस समूह का मुख्य उद्देश्य समुद्री व्यापार, व्यावसायिक जहाजों और उनमें काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर देशों के बीच बेहतर समन्वय और व्यावहारिक सहयोग बढ़ाना है।

भारत और लाइबेरिया की संयुक्त पहल

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय कार्यक्रम के दौरान इस समूह की पहली मंत्रीस्तरीय बैठक आयोजित हुई। भारत की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर और लाइबेरिया की विदेश मंत्री सारा बेइसोलो न्यान्ती ने पहल की अगुवाई की।

भारत और लाइबेरिया को इस समूह का सह-अध्यक्ष बनाया गया है। बैठक में कुल 25 देशों की भागीदारी बताई गई है। समूह में ऐसे देशों को साथ लाने का प्रयास है जिनका वैश्विक समुद्री परिवहन, जहाजों के पंजीकरण या समुद्री कर्मचारियों से सीधा संबंध है।

समुद्री रास्तों पर बढ़ती सुरक्षा चुनौती

इस पहल की जरूरत ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया के कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षा संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र मंच पर खाड़ी क्षेत्र, लाल सागर और काला सागर में व्यावसायिक जहाजों पर हुए हालिया हमलों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि ऐसी घटनाओं का असर सिर्फ किसी एक देश के नाविकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ सकता है।

भारतीय नाविक भी प्रभावित

भारत दुनिया के प्रमुख समुद्री मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। बड़ी संख्या में भारतीय नाविक विदेशी झंडे वाले जहाजों पर भी काम करते हैं। ऐसे में दुनिया के संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में होने वाली घटनाओं का सीधा असर भारतीय नागरिकों पर भी पड़ सकता है।

जयशंकर ने हाल की कुछ घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि गोल्फ ऑफ ओमान में एक वाणिज्यिक जहाज पर हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हुई, जबकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक अन्य घटना के बाद एक भारतीय चालक दल के सदस्य के लापता होने की जानकारी सामने आई। उन्होंने काला सागर में हुए हमलों का भी उल्लेख किया।

केवल जहाज नहीं, नाविकों की सुरक्षा भी अहम

नई पहल का फोकस सिर्फ जहाजों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। इसमें समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा और उनके मानवीय अधिकारों से जुड़े विषयों को भी महत्व दिया जा रहा है।

संघर्ष वाले क्षेत्रों में काम करने वाले नाविकों को लंबे समय तक जहाज पर फंसे रहने, चालक दल के बदलाव में देरी, घर लौटने में कठिनाई और आपात स्थिति में सहायता मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए नई पहल में नाविकों के लिए बेहतर अंतरराष्ट्रीय समन्वय और आपात सहायता व्यवस्था पर चर्चा की जा सकती है।

वैश्विक व्यापार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

दुनिया का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्गों के जरिए संचालित होता है। इसलिए किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर सुरक्षा संकट पैदा होने से जहाजों के मार्ग बदल सकते हैं, परिवहन लागत बढ़ सकती है और सामान की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह भी रेखांकित किया है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा का संबंध केवल नौवहन से नहीं, बल्कि ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता से भी है।

समूह आगे क्या करेगा?

भारत के अनुसार यह नया समूह एक स्वैच्छिक, समावेशी और कार्रवाई-केंद्रित मंच के रूप में काम करने का लक्ष्य रखता है। इसमें सदस्य देश समुद्री सुरक्षा से जुड़े अनुभव साझा कर सकते हैं और संभावित खतरों से निपटने के लिए सहयोग के रास्ते तलाश सकते हैं।

इस पहल को संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढांचों के साथ तालमेल बढ़ाने के उद्देश्य से भी देखा जा रहा है।

समुद्री सुरक्षा में भारत की भूमिका

भारत पहले से ही समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में भाग लेता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने समुद्री मार्गों को सुरक्षित, खुला और नियम-आधारित बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

भारत ने यह भी कहा है कि समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ नाविकों की समय पर निकासी, चिकित्सा सहायता, चालक दल में बदलाव और सुरक्षित स्वदेश वापसी के लिए प्रभावी आपात व्यवस्था जरूरी है।

निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भारत और लाइबेरिया की ओर से शुरू की गई यह नई पहल समुद्री सुरक्षा से जुड़े देशों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश है। इसका महत्व ऐसे समय में बढ़ जाता है जब कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर व्यावसायिक जहाजों और उनके कर्मचारियों को सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

अब इस समूह के सामने चुनौती यह होगी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली चर्चाओं को व्यावहारिक सहयोग में कैसे बदला जाए और संकटग्रस्त समुद्री क्षेत्रों में जहाजों तथा नाविकों की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्थाएं कैसे मजबूत की जाएं।