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ग्रीन हाइड्रोजन को सरकार का बड़ा बढ़ावा, 8.62 लाख टन सालाना क्षमता के लिए प्रोत्साहन


नई दिल्ली। भारत में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में सरकार ने ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी के अनुसार, अब तक 8.62 लाख टन प्रति वर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता के लिए प्रोत्साहन आवंटित किए जा चुके हैं।

इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण में भी बढ़ी घरेलू क्षमता

सरकार ने केवल ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन पर ही ध्यान नहीं दिया है, बल्कि इसे बनाने के लिए जरूरी इलेक्ट्रोलाइजर की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने की दिशा में भी प्रोत्साहन दिया गया है।

मंत्री के मुताबिक, 3,000 मेगावाट प्रति वर्ष की घरेलू इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण क्षमता के लिए कंपनियों को प्रोत्साहन दिया गया है। सरकारी जानकारी के अनुसार इस क्षमता को स्थापित करने के लिए 15 कंपनियों को समर्थन दिया गया है।

इलेक्ट्रोलाइजर वह उपकरण है, जिसके जरिए पानी को बिजली की मदद से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। जब इस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली बिजली नवीकरणीय स्रोतों से आती है, तो उत्पादित हाइड्रोजन को ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत पहल

यह पूरा प्रयास राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से जुड़ा है। मिशन के लिए करीब 19,744 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका व्यापक उद्देश्य भारत में ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और भविष्य में इसके निर्यात के लिए एक मजबूत औद्योगिक इकोसिस्टम तैयार करना है।

सरकार का अनुमान है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने से उन क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है, जहां वर्तमान में तेल, गैस या अन्य जीवाश्म ईंधनों पर काफी निर्भरता है।

रिफाइनरी और उद्योगों में इस्तेमाल बढ़ाने की तैयारी

ग्रीन हाइड्रोजन के लिए घरेलू मांग पैदा करने पर भी जोर दिया जा रहा है। मंत्री के अनुसार, रिफाइनरी क्षेत्र के लिए 30 हजार टन प्रति वर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता आवंटित की गई है। इसका उद्देश्य औद्योगिक क्षेत्र में इसके व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ाना और बाजार तैयार करना है।

इसके अलावा स्टील क्षेत्र, परिवहन और हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग जैसी तकनीकों से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट भी आगे बढ़ाए जा रहे हैं। इससे आने वाले वर्षों में ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल के नए क्षेत्र विकसित हो सकते हैं।

ग्रीन हाइड्रोजन की कीमतों पर भी संकेत

सरकार के मुताबिक हाल की प्रतिस्पर्धी बोलियों में ग्रीन हाइड्रोजन की सबसे कम खोजी गई कीमत 279 रुपये प्रति किलोग्राम रही, जबकि ग्रीन अमोनिया के लिए यह दर 49.75 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई। सरकार इन कीमतों को क्षेत्र की लागत प्रतिस्पर्धा बढ़ने के संकेत के रूप में देख रही है।

आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश

भारत के लिए ग्रीन हाइड्रोजन का विकास ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। घरेलू उत्पादन और इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण बढ़ने से आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही देश में नई तकनीक, विनिर्माण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े रोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय मिशन का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन और उसके डेरिवेटिव्स के उत्पादन, उपयोग तथा निर्यात का प्रमुख केंद्र बनाना है।

कुल मिलाकर, 8.62 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता और 3,000 मेगावाट घरेलू इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण क्षमता के लिए दिए गए प्रोत्साहन भारत के ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। आने वाले समय में उत्पादन, लागत और औद्योगिक मांग के आधार पर इस क्षेत्र की वास्तविक प्रगति और स्पष्ट होगी।