नई दिल्ली: भारत ने टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल को आगे बढ़ाया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत BioE3 यानी Biotechnology for Economy, Environment & Employment ढांचे के माध्यम से जैव-आधारित और बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को प्रयोगशाला से औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोग की दिशा में ले जाने की प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया गया है। इस पहल में Polylactic Acid यानी PLA आधारित सामग्री को प्रमुखता दी जा रही है। इसका उद्देश्य पेट्रोलियम और अन्य पेट्रोकेमिकल स्रोतों पर निर्भर पारंपरिक प्लास्टिक के मुकाबले जैव-आधारित विकल्पों के विकास और उत्पादन को बढ़ावा देना है। इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नवीकरणीय जैविक संसाधनों को उच्च-मूल्य वाली सामग्री में बदला जा सकता है। सरकारी विवरण के अनुसार, इस पहल में चीनी और अन्य जैविक फीडस्टॉक से लैक्टिक एसिड और आगे चलकर PLA जैसे बायोपॉलिमर तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इस तरह कृषि आधारित संसाधनों का इस्तेमाल केवल खाद्य या पारंपरिक औद्योगिक उत्पादों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनसे पर्यावरण-अनुकूल सामग्री तैयार करने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। इस कार्यक्रम के तहत Biotechnology Industry Research Assistance Council (BIRAC) की ओर से ₹75 करोड़ का अनुदान दिया जा रहा है। इसके माध्यम से 100 टन प्रति वर्ष क्षमता वाली पायलट-स्केल R&D सुविधा विकसित की जा रही है। यह सुविधा उत्तर प्रदेश के कुंभि स्थित Balrampur Chini Mills Limited के एकीकृत विनिर्माण परिसर में स्थापित की जाएगी। यहां PLA और उसके को-पॉलिमर से जुड़ी तकनीकों के विकास, परीक्षण और आगे बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए जरूरी प्रक्रियाओं पर काम होगा। इस परियोजना का मकसद केवल मौजूदा बायोप्लास्टिक का उत्पादन शुरू करना नहीं है। पायलट प्लांट में अलग-अलग जरूरतों के अनुरूप विशेष PLA ग्रेड और उन्नत PLA को-पॉलिमर विकसित करने पर भी काम किया जाएगा। इसके जरिए वैज्ञानिक और औद्योगिक टीम यह समझ सकेगी कि अलग-अलग उपयोगों के लिए किस प्रकार की सामग्री सबसे उपयुक्त होगी। साथ ही उत्पादन प्रक्रिया, लागत, गुणवत्ता और बाजार में उपयोग की व्यवहारिकता से जुड़े आंकड़े भी जुटाए जाएंगे। पारंपरिक प्लास्टिक का बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन आधारित कच्चे माल से तैयार होता है। इसके व्यापक उपयोग और लंबे समय तक बने रहने की वजह से प्लास्टिक कचरा पर्यावरणीय चुनौती बना हुआ है। ऐसे में जैव-आधारित पॉलिमर एक वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध करा सकते हैं। हालांकि, किसी भी बायोडिग्रेडेबल सामग्री की वास्तविक पर्यावरणीय उपयोगिता उसके निर्माण, इस्तेमाल और निपटान की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए बड़े पैमाने पर उत्पादन के साथ उचित अपशिष्ट प्रबंधन और प्रमाणन भी महत्वपूर्ण होंगे। BioE3 पहल का एक प्रमुख उद्देश्य जैव-प्रौद्योगिकी से जुड़ी खोजों को केवल अनुसंधान संस्थानों तक सीमित न रखकर उन्हें वास्तविक उत्पादों और औद्योगिक प्रक्रियाओं में बदलना है। इस परियोजना में पायलट उत्पादन, तकनीकी सत्यापन, उत्पाद विकास, ग्राहक परीक्षण और भविष्य में बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए जरूरी तकनीकी जानकारी जुटाने पर जोर दिया जाएगा। इससे प्रयोगशाला स्तर की तकनीक को व्यावसायिक उत्पादन के लिए तैयार करने में मदद मिल सकती है। जैव-आधारित प्लास्टिक का विकास केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं है। इसके साथ कच्चे माल की आपूर्ति, जैव-प्रसंस्करण, रासायनिक इंजीनियरिंग, प्लांट संचालन, गुणवत्ता नियंत्रण और उत्पाद विकास जैसे क्षेत्रों में नई गतिविधियां पैदा हो सकती हैं। सरकारी पक्ष के अनुसार, जैविक संसाधनों को उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में बदलने से किसानों, उद्योगों, अनुसंधान संस्थानों और कुशल श्रमिकों के लिए एक नई वैल्यू चेन विकसित करने की संभावना है। सरकार के अनुसार भारत की Bioeconomy पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। अब जोर इस बात पर है कि जैव-प्रौद्योगिकी की क्षमता को व्यावसायिक उत्पादों, विनिर्माण और रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए। BioE3 का व्यापक दृष्टिकोण बायोमैन्युफैक्चरिंग, टिकाऊ उत्पादन और जैव-आधारित उच्च-मूल्य वाले उत्पादों को बढ़ावा देने से जुड़ा है। पायलट परियोजना की सफलता के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण उत्पादन क्षमता को बड़े औद्योगिक स्तर तक ले जाना होगा। इसके लिए लगातार गुणवत्ता, उत्पादन लागत, कच्चे माल की उपलब्धता, ऊर्जा खपत, उत्पाद प्रमाणन और बाजार की मांग जैसे पहलुओं पर काम करना होगा। सरकारी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी दस्तावेज भी इस क्षेत्र में स्केल-अप, लगातार गुणवत्ता और नियामकीय प्रक्रियाओं को महत्वपूर्ण चुनौतियों के रूप में रेखांकित करते हैं। BioE3 के तहत PLA आधारित जैव-आधारित बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को व्यावसायिक स्तर की दिशा में ले जाना भारत के बायोमैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। ₹75 करोड़ की BIRAC सहायता वाली 100 TPA पायलट सुविधा तकनीक के विकास, परीक्षण और भविष्य के औद्योगिक विस्तार के लिए आधार तैयार करेगी। इस पहल की खासियत यह है कि इसमें जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि आधारित संसाधन और आधुनिक विनिर्माण को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यदि तकनीक लागत, गुणवत्ता और बड़े पैमाने पर उत्पादन की कसौटियों पर सफल रहती है, तो इससे भारत में पेट्रोकेमिकल आधारित प्लास्टिक के कुछ उपयोगों के लिए जैव-आधारित विकल्प विकसित करने की क्षमता बढ़ सकती है।गन्ने जैसे जैविक संसाधनों से बनेगा नया मटेरियल
₹75 करोड़ की सहायता से पायलट सुविधा
केवल प्लास्टिक बनाना नहीं, नई तकनीक विकसित करना लक्ष्य
पेट्रोकेमिकल प्लास्टिक के विकल्प की तलाश
लैब से बाजार तक तकनीक पहुंचाने पर जोर
रोजगार और नई औद्योगिक वैल्यू चेन की संभावना
भारत की Bioeconomy के लिए महत्वपूर्ण कदम
आगे की चुनौती बड़े पैमाने पर उत्पादन
निष्कर्ष
भारत में जैव-आधारित बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को बढ़ावा, BioE3 के तहत व्यावसायिक इस्तेमाल की दिशा में बड़ा कदम





