BREAKING NEWS

logo

Advertisement
Advertisement

RBI का बड़ा फैसला: निर्यातकों को विदेशी कमाई भारत लाने के लिए अब 9 महीने की समयसीमा


मुंबई/नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक ने निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा को भारत वापस लाने यानी repatriation से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक ने पहले दी गई उस राहत को वापस ले लिया है, जिसके तहत निर्यातकों को विदेशों से अपनी कमाई भारत लाने के लिए 15 महीने तक का समय मिलने वाला था।

अब निर्यातकों के लिए 9 महीने की समयसीमा ही लागू रहेगी। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की उपलब्धता और रुपये की विनिमय दर पर दबाव को लेकर बाजार की गतिविधियां महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।

15 महीने की राहत अब नहीं होगी लागू

RBI ने जनवरी 2026 में जारी किए गए नए समेकित नियमों में निर्यातकों को अपेक्षाकृत अधिक समय देने का प्रावधान किया था। उस व्यवस्था के तहत माल के निर्यात या सेवाओं की इनवॉइसिंग की तारीख से 15 महीने के भीतर निर्यात की पूरी रकम को हासिल कर भारत वापस लाने का प्रावधान किया गया था।

यह व्यवस्था 1 अक्टूबर 2026 से लागू होनी थी। लेकिन अब RBI ने इस बदलाव को प्रभावी होने से पहले ही वापस ले लिया है और 9 महीने की अवधि बरकरार रखने का फैसला किया है।

इसका सीधा असर निर्यातकों पर क्या होगा?

नए फैसले का सबसे सीधा प्रभाव उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो विदेशों में अपने निर्यात की रकम प्राप्त करने के बाद उसे कुछ समय तक विदेशी खातों में रखती हैं।

अब उन्हें निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान प्राप्त कर उसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। यानी विदेशी ग्राहकों से मिलने वाली निर्यात आय को लंबे समय तक विदेश में बकाया रखने की गुंजाइश पहले की प्रस्तावित व्यवस्था की तुलना में कम हो जाएगी।

माल और सेवाओं के निर्यात दोनों पर यह समयसीमा लागू होगी। विदेशों में स्थापित वेयरहाउस को किए गए निर्यात के लिए भी संशोधित नियमों के तहत अलग गणना व्यवस्था निर्धारित की गई है।

RBI ने ऐसा फैसला क्यों लिया?

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू देश के विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की उपलब्धता से जुड़ा है।

जब भारतीय निर्यातकों को विदेशों से भुगतान मिलता है और वे उस विदेशी मुद्रा को भारत वापस लाते हैं, तो घरेलू बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ सकती है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग और आपूर्ति के संतुलन पर असर पड़ता है।

बैंकरों के अनुसार, निर्यात प्राप्तियों को जल्दी भारत लाने से घरेलू बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ने में मदद मिल सकती है। इसका असर रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है।

रुपये और डॉलर की स्थिति भी महत्वपूर्ण

RBI का यह फैसला ऐसे समय आया है जब रुपये और डॉलर की चाल पर बाजार की नजर बनी हुई है। हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर स्तरों के आसपास कारोबार करता रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में स्पॉट और फॉरवर्ड लेनदेन समेत विभिन्न माध्यमों से हस्तक्षेप किया है। ऐसे माहौल में निर्यात से आने वाली विदेशी मुद्रा को घरेलू बाजार में जल्दी उपलब्ध कराना विदेशी मुद्रा तरलता के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

विदेशी मुद्रा भंडार पर भी नजर

विदेशी मुद्रा बाजार की परिस्थितियों का असर देश के रिजर्व पर भी पड़ता है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, 18 सितंबर 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 15 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई और यह लगभग 766 अरब डॉलर रहा।

हालांकि, विदेशी मुद्रा भंडार में बदलाव कई कारकों से प्रभावित होता है। इसलिए केवल निर्यात आय की repatriation व्यवस्था को इसके लिए एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा।

बैंकों को भी मिली अतिरिक्त भूमिका

RBI ने इस बदलाव के साथ अधिकृत डीलर बैंकों से जुड़े कुछ प्रावधानों में भी बदलाव किया है।

बैंकों को 1 अक्टूबर से पहले किए गए कुछ निर्यात, आयात और merchanting trade लेनदेन को संभालने के लिए अतिरिक्त अधिकार दिए गए हैं। ऐसे कुछ मामलों में पहले केंद्रीय बैंक की अनुमति की आवश्यकता होती थी। इससे विदेशी व्यापार से जुड़े पुराने लेनदेन के निपटारे में अधिक सुविधा मिल सकती है।

निर्यात कारोबार के लिए क्या बदलेगा?

निर्यातकों के लिए विदेशी भुगतान की निगरानी अब और महत्वपूर्ण हो सकती है। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि विदेशी ग्राहकों से प्राप्त होने वाली रकम तय समयसीमा के भीतर हासिल हो और नियमानुसार भारत वापस लाई जाए।

विशेष रूप से लंबे भुगतान चक्र वाले कारोबार, अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के साथ लंबी क्रेडिट अवधि और विदेशी वेयरहाउस से जुड़े व्यापार में कंपनियों को अपने cash-flow और विदेशी मुद्रा प्रबंधन की बेहतर योजना बनानी पड़ सकती है।

क्या इससे भारत को फायदा होगा?

इस फैसले का एक संभावित प्रभाव यह है कि निर्यात से आने वाली विदेशी मुद्रा घरेलू वित्तीय प्रणाली में अपेक्षाकृत जल्दी वापस आ सकती है। इससे डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, निर्यातकों के नजरिए से कम समयसीमा का मतलब यह भी है कि उन्हें विदेशी भुगतान और मुद्रा प्रबंधन पर अधिक सख्ती से नजर रखनी होगी। वास्तविक प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों और कंपनियों की भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

निष्कर्ष

RBI ने निर्यातकों को दी जाने वाली प्रस्तावित 15 महीने की repatriation अवधि को वापस लेकर 9 महीने की समयसीमा बरकरार रखी है। यह बदलाव 15 महीने वाली व्यवस्था के लागू होने से पहले किया गया है।

इस कदम के पीछे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने और निर्यात से आने वाली रकम को भारत में जल्दी वापस लाने का उद्देश्य बताया जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर निर्यातकों की विदेशी भुगतान व्यवस्था, बैंकों के अनुपालन और घरेलू विदेशी मुद्रा बाजार पर दिखाई दे सकता है।